मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
चौथा अध्याय । १३३
चौथा अध्याय । १३३
समीप, कोई रोता हो उसके पास, और जहां बहुत मनुष्यों की
भीड़ हो, ऐसे स्थानों में अनध्याय करना । जल के बीच, आधी
रात को, मल-मूत्र करते, जूठे मुख से और श्राद्ध में भोजन करके,
मन से भी वेद मन्त्रों का स्मरण न करना । एकोद्दिष्ट श्राद्ध का
नेवता मानकर, राजमृत्यु होने पर और सूर्य-चन्द्र के ग्रहण होने
पर तीन दिन वेदाध्ययन न करना चाहिए ॥ १०६-११० ॥
यावदेकानुदिष्टस्य गन्धो लेपश्च तिष्ठति ।
विप्रस्य विदुषो देहे तावद्ब्रह्म न कीर्तयेत् ॥ १११ ॥
शयानः प्रौढपादश्च कृत्वा शौचावसक्थिकाम् ।
नाधीयीतामिषं जग्ध्वा सूतकान्नाद्यमेव च ॥ ११२ ॥
नीहारे बाणशब्दे च सन्ध्ययोरेव चोभयोः ।
अमावास्याचतुर्दश्योः पौर्णमास्यष्टकासु च ॥ ११३ ॥
जबतक एकोद्दिष्ट श्राद्ध का चन्दन और लेप का गन्ध शरीर में
रहे तबतक विद्वान् ब्राह्मण को अनध्याय करना चाहिए । सोता,
पांव पसारकर, दोनों घुटनों को बांधकर, मांस खाकर और जन्म-
मरण के सूतक का अन्न खाकर, अनध्याय करना । कोहिरा पड़े,
बाण शब्द हो, प्रातःकाल और सायंकाल की सन्धिमें, अमावास्या,
चतुर्दशी, पूर्णिमा और अष्टमी को अनध्याय मानना चाहिए॥१११-११३॥
अमावास्या गुरुं हन्ति शिष्यं हन्ति चतुर्दशी ।
ब्रह्माष्टमीपौर्णमास्यौ तस्मात्ताः परिवर्जयेत् ॥ ११४ ॥
पांशुवर्षे दिशां दाहे गोमायुविरुते तथा ।
श्वखरोष्ट्रे च रुवति पंक्तौ च न पठेद्द्विजः ॥ ११५ ॥
नाधीयीत श्मशानान्ते ग्रामान्ते गोव्रजेऽपि वा ।
वसित्वा मैथुनं वासः श्राद्धिकं प्रतिगृह्य च ॥ ११६ ॥
१३४ मनुस्मृति।
प्राणि वा यदि वाऽप्राणि यत्किञ्चिच्छाद्धिकं भवेत् ।
तदालभ्याप्यनध्यायःप्राण्यास्योहिद्विजःस्मृतः ॥११७॥
अमावास्या को वेदाध्ययन करने से गुरु का और चतुर्दशी को
शिष्य का नाश होता है। अष्टमी को पढ़ने से वेद भूल जाता है।
इस लिए इन सब अनध्यायों में वेदपाठ मना है। धूल की वर्षा,
दिशाओं का दाह, शृगाल, कुत्ता, गधा और ऊंटों के रोने पर और
ये सब पांत बांधकर बैठे हों, उस समय अनध्याय करना। श्म-
शान के पास, गांव के हद्द पर, गौओं के चरने के स्थान में, मैथुन-
समय के वस्त्र पहनकर और श्राद्ध में भोजन करके वेदपाठ न क-
रना चाहिए। कोई पदार्थ जीवधारी हो या जड़ हो, कुछभी श्राद्ध
में वस्तु देकर अनध्याय करना चाहिए। क्योंकि शास्त्र में ब्राह्मण
का हाथ ही मुखरूप है, इस लिए लेना ही भोजन माना
जाता है ॥ ११४-११७ ॥
चौरैरुपप्लुते ग्रामे संभ्रमे चाग्निकारिते ।
आकालिकमनध्यायं विद्यात्सर्वाद्भुतेषु च ॥ ११८ ॥
उपाकम्मणि चोत्सर्गे त्रिरात्रं क्षेपणं स्मृतम् ।
अष्टकासु त्वहोरात्रमृत्वन्तासु च रात्रिषु ॥ ११९ ॥
नाधीयीताश्वमारूढो न वृक्षं न च हस्तिनम् ।
न नावं न खरं नोष्ट्रं नेरिणस्थो न यानगः ॥ १२० ॥
चोरों के उपद्रववाले गांव में आग लगजाने पर और आकाश
किंवा पृथिवी में आश्चर्य घटना होने पर, उस काल तक अनध्याय
मानना। उपाकर्म और वेद के उत्सर्ग में तीन रात अनध्याय
मानना। अष्टका * और ऋतु के अन्त में एक दिन रात अनध्याय
करना। घोड़े पर, वृक्ष पर, हाथी पर, नाव पर, गधे पर, ऊंट
पर, ऊसर भूमि में और सवारी में बैठकर वेद न पढ़ना
चाहिए ॥ ११८-१२० ॥
- मार्गशीर्ष की पूर्णा के बाद कृष्णपक्ष की चार अष्टमी को 'अष्टका श्राद्ध' होता है।