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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ६५

तीसरा अध्याय। ६५
पैदा हुआ कुण्ड और मरने पर पैदा हुआ गोलक कहलाता है।
ये दोनों परस्त्री से पैदा होकर, लोक और परलोक में हव्य, कव्य
देनेवाले का नाश करते हैं ॥ १७२-१७५ ॥
अपांक्त्यो यावतः पांक्त्यान् भुञ्जानाननुपश्यति ।
तावतां न फलं प्रेत्य दाता प्राप्नोति बालिशः ॥ १७६ ॥
वीक्ष्यान्धो नवतेः काणः षष्टेः श्वित्री शतस्य तु ।
पापरोगी सहस्रस्य दातुर्नाशयते फलम् ॥ १७७ ॥
यावतः संस्पृशेदङ्गैर्ब्राह्मणान्छूद्रयाजकः ।
तावतां न भवेद्दातुः फलं दानस्य पौर्तिकम् ॥ १७८ ॥
पंक्तिबाह्य पुरुष श्राद्ध में जितने योग्य ब्राह्मणों को भोजन करते
देखता है उनका फल परलोक में उस मूर्ख भोजन देनेवाले को नहीं
मिलता। अन्धा देखकर नव्वे श्रोत्रिय ब्राह्मणों के भोजन का फल
नष्ट करता है, काना साठ ब्राह्मणों का, सफेद कोढ़ का सौका,
पापरोगी एक हज़ार का फल नष्ट कर देता है । शूद्रों को यज्ञ
करानेवाला जितने ब्राह्मणों को अपने अङ्गों से छूता है अर्थात्
श्राद्ध में जितने ब्राह्मणों की पाँत में बैठता है, उतनों के पूर्तस-
म्बन्धी श्राद्ध का फल दाता को नहीं मिलता है ॥ १७६-१७८ ॥
वेदविच्चापि विप्रोऽस्य लोभात्कृत्वा प्रतिग्रहम् ।
विनाशं व्रजति क्षिप्रमामपात्रमिवाम्भसि ॥ १७६ ॥
सोमविक्रयिणे विष्ठा भिषजे पूयशोणितम् ।
नष्टं देवलके दत्तमप्रतिष्ठं तु वार्धुषौ ॥ १८० ॥
यत्तु वाणिजके दत्तं नेह नामुत्र तद्भवेत् ।
भस्मनीव हुतं हव्यं तथा पौनर्भवे द्विजे ॥ १८१ ॥
इतरेषु त्वपांक्तेयेषु यथोद्दिष्टेष्वसाधुषु ।

६६ मनुस्मृति।
मेदोऽसृङ्मांसमज्जास्थि वदन्त्यन्नं मनीषिणः ॥ १८२॥
वेदज्ञ भी जो शूद्र याजक का दान लोभ से लेता है, वह पानी में
कच्चे वरतन की भांति शीघ्र ही नष्ट होजाता है । सोमलता बेंचने
वाले को जो हव्य, कव्य देवे वह विष्ठा होती है । वैद्य को देने से
पीव-रक्त, देवलक-पुजारी को देने से नाश, व्याजखोर को देने से
निष्फल होजाता है । श्राद्ध में जो वाणिज्य करनेवाले को दिया
जाता है वह दोनों लोक में निष्फल होता है । पुनर्विवाह के लड़के
को देने से राख में होम की भांति व्यर्थ होता है और जो दूषित
मनुष्य हैं उनको देने से दाता के जन्मान्तर में भोजन के लिए-
मेद, रुधिर, मांस, मज्जा और हड्डी होजाता है ॥ १७६-१८२ ॥
अपांक्त्योपहता पंक्तिः पाव्यते यैर्द्विजोत्तमैः ।
तान्निबोधत कात्स्न्र्येनद्विजाग्र्यान्पंक्तिपावनान्॥ १८३॥
अग्र्याः सर्वेषु वेदेषु सर्वप्रवचनेषु च ।
श्रोत्रियान्वयजाश्चैव विज्ञेयाः पंक्तिपावनाः॥ १८४॥
त्रिणाचिकेतः पञ्चाग्निस्त्रिसुपर्णः षडङ्गवित् ।
ब्रह्मदेयात्मसन्तानो ज्येष्ठसामग एव च ॥ १८५ ॥
दूषित पंक्ति जिन श्रेष्ठ ब्राह्मणों से पवित्र होती है वे इस प्रकार
के होने चाहिएं-जो चारों वेदों के जाननेवाले और उसके अङ्गों
के जाननेवाले, श्रोत्रिय और परम्परा से वेदाध्यायी हैं वेही पंक्ति
पावन होते हैं । त्रिणाचिकेतनामक यजुर्वेद के भाग को पढ़ने
वाला ब्राह्मण, पञ्चाग्निहोत्री, त्रिसुपर्ण नामक ऋग्वेद के भाग को
पढ़नेवाला, शिक्षा आदि छः अङ्गों का ज्ञाता, ब्राह्मविवाह से पैदा
पुत्र और साम गान करनेवाला ये छः पंक्तिपावन जानना
चाहिए ॥ १८३-१८५ ॥
वेदार्थवित्प्रवक्ता च ब्रह्मचारी सहस्रदः ।
शतायुश्चैव विज्ञेया ब्राह्मणाः पंक्तिपावनाः ॥ १८६ ॥