मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
ग्यारहवां अध्याय । ४२३
ग्यारहवां अध्याय । ४२३
अज्ञानात्प्राश्य विण्मूत्रं सुरासंसृष्टमेव च ।
पुनः संस्कारमर्हन्ति त्रयो वर्णा द्विजातयः ॥ १५१ ॥
वपनं मेखलादण्डो भैक्षचर्या व्रतानि च ।
निवर्तन्ते द्विजातीनां पुनः संस्कार कर्मणि ॥ १५२ ॥
अभक्ष्य-भक्षणप्रायश्चित्त।
अज्ञान में मद्यपान से संस्कार से शुद्धि होती है। जानकर पीने
का कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा है। मरणान्त में शुद्धि होती है-यही
मर्यादा है। जिसने सुरा और मद्य के पात्र का जल पिया हो वह
पांच दिन शंखपुष्पी का काढ़ा पिये । मद्य छूकर, देकर और
विधि से ग्रहण करके और शूद्र का जूठा जल पीकर, तीन दिन
कुशका उबाला जल पीये। सोमपान करनेवाला ब्राह्मण, मद्यप के
मुखगंध को सूंघकर तीन प्राणायाम जलका और घृतप्राशन करने से
शुद्ध होता है। अज्ञान से विष्ठा, मूत्र और मद्यका स्पर्श हुआ पदार्थ
खाकर द्विजातियों का फिर संस्कार होना उचित है। द्वितीयवार
संस्कार में द्विजातियों को मुण्डन, मेखला, दण्ड, भिक्षा और व्रत
धारण नहीं करना होता ॥ १४७-१५२ ॥
अभोज्यानां तु भुक्त्वान्नं स्त्रीशूद्रोच्छिष्टमेव च ।
जग्ध्वा मांसमभक्ष्यं च सप्तरात्रं यवान् पिबेत् ॥ १५३॥
शुक्तानि च कषायांश्च पीत्वामेध्यान्यपि द्विजः ।
तावद्भवत्यप्रयतो यावत्तन्न व्रजत्यधः ॥ १५४ ॥
विड्वराहखरोष्ट्राणां गोमायोः कपिकाकयोः ।
प्राश्य मूत्रपुरीषाणि द्विजश्चान्द्रायणं चरेत् ॥ १५५ ॥
शुष्काणि भुक्त्वा मांसानि भौमानि कवकानि च ।
अज्ञातं चैव सूनास्थमेतदेव व्रतं चरेत् ॥ १५६ ॥
४२४ मनुस्मृति ।
क्रव्यादांस्सूकरोष्ट्राणां कुक्कुटानां च भक्षणे ।
नरकाकखराणां च तप्तकृच्छ्रं विशोधनम् ॥ १५७ ॥
मासिकान्नं तु योऽश्नीयादसमावर्तको द्विजः ।
स त्रीण्यह्रान्युपवसेदेकाहं चोदके वसेत् ॥ १५८ ॥
ब्रह्मचारी तु योऽश्नीयान्मधुमांसं कथंचन ।
स कृत्वा प्राकृतं कृच्छ्रं व्रतशेषं समापयेत् ॥ १५६ ॥
विडालकाकाखूच्छिष्टं जग्ध्वाश्वनकुलस्य च ।
केशकीटावपन्नं च पिबेद् ब्रह्मसुवर्चलाम् ॥ १६० ॥
अभोज्यों का अन्न, स्त्री और शूद्र का जूठन खाकर और अभक्ष्य
मांस खाकर सात रात जव की लपसी खावे । सिरका आदि
सड़ी भोज्य वस्तु और काढ़ा पीकर बिना वमन किये द्विज शुद्ध
नहीं होता। गांव का सुअर, गधा, ऊंट, सियार, वानर और
कौआ का मूत्र, विष्ठा खाजाने पर, चान्द्रायण व्रत करे। सूखा
मांस, ज़मीन के फूल, अज्ञात और कसाईखाने का मांस खाकर
भी चान्द्रायण ही करे। कच्चे मांस खानेवाले, सुअर, ऊंट, मुरगा,
मनुष्य, कौआ और गधे का मांस खाने में आजाय तो तप्तकृच्छ्र
से शुद्ध होता है। बिना समावर्तन के जो ब्रह्मचारी द्विज, मा-
सिक श्राद्ध का अन्न खाय वह तीन दिन उपवास करे और एक
दिन जल में बैठे। जो ब्रह्मचारी किसी प्रकार मांस सेवन करले,
वह प्राजापत्य व्रत करे और बाक़ी ब्रह्मचर्य को खतम करदे।
बिल्ली, कौआ, चूहा, कुत्ता और नौला का जूठा और बाल,
कीड़ा पड़ा अन्न खाकर 'ब्रह्मसुवर्चला' का काढ़ा पीवे ॥१५३-१६०॥
अभोज्यमन्नं नात्तव्यमात्मनः शुद्धिमच्छता ।
अज्ञानभुक्तं तूत्तार्यं शोध्यं वाऽप्याशु शोधनैः ॥१६१॥