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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

ग्यारहवां अध्याय। ४२७

ग्यारहवां अध्याय। ४२७
अमानुषीषु पुरुष उदक्यायामयोनिषु ।
रेतः सिक्त्वा जले चैव कृच्छ्रं सान्तपनं चरेत् ॥१७४॥
मैथुनं तु समासेव्य पुंसि योषिति वा द्विजः ।
गोयानेऽप्सु दिवा चैव सवासाः स्नानमाचरेत् ॥१७५॥
चण्डालान्त्यस्त्रियो गत्वा भुक्त्वा च प्रतिगृह्य च ।
पतत्यज्ञानतो विप्रो ज्ञानात् साम्यं तु गच्छति॥ १७६॥
अमानुषी योनि, रजस्वला और जल में वीर्यपात करके सान्त-
पन व्रत करे । द्विज को पुरुष, स्त्री, बैलगाड़ी में, जल में और
दिन में, मैथुन करके वस्त्र सहित स्नान करना चाहिए । ब्राह्मण
अज्ञान से चाण्डाल, म्लेच्छस्त्री से गमन करके, भोजन करके
उनसे दान लेकर पतित होता है। और जानकर ऐसा कर्म करने
पर उनके समान होजाता है ॥ १७४-१७६ ॥
विप्रदुष्टां स्त्रियं भर्ता निरुन्ध्यादेकवेश्मनि ।
यत्पुंसः परदारेषु तच्चैनां चारयेद्व्रतम् ॥ १७७ ॥
सा चेत्पुनः प्रदुष्येत्तु सदृशेनोपयन्त्रिता ।
कृच्छ्रं चान्द्रायणं चैव तदस्याः पावनं स्मृतम्॥१७८॥
यत्करोत्येकरात्रेण वृषलीसेवनाद्द्विजः ।
तद्भैक्षभुग्जपन्नित्यं त्रिभिर्वर्षैरपोहति ॥ १७६ ॥
एषा पापकृतामुक्ता चतुर्णामपि निष्कृतिः ।
पतितैः संप्रयुक्तानामिमाः शृणुत निष्कृतीः ॥ १८०॥
दुराचारी स्त्री को उसका पति एक घर में बन्द करे और जो
पुरुष को परस्त्रीगमन में प्रायश्चित्त है वही उससे करवावे ।
किसी जातीय पुरुष के बहकाने पर फिर भी वह बिगड़ जावे तो
उसको चान्द्रायण व्रत करावे । एक रात चांडाली के साथ

४२८ :: मनुस्मृति ।
समागम से जो पाप द्विज करता है वह तीन वर्ष तक भिक्षा अन्न
खाकर गायत्री जप से दूर होता है । यह सब पाप करनेवाले चारों
वर्णं की शुद्धि कही है । अब पतितों के संसर्ग का प्रायश्चित्त
सुनो ॥ १७७-१८० ॥
संवत्सरेण पतति पतितेन सहाचरन् ।
याजनाध्यापनाद्यौनान्न तु यानासनाशनात् ॥ १८१ ॥
यो येन पतितेनैषां संसर्गं याति मानवः ।
स तस्यैव व्रतं कुर्यात्तत्संसर्गविशुद्धये ॥ १८२ ॥
पतितस्योदकं कार्यं सपिण्डैर्बान्धवैर्बहिः ।
निन्दितेऽहनि सायाह्ने ज्ञात्यृत्विग्गुरुसन्निधौ ॥ १८३ ॥
दासी घटमपां पूर्णं पर्यस्येत्प्रेतवत्पदा ।
अहोरात्रमुपासीरन् अशौचं बान्धवैः सह ॥ १८४ ॥
एक वर्ष तक पतितों के साथ एक सवारी वा आसन पर बैठने
से और एक पंक्ति में भोजन करने से उनको यज्ञकर्म कराने, वेद
पढ़ाने और विवाहसम्बन्ध करने से पतित होजाता है। जो मनुष्य
इन पतितों के साथ जो संसर्ग करता है वह उस संसर्ग की शुद्धि
के लिए वही व्रत करे। पतित प्रायश्चित्त न करे तो उसके स-
पिण्ड और ममेरे-फुफेरे भाई आदि निन्दित तिथिको सायंकाल
गाँव के बाहर जाति-पुरोहित-गुरुजनों के सामने जलदान करे।
दासी जल भरे पुराने घड़े को प्रेत के समान पैर से ठोकर देकर
फोड़ दे और सपिण्ड बान्धवों के साथ एक दिन-रात का
प्रायश्चित्त माने ॥ १८१-१८४ ॥
निवत्र्तेरंश्च तस्मात्तु संभाषणमहाशने ।
दायाद्यस्य प्रदानं च यात्रा चैव हि लौकिकी॥१८५॥