सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

छठवां अध्याय । १६५

छठवां अध्याय । १६५
आनिपाताच्छरीरस्य युक्तो वार्यनिलाशनः ॥ ३१ ॥
वानप्रस्थ-ब्राह्मण इन नियमों का या दूसरों का पालन करता
हुआ, आत्मज्ञान के लिए उपनिषद् की श्रुतियों का अभ्यास करे।
इन नियमों का धारण, ऋषि, ब्राह्मण और गृहस्थों ने भी अपनी
विद्या और तपस्या की वृद्धि और शरीरशुद्धि के लिए सदा किया
है। इसभांति आचार करते भी कोई रोग आदि होजाय, जो न
दूर हो सके तो केवल वायु का आहार करता हुआ, ईशान कोण
को शरीरान्त तक चलाजाय ॥ ३०-३१ ॥
आसां महर्षिचर्याणां त्यक्त्वान्यतमया तनुम् ।
वीतशोकभयो विप्रो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३२ ॥
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान्परिव्रजेत् ॥ ३३ ॥
इन महर्षियों के अनुष्ठानों में से कोई अनुष्ठान करके विप्र शरीर
को छोड़कर शोक, भय से रहित, ब्रह्मलोक में महिमा पाता है।
इस प्रकार आयु के तीसरे भाग को वन में बिताकर, चौथे भाग में
विषयादि वासना छोड़कर, संन्यास आश्रम को धारण करे ॥३२-३३॥
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रियः ।
भिक्षाबलिपरिश्रान्तः प्रव्रजन् प्रेत्य वर्धते ॥ ३४ ॥
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ॥ ३५ ॥
अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ३६ ॥
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः ॥ ३७ ॥

१६६ मनुस्मृति ।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणःप्रव्रजेद्गृहात् ॥३८॥
संन्यासाश्रम-धर्म ।
आश्रम से आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, उससे वानप्रस्थ
में जाकर और हवन, भिक्षा, बलि आदि से थका हुआ, संन्यास
लेनेवाला पुरुष देह त्याग करने पर मोक्ष पाता है। ऋषिरृण, देव-
ऋण और पितृऋण इन तीनों से छुटकारा पाने पर, मनको मोक्ष
धर्म में लगावे अन्यथा करने से नरकगामी होता है । विधि से
वेदाध्ययन-ऋषिऋण, धर्म विवाह से पुत्रोत्पादन—पितृऋण, यज्ञ
आदि—देवऋण, इनसे यथाशक्ति छुट्टी लेकर मोक्ष में चित्त ल-
गावे । जो पुरुष वेदादि का पठन न करके संन्यास लेता है वह
नरक में पड़ता है । सर्वस्व दक्षिणा की प्रजापति इष्टि को करके
और आत्मा में अग्नि का आधान करके ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण
करना चाहिए ॥ ३४-३८ ॥
यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् ।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥ ३६ ॥
यस्मादण्वपि भूतानां द्विजात्नोत्पद्यते भयम् ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ ४० ॥
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ४१ ॥
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् ।
सिद्धिमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ॥ ४२ ॥
अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ।
उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥ ४३ ॥