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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

आठवां अध्याय । २७३

आठवां अध्याय । २७३
ब्याज भी न देसके तो उसको मूलधन में जोड़ देय । जो रक़म
हो उसका सूद दिया करे ॥ १५१-१५५ ॥
चक्रवृद्धिं समारूढो देशकालव्यवस्थितः ।
अतिक्रामन् देशकालौ न तत्फलमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥
समुद्रयानकुशला देशकालार्थदर्शिनः ।
स्थापयन्ति तु यां वृद्धिं सा तत्राधिगमं प्रति ॥१५७॥
यो यस्य प्रतिभूस्तिष्ठेद्दर्शनायेह मानवः ।
अदर्शयन् स तं तस्य प्रयच्छेत्स्वधनादृणम् ॥ १५८ ॥
चक्रवृद्धि का आश्रय करनेवाला महाजन देश-काल के नियम
से ही ब्याज आदि पावे, मियाद गुज़रने पर पाने योग्य नहीं है।
समुद्र आदि के रास्ते देश-विदेश में व्यापार चतुर महाजन
जो आय-व्यय के अनुसार भाड़ा ब्याज आदि तै करे वही
प्रमाण है। जो मनुष्य जिसको हाज़िर करने के लिए प्रतिभू—
ज़ामिन हो वह उसे हाज़िर न कर सके तो अपने पास से उसका
ऋण चुकावे ॥ १५६-१५८ ॥
प्रातिभाव्यं वृथादानमाक्षिकं सौरिकं च यत् ।
दण्डशुल्कावशेषं च न पुत्रो दातुमर्हति ॥ १५६ ॥
दर्शनप्रातिभाव्ये तु विधिः स्यात्पूर्वचोदितः ।
दानप्रतिभुवि प्रेते दायादानपि दापयेत् ॥ १६० ॥
अदातरि पुनर्दाता विज्ञातप्रकृतावृणम् ।
पश्चात्प्रतिभुवि प्रेते परीप्सेत्केन हेतुना ॥ १६१ ॥
निरादिष्टधनश्चेत्तु प्रतिभूः स्यादलंघनः ।
स्वधनादेव तद्दद्यान्निरादिष्ट इति स्थितिः ॥ १६२ ॥
३५

२७४ : मनुस्मृति ।
मत्तोन्मत्तार्ताध्यधीनर्बालेन स्थविरेण वा ।
असंबंधकृतश्चैव व्यवहारो न सिध्यति ॥ १६३ ॥
सत्या न भाषा भवति यद्यपि स्यात्प्रतिष्ठिता ।
बहिश्चेद्भाष्यते धर्मान्नियताद्व्यावहारिकात्॥ १६४॥
ज़मानत का धन, फ़िजूल दान, जुये का रुपया, मद्य का रुपया
और जुर्माना का रुपया पिता के मरने पर उसके बदले, पुनः नहीं
दे सकता । सिर्फ़ हाज़िर करने की ज़मानत में पहली बात जाने ।
परन्तु ऋणी के बदले में क़र्ज़ अदा करने की ज़मानत वाला मर
जाय तो उसके वारिसों से भी दिलावे । क़र्ज़दार क़र्ज़ न दे
और ज़ामिन मरजाय तो महाजन कैसे अपना रुपया वसूल करे ?
किसी से नहीं। यदि ज़ामिन को ऋणी रुपया सौंप गया हो
और उसके पास भी खूब धन हो तो ज़मानती के मरने पर उसका
पुत्र ऋण चुकावे—यह धर्मशास्त्र की मर्यादा है। नशाबाज़, पागल,
दुःखी, पराधीन, बालक, बुड्ढा और सामर्थ्य के बाहर प्रतिज्ञा
करनेवाले का व्यवहार ठीक नहीं माना जाता । आपस की लिखा-
पढ़ी या ज़बानी ठहरी भी कोई बात यदि धर्म—क़ानून और
रिवाज़ के खिलाफ़ हो तो सच्ची नहीं मानी जाती ॥ १५६-१६४ ॥
योगाधमनविक्रीतं योगदानप्रतिग्रहम् ।
यत्र वाप्युपधिं पश्येत्तत्सर्वं विनिवर्तयेत् ॥ १६५ ॥
ग्रहीता यदि नष्टः स्यात्कुटुम्बार्थे कृतो व्ययः ।
दातव्यं बान्धवैस्तत्स्यात्प्रविभक्तैरपि स्वतः ॥ १६६ ॥
कुटुम्बार्थेऽप्यधीनोऽपि व्यवहारं यमाचरेत् ।
स्वदेशे वा विदेशे वा तं ज्यायान्न विचालयेत् ॥ १६७॥
कपट से किया हुआ बन्धक ( गिरवी ) विक्रय, दान, प्रतिग्रह
और निक्षेप—धरोहर कोभी लौटा देना चाहिए। यदि ऋणी मर