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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

चौथा अध्याय । ११५

चौथा अध्याय । ११५
ब्राह्मण को ऋत से, अमृत से, मृत से और प्रमृत से या सत्य और
अनृत से जीविका करनी चाहिए। लेकिन श्ववृत्ति-नौकरी-गुलामी
से निर्वाह न करना चाहिए। उञ्छ और शिल को ऋत, बिना मांगे
मिलाहुआ अमृत, मांगी हुई भिक्षा मृत और खेती को प्रमृत कहते
हैं। सत्यानृत-सच-झूठ वाणिज्य-व्यापार को कहते हैं, उससे भी
जीविका चलाना श्रेष्ठ है। श्ववृत्ति-अर्थात् कुत्ता की वृत्ति-सेवा
को कहते हैं, इसलिए उसको छोड़ देना चाहिए ॥ ४-६ ॥
कुशूलधान्यको वा स्यात्कुम्भीधान्यक एव वा ।
त्र्यहैहिको वापि भवेदश्वस्तनिक एव वा ॥ ७ ॥
चतुर्णामपि चैतेषां द्विजानां गृहमेधिनाम् ।
ज्यायान् परः परो ज्ञेयो धर्मतो लोकजित्तमः ॥ ८ ॥
षट्कर्मैको भवत्येषां त्रिभिरन्यः प्रवर्तते ।
द्वाभ्यामेकश्चतुर्थस्तु ब्रह्मसत्रेण जीवति ॥ ६ ॥
ब्राह्मण इतना अन्न संग्रह करे जिसमें कोठी भरजाय, या छोटी
कोठरी भरजाने भरका अन्न संग्रह करे, या तीन दिन के गुज़र
लायक अथवा एकही दिन के प्रयोजन भरको इकट्ठा रक्खे। इन
चारों प्रकार के संग्रह को करनेवालों में अगला अगला ब्राह्मण श्रेष्ठ
माना जाता है और वह धर्म से स्वर्गफल को जीतनेवाला होता
है। इन चार प्रकार के गृहस्थों में ऋत आदि छ प्रकार की वृत्ति
से निर्वाह करना बड़े गृहस्थ के लिए है। जो साधारण कुटुम्ब
रखते हैं, वे यज्ञ कराना, वेदपढ़ाना और दान लेना इन तीन प्रकार
की जीविकाओं से निर्वाह करें। प्रतिग्रह-दान लेना जो नहीं
चाहते, उनको याजन और अध्यापन इन दो वृत्तियों से और चौथा
केवल वेद पढ़ाकर एकही वृत्ति से निर्वाह करना चाहिए ॥ ७-६ ॥
वर्तयंश्च शिलोञ्छाभ्यामग्निहोत्रपरायणः ।
इष्टीः पार्व्वायनान्तीयाः केवला निर्वपेत् सदा ॥ १० ॥

११६ मनुस्मृति ।
न लोकवृत्तं वर्तेत वृत्तिहेतोः कथञ्चन ।
अजिह्यामशठां शुद्धां जीवेद्ब्राह्मणजीविकाम् ॥ ११॥
सन्तोषं परमास्थाय सुखार्थी संयतो भवेत् ।
सन्तोषमूलं हि सुखं दुःखमूलं विपर्ययः ॥ १२ ॥
अतोऽन्यतमया वृत्त्या जीवंस्तु स्नातको द्विजः ।
स्वर्ग्यायुष्ययशस्यानि व्रतानीमानि धारयेत् ॥ १३ ॥
जो ब्राह्मण उञ्छवृत्ति से जीविका चलाता हो उसको सदा
अग्निहोत्र में तत्पर रहना चाहिए। और अमा, पूर्णा की इष्टि
आदि सहज यज्ञ करना चाहिए। जीविका के लिए दुनियादारी में
ज्यादा न फँसना चाहिए अर्थात् झूठी बड़ाई खुशामद वगैरह न करे,
किन्तु शुद्ध, निष्कपट बर्ताव रक्खे और बनियों की नौकरी न करके
पवित्र ब्राह्मण के सम्बन्ध में जीविका करनी चाहिए। सुख चाहने
वालों को चाहिए कि सन्तोषवृत्तिको रखकर जो मिले उसीमें
निर्वाह करे अधिक माया में न फँसे–सन्तोष सुखका मूल और
असन्तोष दुःखका मूल है। इसलिए ऊपर कही किसी एक जीविका
के सहारे सुख से काल बितावे और आगे कहे हुए व्रतों का
पालन किया करे ॥ १०–१३ ॥
वेदोदितं स्वकं कर्म नित्यं कुर्यादतन्द्रितः ।
तद्धि कुर्वन् यथाशक्ति प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ १४ ॥
नेहेतार्थान् प्रसङ्गेन न विरुद्धेन कर्मणा ।
न विद्यमानेष्वर्थेषु नार्त्यामपि यतस्ततः ॥ १५ ॥
इन्द्रियार्थेषु सर्वेषु न प्रसज्येत कामतः ।
अतिप्रसक्तिं चैतेषां मनसा संनिवर्तयेत् ॥ १६ ॥
ब्राह्मण को अपने वेदोक्त कर्मका आचरण नित्य निरालस होकर
करना चाहिए। उसको भरशक करने से परमगति को पुरुष प्राप्त