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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

तीसरा अध्याय। ६१

तीसरा अध्याय। ६१
यक्ष्मी च पशुपालश्च परिवेत्ता निराकृतिः ।
ब्रह्मद्विट् परिवित्तिश्च गणाभ्यन्तर एव च ॥ १५४ ॥
कुशीलवोऽवकीर्णी च वृषलीपतिरेव च ।
पौनर्भवश्च काणश्च यस्य चोपपतिर्गृहे ॥ १५५ ॥
भृतकाध्यापको यश्च भृतकाध्यापितस्तथा ।
शूद्रशिष्यो गुरुश्चैव वाग्दुष्टः कुण्डगोलकौ ॥ १५६ ॥
अकारणपरित्यक्ता मातापित्रोर्गुरोस्तथा ।
ब्राह्मैर्योनैश्च सम्बन्धैः संयोगं पतितैर्गतः ॥ १५७ ॥
अपढ़, जटाधारी, दुर्बल, जुआरी, बहुत यजमानों को एक साथ
बैठाकर यज्ञ करानेवाला, द्रव्य लेकर पूजा करानेवाला, इन को
श्राद्ध में न खिलाये । वैद्य, पुजारी, मांस बेचनेवाला और वाणिज्य
से जीविका करनेवाला इनको हव्य-कव्य में न भोजन देवे । ग्राम
और राजा का हलकारा, खराब नखवाला, काले दाँतवाला, गुरु-
विरोधी, अग्निहोत्रत्यागी, व्याजखोर, क्षयरोगी, चरवाह, बड़े
भाई के विवाह बिना पूर्व ही विवाहित, पञ्चमहायज्ञ न करनेवाला,
ब्राह्मणद्वेषी, छोटे भाई के विवाह होने पर अविवाहित बड़ा भाई,
धर्मार्थ इकट्ठा किये धन से जीवन करनेवाला, नाच, गान से जी-
विका करनेवाला, ब्रह्मचर्य से भ्रष्ट, शूद्रा से विवाहित, पुनर्विवाह
का लड़का, काना, जिस के घर स्त्री का उपपति-जार रहता हो,
'वेतन लेकर पढ़ानेवाला, वेतन देकर पढ़ा हुआ । शूद्र का गुरु,
कटुभाषी, कुण्ड-पति के जीते जार से पैदा, गोलक-पति के मरने
पर जार से पैदा, बिना कारण माता, पिता और गुरु को त्यागने
वाला, पतितों को पढ़ानेवाला, पढ़नेवाला और पतितों से कन्या-
सम्बन्ध करनेवाला इन सब को श्राद्ध में कभी भोजन न कराना
चाहिए ॥ १५१-१५७ ॥
अगारदाही गरदः कुण्डाशी सोमविक्रयी ।

६२ मनुस्मृति ।
समुद्रयायी वन्दी च तैलिकः कूटकारकः ॥ १५८ ॥
पित्रा विवदमानश्च कितवो मद्यपस्तथा ।
पापरोग्यभिशस्तश्च दाम्भिको रसविक्रयी ॥ १५६ ॥
धनुःशराणां कर्ता च यश्चाग्रे दिधिषूपतिः ।
मित्रध्रुक् द्यूतवृत्तिश्च पुत्राचार्यस्तथैव च ॥ १६० ॥
भ्रामरी गण्डमाली च श्वित्र्यथो पिशुनस्तथा ।
उन्मत्तोऽन्धश्च वर्ज्याः स्युर्वेदनिन्दक एव च ॥ १६१ ॥
घर में आग लगानेवाला, ज़हर देनेवाला, जार से पैदा हुए
का अन्न खानेवाला, सोमलता बेचनेवाला, समुद्र पार जानेवाला,
राजा की स्तुति करनेवाला, तेल का व्यापारी, झूठी गवाही देने
वाला, पिता से लड़नेवाला, धूर्त, शराबखोर, कोढ़ी आदि पाप-
रोगी, निन्दित, पाखण्डी, दूध, दही बेचनेवाला, धनुष् और बाण
बनानेवाला, जो बड़ी बहिन के क्वारी रहते छोटी का पति बन
गया हो, मित्रद्रोही, जुवा से जीविका करनेवाला, अपने पुत्र से
विद्या पढ़नेवाला, मृगीरोगी, गण्डमालारोगी, श्वेतकुष्ठ, चुगल-
खोर, पागल, अन्धा, वेदनिन्दक इतने प्रकार के ब्राह्मण श्राद्ध में
वर्जित हैं ॥ १५८-१६१ ॥
हस्तिगोश्वोष्ट्रदमको नक्षत्रैर्यश्च जीवति ।
पक्षिणां पोषको यश्च युद्धाचार्यस्तथैव च ॥ १६२ ॥
स्रोतसां भेदको यश्च तेषां चावरणे रतः ।
गृहसंवेशको दूतो वृक्षारोपक एव च ॥ १६३ ॥
श्वक्रीडी श्येनजीवी च कन्यादूषक एव च ।
हिंस्रो वृषलवृत्तिश्च गणानां चैव याजकः ॥ १६४ ॥
हाथी, बैल, घोड़ा और ऊँटों का सिखानेवाला, नक्षत्र से