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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages
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( ७४ )

मुलतानबोध

ऐसा आघात लगा कि, जहाँ खड़े थे वहाँ ही वह अचेत होकर गिर गये और उसी अवस्थामें उस समय तक पड़े रहे जब तक बादशाह शाहजादी की अंतिम किया करके कब्रस्थानसे फिर कर आये। बादशाहके कबरसे लौटकर एकबार फिर भी रोने पीटने और हाथ बोय करनेकी वह धूम मची कि जिसका वर्णन करना कठिन है। उसी हाथ बोय शोककी चिल्लाहटमें अह्मशाहको चेत आया चेत आतेही उस समयकी सभा देखकर पागल विशिप्त चित्तके समान होकर वहाँसे वह चल पड़े। एक तो अंगेरी रात दूसरे शोकसे कातर अह्मशाह आधीरात तक तो जंगलमें इधर उधर भटकते औ ठोकर खाते रहे किन्तु आधीरातके पश्चात् प्रभु कृपासे भटकते २ शाही कब्रस्थानके निकट पहुँच गये। वहाँ जानेपर उनके हृदयको कुछ घैर्यसा हुआ और कुछ चेतना भी आयी फिर तो एक वृक्षकी आडमें खड़े होकर उन्होंने कब्रके रक्षकोंको ध्यान पूर्वक देखना आरंभ किया। संयोगवश दिनभरके थके हुए पहले वाले ऐसी निद्रामें अचेत हुए कि, उन्हें किसी बातकी सुधि न रही। पहलेवालोंको बेसुध देखकर इश्ककी तरंगमें एक ओरसे कनात फाड़ दिया और अन्दर पहुँचकर वह चोरोंके समान धीरे धीरे कबरतक पहुँचे। कब्रके निकट पहुँच कर वह प्रथम तो कब्रसे लपटकर थोड़ी देरके लिये अचेत होगये फिर चेत आनेपर उन्हें यह विचार आया कि, एकबार माशूकका दीदार कर लेना चाहिये। दीपक तो चारोंओर जलही रहे थे उसी प्रकाशमें उन्होंने कबरकी मिट्टी अलग करके ताबूतसे शाहजादीकी मृतक को बाहर निकाला और दीपकके सामने उसे लिटाकर उसके मुखको एकटक देखने लगे। देखते देखते उनके हृदयमें ऐसा तरंग उठा कि इसे अपने पर्णकुटीतक

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बोधसागर

( ७५ )

लेजाना चाहिये । बस । फिर क्या था कब्रकी मिट्टीको ज्योंका त्यों करके वह शाहजादीकी लाश उठाकर अपनी कुटीपर पहुँचे सद्गुरुकी ऐसी कृपा हुई कि, जबतक यह अपनी कुटीतक नहीं पहुंच गये तबतक किसी पहरेदारने करवट भी नहीं ली । अद्दमशाहने अपनी कुटीमें शाहजादी की लाशको दीवारके सहारे बैठा दिया और जंगली लकड़ियोंको जलाकर उसीके प्रकाशमें उस मृतकको सम्बोधन करके कहने लगा ।

होगयी आतश जब वहां शोआले जन ।
बैठा उसके हूबहू यह खिस्तःतन ॥
रोशनीमें आगके वह नीमजाँ ।
देखता था हुस्न हूए दिलस्ताँ ॥
बादिले पुरदई चश्मे अशकबार ।
देखता था उस परीरू की बहार ॥
गोरे तनपर वह उसके पैठा कफन ।
जामये शबनभमें गोया यासमन ॥
चिहरेका आलम कफनमें जो कि था ।
बिद कबदे चांदनीमें वह मजा ॥
करके उसकी लाशको अद्दम खिताब ।
यों लगा कहने जेराहे इजतराब ॥
ऐबुते संगीं दिले ना आशना ।
क्यों क्या मुझको बलामें मुबतिला ? ॥
क्योंकि दिखाकर दफतन अपनी फबन ।
रंजमें डाला था ऐ नाजुक बदन ॥
दई व गममें अपन करक मुबतला ।
एक मुदत तक मुझे रूसवा कि किया ॥

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( ७६ )

मुलतानबोध

मुझमें क्यों चाहेथी वह नादिर गोहर ।
दो बरसतक क्यों रखाथा बहू पर ॥
अहद गर तुझको वफा करना न था ।
मुझको जिन्दःछोडकर मरना न था ॥
तुझमें कुछ बूए वफादारी नहीं ।
यार होकर शवये यारी नहीं ॥
तुझको गर दुनियाँसे करना था सफर ।
साथ लेना था मुझको ऐ सीम्बर ॥
रुह तेरी बाद जन्नतको गयी ।
देगयी इस रक्त जाँको बेकली ॥
हालकी मेरी खबर भी है तुझे ।
कल नहीं पड़ती किसी करवट मुझे ॥
बाग जन्नतमें किया तूने वतन ।
मैं रहा बहरे अलम में गोते जन ॥
हैफ है सद हैफ दीदारे हबीब ।
बाद मरनेके हुआ मुझको नसीब ॥
वाह ऐ चर्ख सितमगर वाहवाः ।
तूने जालिम क्या सितम मुझपर किया ॥
जीस्त में माना रहा दीदार से ।
बाद मरनेके मिलाया यारसे ॥
देखलेती यह भी मेरी बेकली ।
जोबर आती सब तमन्नाये दिली ॥
इसको भी शायद था कुछ मेरा कलक ।
हो गयी जो दमके दम में जांबहक ॥
खागयी इसको गमँ पिनहानः इश्क ।

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बोधसागर

( ७७ )

आतशे उलफत तुफे सोजान इश्क ॥
कलल जालिम तूने दोनों को किया ।
इस परी रूसे जुदा मुझको किया ॥
जान इसकी तो हुई तनसे बदर ।
जिन्दगी में मैं हूँ मुर्दा से बतर ॥
यह तो मर कर हिज्रके गमसे छुटी ।
तलमलाहट मुझको है अबतक वही ॥
वहशिया की तरह अपना माजरा ।
कह रहा था उस परीरू स गदा ॥
वा जवाने हाल तो देती जवाब ।
इश्क है आसौ तरहके पेच ओ ताब ॥
मुझसे अपने दर्द गम कहता है क्या ।
मरगई मैं तूतो जिन्दा भी रहा ॥
इससे बरतर क्या है दर्द ओ रंज इश्क ।
जीती मैंने बाजिये शतरंज इश्क ॥
जीको अपने करदिया उसमें फना ।
मुझसे तू कहता है क्या यह माजरा ॥
देख कर अद्दम के यह रंजो महन ।
हो गया बहरे तरहुम मौजजन ॥
देख कर उसमर्दके दिलका कलक ।
जोश में आयी इनाय तहाय हक ॥
कुदरते हक ने किया असबाब जमा ।
जिससे यह दोनों हुए अहबाब ॥

इस प्रकार अद्दमशाह शाहजादी के मृतकसे अपने विरह की बातें करता और रोता जाता था उसकी ऐसी दशाको देखकर

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( ७८ )

मुलतानबोध

साहिबका कृपासागर लहराया । फिर क्या देर थी सब सामग्री इकट्ठी हो गयी । अर्थात् ।

भूलकर ज़ुल्मत से रहको कारवाँ । कुदरते हकसे वहाँ वादिदहुआ॥
अंधेरी रात के कारण कोई व्यापारी काफला राह भूल कर उसी बन में आकर उतरा । जाडेकी ऋतुके कारण जब काफलेके आदमी आगकी खोज करने लगे तब दूरसे आगके प्रकाश को देखकर एक आदमी अद्दमशाहकी कुटीपर भी पहुँचा । कारवाँमेंसे कोई मरदे खुदा । देखकर बनमें उजाला आगका ॥ दिलमें अपने पुरतः करके गुमाँ । खानए दुर्वैश है शायद यहाँ । आग लेने को वहाँ आया चला । ताकरे वह अपनी कुछ हाजतरवा॥ मुतसिलहुजरेके जब पहुँचा वह मर्द । रंग अद्दमका हुआ दहशतसे जर्द॥

उसकी आहट पाकर अद्दम तो मारे डरके घबरा गये और कुटीके कोनेमें बने हुए गुफामें छिप गये । इधर तो यह हुआ, उधर वह आदमी जब कुटीमें आया तो भीतरके दृश्यको देखकर एकदम घबरा गया । अद्दमशाहने समझा था कि, कबरके रक्षकोंको सब हाल मालूम होगया है इससे उन्हींमेंसे कोई मुझे पकड़ने आया है और उस आदमीको मालूम हुआ कि, न जाने यह क्या चला है कि, शून्यसान घरमें कफनसे ढकी हुई मृतक देह बैठी हुई है और सामने आग जल रही है किसी जीवित पुरुष का पता नहीं है । वह अपने मनही मन बहुत डर गया और पिछले पाँव फिरकर अपनी मंडलीमें गया । वहाँ जाकर उसने अपने सरदारको सब देखी हुई बातें एक एक करके सुनायीं जिसको सुनकर लोग बड़े आश्चर्यमें आये । कुछ देरतक शोच विचार करके मण्डलीके सरदारने काफलेके साथके वैद्य और अन्य कई मनुष्योंको साथ लेकर अद्दमशाहकी कुटीपर जाने-

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बोधसागर

( ७९ )

का विचार किया । और प्रथम मनुष्यको जो वह सब दृश्य देखकर आया था आगे करके कुटीपर जा पहुंचा ॥

थाक जाय कार उनमें एक तबीब । हाजिरको दाना बहुशियारो लबीब ॥
लेके साथ उसको अमीरे कारवाँ । सुनतेही इस बातके पहुंचा वहाँ ॥

थी जहां रौनक फिजा वह दूरजाद ॥

पहुंचे यह दोनों वहां मानिन्द बाद ॥

बे तअमुलबेतव कुफ केदवाँ । यह गयेवहरोशनथी आतशजहाँ ॥
जाके देख फिर हकीकत है वही । जिसतरहकहता था वहमरदेरही ॥
देखकर उस हालको शुसदर रहे । लबगुजाँ हैरत जदा मुजतररहे ॥
आइनेसाँ शक्क जब आयी नजर । होगये हैरान दोनों देख कर ॥
बोला आखिर वह हकीमें नुकतेदाँ । रंगमें सुदँके यह रौनक कहाँ ॥
वहां जाकर उन्होंने सब दृश्य वैसेही ठीक ठीक देखा जैसा उप-
र्युक्त मनुष्य ने कहा था । प्रथम तो वैद्य सहित वह व्यापारी
आश्चर्यमें आया किन्तु थोड़ी देर तक शाहजादीकी ओर ध्यान
पूर्वक देखनेपर वैद्यने जब कहा कि, यह औरत मरी नहीं किंतु
सकते के रोग से ग्रसित हो अचेत होगयी है तब तो उपरोक्त
( काफलेके ) सर्दार और भी अधिक आश्चर्य में आया उसने
वैद्य से कहा क्या यह ( शाहजादी ) अच्छी भी हो सकती है ?
वैद्य ने उत्तर दिया अभी अच्छा करता हूँ ! पश्चात् वैद्यने अपने
पाससे नशतर निकाल कर शाहजादीके हाथ की रग को
नशतर से छेदा जिससे रक्त बहने लगा । थोड़ी देर तक लोहू
निकलता रहा और जब दूषित रक्त शरीरसे निकल गया तब
शाहजादी सचेत हो गयी ।

सचेत होतेही शाहजादीने जैसेही आँख खोली अपने सामने
दो अपरिचित मनुष्योंको खड़े देखकर लज्जा और आश्चर्यमें

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( ८० )

सुलतानबोध

आकर चूँघट तानने लगी । तब तो अपने शरीर पर कफन देख कर भय और आश्चर्य में आई । फिर जब इधर उधर दृष्टि डालकर घरकी दशाको देखने लगी तब तो आश्चर्य, भय, लज्जा और व्याकुलता तथा शाही रोबह सबही उसके सन्मुख आकर खड़े होगये । एक दो क्षण तक तो पत्थरकी मूर्तिके समान चुप बैठी रही फिर चकित दृष्टि सन्मुखके खड़े आदमियोंसे शील और लज्जा पूर्ण वाणीसे इस प्रकार बात चीत करने लगी ॥

शर्मसे सरको किया फरो ।
पूछा उसने तुम बताओ कौनहो ? ॥
मैं कहाँ हूँ और है यह किसका मर्का ।
घरसे मुझको कौन लाया है यहाँ ॥
है कहाँ वह ताज व तखते जर निगार ।
जाँमें लालो कूजेहाए आबदार ॥
रवानए जरवफतपोश अपना कहाँ ।
मखमलो दीवारका फर्श अपना कहाँ ॥

शाहजादीने कहा, कि मेरे राजमहलसे उठाकर क्यों और किस प्रकारसे मुझे यहाँ जंगलमें कफन पहिना कर किसने बैठाया है ? इसका वृत्तान्त मुझसे कहो । शाहजादीकी बातोंको सुनकर हकीम और व्यापारीने उत्तर दिया कि, हम लोगोंने इन बातोंको कोई भी खबर नहीं है कि, तुम कौन हो ? तुम्हारा घर कहाँ है ? और यह घर किसका है ? तुम्हे कफन किसने पहिनाया है ? और यहाँ लाकर किसने बैठाया है ? हमारा कारवाँ अँधेरेके कारण मार्ग भूलकर इस ओर आ निकला था । हमारे साथ का एक आदमी आगको दूँदता दूँदता यहाँ आया और तुम्हे

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बोधसागर

( ८१ )

मृतकके समान किन्तु बैठी हुयी देखकर उसने डर कर पीछे पाँव जाकर हमको समाचार दिया । जिससे आश्चर्यमें आकर कौतूहल वश हम यहाँ तुम्हें देखनेको आये । यहाँ आकर हमारे हकीम साहिबने तुम्हें देखकर कहा कि तुम मरी नहीं हो किन्तु सकतेकी बीमारीमें अचेत होगयी हो । फिर उन्होंने तुम्हारी दवा करके अच्छा किया है जिससे अब तुम बात चीत करने को समर्थ हुयी हो । इतना कह कर व्यापारीने कहा इसके अतिरिक्त और हम कुछ नहीं जानते अब तुम अपना वृत्तान्त सच्चा सच्चा हमसे वर्णन करो कि, तुम कौन हो ? तुम्हारे माता पिता का नाम ग्राम क्या है ? औ तुम्हारे ऊपर क्या र बीती है ? ॥

कर न्याँ किस गुलिसताँ का गुल है तू ।

पायी है किस बोस्तों में रंग व बू ॥

इधर तो यह बातें होरही थीं उधर तहखानेमें बैठे हुए अद्दम-शाह कबरके पहरदारोंके भ्रमसे भयके मारे डरते हुए बडी सा-वधानी से कान लगाकर बाहरकी बातें सुन रहे थे । जब उन्होंने शाहजादीको बात करते सुन लिया तब उनकी और ही दशा होगई । अब बाहर निकलकर शाहजादीके पास जानेको बार बार वह साहस करने लगे । फिर तो गारके द्वार से उन्होंने मुहँ निकाल कर दोनों आदमियोंको बड़े ध्यानसे देखकर जब निश्चय करलिया कि, वे कबरके पहरदार नहीं हैं तब एकदम बाहर निकल आये । बाहर निकलकर उन्होंने कुटीके बाहर अन्धेरेमें खड़ा होकर शाहजादी और व्यापारीकी बात चीत सुनने लगे । और जब उन आदमियोंके रूप रंग और शारीरिक लक्षणों से यह बात निश्चय होगई कि, वे न तो जामूस हैं न कोई बुरे आदमी हैं तब आनन्दके समुद्रमें गोते खाते हुए एकदम कुटीके भीतर

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( ८२ )

सुल्तानबोध

जाकर खड़े होंगये और उपरोक्त दोनों नवागत पुरुषोंको देश कालके आचारके अनुसार नमस्कार आदि करके शाहजादीकी ओर देखते हुए खड़े होंगये ।

इनको वहाँ आता देखकर उनके वेष और स्वरूप परसे उन लोगोंने निश्चय किया कि, इस पर्णकुटी का स्वामी यही है । ऐसा निश्चय करतेही वहाँ और शाहजादीके पूर्ण वृत्तान्त जानने की पूरी इच्छा व आशा उनके हृदयमें निश्चय होगयी । उन लोगोंने अनुमानसे यह भी निश्चय कर लिया कि; हो न हो यह इस स्त्रीके ऊपर आशिक है जिससे प्रेममें पागल होकर इसके मृतक कहींसे यहाँ उठा लाया है अब क्षण २ में उनकी उत्कण्ठा बढ़ने लगी जिससे अधिक समय तक न ठहर कर न्यापारी और हकीमने अद्मशाहसे पूछा कि, ऐ बन्दः खुदा सच कहना तु कौन है ? और यह अन्तःपुष्प शोभामयी सुन्दरी कौन है ? तू इसे यहाँ कहाँसे और किस प्रकारसे लाया है ? सब वृत्तान्त सत्य २ कहदे । उनकी बातको सुनकर अद्मशाहने आदिसे अन्त तक शाहजादीपर आशिक होना; वजीरका मोती माँगना, दो-वर्षतक संसारमें भटककर मोती लाना, फिर वजीरकी प्रतिज्ञा भंग करके उन्हें मारकर फेकवा देना, चेत आनेपर शाहजादीकी मृत्युका समाचार पाकर कबर स्थानमें जाकर पहले वालोंकी आँख बचाकर कम्ब खोदकर लाश बाहर निकालकर लाना आदि सब वृत्तान्त कह सुनाया । अद्मशाहके आश्चर्यमय वृत्तान्तको सुनकर उन दोनोंके सहित शाहजादी भी चकित होगयी । अपने लिये अद्मशाहके महान कष्ट उठानेकी बात और उसके सच्चे प्रेमके वृत्तान्तको सुनकर शाहजादी भी मनही मन उनपर आशिक होगयी ।

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बोधसागर

( ८३ )

इशकने अद्भमके वह तासीरकी ।
वह परीरू उस पैँ आशिक हो गयी ॥
देखकर एहवाल अद्भमका तबाह ।
चश्म नम गमसे हुई वह रश्केमाह ॥
गुजरी जो जो उसपैँ थी तकलीफ ओ दर्द ।
सुनके दुखतर होगयी दहशतसे जर्द ॥
देखकर अद्भमको यों पज मुद्दैं हाल ।
आया दिलमें उस परीरूके रुयाल ॥
मोरी खातिर इसने यह रंजो बला ।
लेके सरपर कर दिया जीको फिदा ॥
खीचकर क्या र अजीत औ बला ।
मिहनतो तकलीफो रंजै लादवा ॥
बाद मरनेके भी यह आशुफतः हाल ।
लाश मेरी कब्रसे लाया निकाल ॥
इसके बायस फिर खुदाने दी हयात ।
जीस्तका मेरी सबब है इसकी जात ॥
गर न होता मुझपैँ आशिक यह जवाँ ।
कब्रमेंसे क्यों यह फिर लाता यहाँ ॥
रुकके दम यकदममें मैं होती फना ।
जिस्म होता तमए मूरों मारका ॥
थी यह इसदुर्वैशकी तासीर इशक ।
मुर्दा जिन्दाहो है यह तदबीरइशक ॥
जीस्त दुनियाकी है बसख्वाबोरुयाल ।
इस जहाँकी इशक पर तु खाक डाल ॥
तालिबे दुनिया न हो अब जीनहार ।

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( ८४ )

सुलतानबोध

दिलसे करतूभी फकीरी अखतियार ॥
है यह जबतक यह जिन्दगी मुस्तआर ।
कर इसे मसहूफ यादे किर्दगार ॥
लज्जते दुनिया यदूँ से दरगुजर ।
यादहकमें बांध चुस्त अपनी कमर ॥
दमजो बाकी है न इनको यों गँवा ।
सीख इस दुर्वैश से राहेखुदा ॥
जीतेजी तू आपको सुर्दाबना ।
खाकमें इस जिसम खाकीको मिला ॥
कर इसी दुर्वैशसे अपना निकाह ।
दोनों आलममें होता तुझको फलाह ॥

शाहजादी मनहीमन अद्दमशाहके साथ रहकर अपना जीवन व्यतीत करने का प्रण कर रही थी इनमें व्यापारीने अद्दमशाह और शाहजादी दोनोंको सम्बोधन करके कहा कि, तुम दोनों के वृत्तान्त ज्ञात हुए । तुम दोनोंकी दशा ऐसी है कि, परमात्माने दोनोंको परस्पर एक दूसरेके प्राण रक्षा का कारण बना दिया है, अब तुम लोग यह कहो कि, तुम्हारी इच्छा क्या है ? अब तुमलोग क्या करना चाहते हो ? यदि तुम्हे हमारे साथ चलना हो तो संध्याको अपना कारवों यहाँ से जानेवाला है हमारे साथ चले चलो तुम्हे किसी प्रकारसे दुख न होगा । हम अपनी शक्ति अनुसार तुम्हारी सेवामें कदापि नहीं चूकेंगे । यदि हमारे साथ चलना स्वीकार न हो तो जो तुम्हारी इच्छा हो सो प्रकट करो ।

सौदागरकी बातको सुनकर परम कृतज्ञता प्रकट करते हुए अद्दमशाहने कहा कि, यदि मेरा रोम २ जिह्वा बनजावे तब भी तुम्हारी भलाईका पुरस्कार मुझसे नहीं दिया जा सकता । तुम्हारी

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बोधसागर

( ८५ )

ही कृपासे शाहजादी फिर जीवित होकर मेरे जीवनका कारण बनी है तुम्हारे इस पुण्यका फल परमात्मा तुम्हें देगा किन्तु जबतक मेरे शरीरमें प्राण है तब तक मैं तुम्हारा कृतज्ञ रहूँगा। अब सुझे सिवाय शाहजादीसे विवाह करनेके किसी प्रकारकी और इच्छा नहीं है। यदि यह स्वीकार करलेतो धर्मानुसार तुम दोनों अपने सन्मुख साक्षी बनकर हम दोनोंका सम्बन्ध जोड़ दो।

अब्दमशाहकी बातको सुनकर व्यापारीने शाहजादीको कहा कि, हे शाहजादी! यदि अब्दमशाह न होता तो तू कब्रकी कब्रमें मरकर संसारसे चलबसी होती। इसके अतिरिक्त उसने तेरे लिये कैसे २ कष्ट उठाये हैं अब उचित है कि, तू भी उसे स्वीकार करले इस प्रकारसे अनेक बातोंके समझानेपर शाहजादीने उत्तर दिया कि, आप लोगोंकी मैं बहुत कृतज्ञ हूँ आप लोगोंकी आज्ञा कदापि उल्लंघन नहीं कर सकती किन्तु अब्दमशाह इस बातका प्रण करे कि, वह कभी मुझसे अलग न होगा और न कभी मेरी आज्ञासे बाहर जायगा तब मैं इसको स्वीकार करूँगी और मेरे विवाह का यही मुद्दर होगा।

शाहजादीकी बातको सुनकर अब्दमशाह आनन्दके मारे उछल पड़े और शपथ पूर्वक शाहजादीके कहे अनुसार प्रतिज्ञा करके शाहजादीके उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे। फिर शाहजादीने व्यापारी और हकीमसे कहा कि शरअ ( मुसलमानी धर्मशास्त्र )

१ मुसलमानी धर्मानुसार विवाह करनेके समय बरकी ओरसे कन्याके लिये मुहर की रीतिपूरीकी जाती है। जिसमें बर अपनी प्रतिज्ञाके साथ २ नियत रुपया या अशरकी का दस्तोबेज अपनी स्त्रीके नामसे लिख देता है कि, वह आजसे उसके इतने रुपयाका ऋणी हुआ प्रथम तो कभी वह उस स्त्रीको छोड़ेगा ही नहीं यदि किसी कारणवश उसे छोड़ना चाहें अमुक रकम देकर केही छुटकारा पा सकेगा जब तक वह ऋण उसका न चुकादे तब तक वह उसको कदापि नहीं छोड़ सकता इसीका नाम मुहर है शाहजादीने अपना मुहर यही मांगा कि, यावज्जीवन अब्दमशाह छोड़कर कहीं न जावे।

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( ८६ )

सुल्तानबोध

के अनुसार विवाहके लिये दो साक्षीकी आवश्यकता है सो तुम दोनों हमारे विवाहके साक्षी हो जाओ जिसमें लोक परलोकमें हम पापके भागी न होंवे तब मैं विवाहको स्वीकार करूँगी । उन दोनोंने शाहजादीके बचनको मानकर साक्षी बनना स्वीकार किया और दोनोंकी गांठ जोड़ ( पाणिग्रहण ) करा दिया । पश्चात् वे दोनों तो अपने कारवानमें चले गये और अह्मशाह शाहजादीको पाकर परम आनन्दित हो अपनी पर्णकुटीमें बास करने लगे ॥

दोनोंमें परस्पर ऐसा प्रेम हुआ कि, कोई किसीके वियोग को क्षणमात्र के लिये भी सह नहीं सकता था । जड़लके फल फूल पत्ते और कन्द मूलपर वे अपना दिन बिताते और स्वर्गसे भी बढ़के आनन्दको मनाते थे ॥

कुछ दिनोंके पश्चात् शाहजादी गर्भवती हुयी और समय पूरा होनेपर परम सुन्दर पुत्रको प्रसव किया । उसी पुत्रका नाम अह्म शाहने इब्राहीम रक्खा । किताबोंमें लिखा है कि, अह्मशाहके संग के प्रतापसे शाहजादी भी सर्वशुभ गुणोंसे सम्पन्न महान् तपस्विनी और भजनानन्दी होगयी थी । जिस समय उसे गर्भ स्थित हुआ था उस समय समस्त बन नाना प्रकारके फल फूल और मेवोंसे सम्पन्न हो गया था । सदा वसन्त ऋतुकाही आनन्द वहाँ दीखने लग गया था । नाना प्रकारके पशु पक्षियों ने आकर वहाँ बास किया था । जिससे वह बन कानन बनकर स्वर्गके समान सुख-दाई हो रहा था । इब्राहीमके जन्म लेनेपर उनकी आकृति सम्पूर्ण रूपसे हजरत इब्राहीम खली लुछासे मिलती थी इसी कारणसे उनका भी नाम इब्राहीम रक्खा । जिस समय शाह-इब्राहीम का जन्म हुआ वह एक सो एकसठ ( १६१ ) हिजरी थी।

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बोधसागर

( ८७ )

माता पिताने बड़े प्रेमसे इब्राहीमको पालना आरम्भ किया । दो वर्षके पश्चात् उनको अन्न प्राशन कराया ॥

दो बरस पूरेका जब वह हो गया । और गिजा फिल जुमले वह खाने लगा ॥
गैबसे आने लगनेा दिरत आम । कुदरते एजिदसे उसको विलदवाम ॥
उसकी बर्कत से लगे अशजार पर । अच्छी अच्छी वज अकेशीरी समर ॥
कुदरते हकसे हुआ वह दशतोबर । गुलशनों गुलजार पर भी फौकतर ॥

आखिरकार देखते देखते बालक इब्राहीम सात बरसके हो गये । अब अह्मशाहको इस बातकी चिन्ता हुई कि बालकको विद्या अभ्यास कराना चाहिये सबसे पहले जैसा मुसलमानोंमें रीति है बालकको कुरान पढ़ाना आरम्भ किया । जब कुछ दिनों तक घेरमेंही पढ़ाकर देख लिया तब एक दिन बालकको गोदमें लेकर अह्मशाह शहरमें गये वहाँ दूँदते दूँदते एक सज्जन मोलवी साहेब मिले जिनके यहाँ इब्राहीमके पढ़नेको ठीक करके उनसे कह दिया कि, सबेरे मैं इब्राहीमको यहाँ रख जाया करूँगा और शामको आकर लेजाया करूँगा ।

अलगरज हर सुबह वह मढ़नेको ।

लाता उस मुकतबमें इब्राहीमको ॥

उलफते कलवीसे अपने विलदवाम ।

फिर उन्हें लेनेको आता वक्त शाम ॥

था यही हररोज अह्मका शआर ।

आते जाते शहरमें विलइजतरार ॥

थी जेबस शफकत उन्हें बेइन्तहा ।

तनहा आना जाना दिलपर शाकथा ॥

( इब्राहीम अह्मका बादशाह बनना )

जबसे बलखके बादशाहकी इकलौती बेटीका उससे वियोग हुआ तबसे बादशाह बहुत उदास और दुखी रहने लगा ।

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( ८८ )

सुलतानबोध

उसका चित्त संसारसे उदास हुआ वह सदा दुर्वैश फकीर और ईश्वरके भक्तोंके संगमें रहने लगा । जहाँ किसी महात्माका समाचार पाता वहीं उनके दर्शनको चला जाता और अपनी शान्ति के लिये उनसे प्रार्थना करता । दूसरी आदत उसकी सदासे यह थी कि, जब कभी वह शहरमें निकलता तब मदरसे और मुकतबोंमें जाकर लड़कोंका पढ़ना सुनता और उन्हें मिठाई वगैरह देकर खुश करता और शिक्षकों को इनाम देकर लड़कोंको छुट्टी दिलाता । इसके अतिरिक्त एक संतने भी उसे कहा था कि, मुकतबके लड़कोंको खुश रखनेसे तेरी सुराद कभी न कभी पूरी होजायगी । सो एक दिन बादशाहकी सवारी संयोगसे उसी मुकतबके पाससे निकली जिसमें इब्राहीम अद्दम पढ़ते थे । जिस समय बादशाहकी सवारी मुकतबके पास पहुँची उस समय बादशाहके कानमें बहुत मीठा और रीतिके अनुसार कुरान पढ़ते हुए किसी बच्चेका शब्द सुनपडा । बादशाहने एकदम सवारी रोकली और कुछ देरतक वहाँ ही खड़ा खड़ा सुनता रहा । फिर तो उस शब्दपर इतना मोहित हुआ कि, सवारीसे उतरकर मुकतब में पहुँचा ।

गुजराउसमुकतबकेआगे नागहाँ । मसहफइब्राहीमपढताथाजहाँ ॥
बादशाहने जब सुनीउसकीसदा । दिलपैउसकेकछुअसरपैदाहुआ॥
करकेउजाअपनेउसघोडेकोखड़ा । पढना इब्राहीमका सुनतारहा ॥

मुखरिजै इलफ़ाज उसके महवशद ।

सुनके अश अश कर गया हर जीखरद॥

था हमेशासे तरीका शाहका ।

जिस जगह मुकतब सरेरह देखता ॥

सुनता पढना जाके हरेक तिफ्लका ।

करता फिर इन आम हरयकको अता ॥

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बोधसागर

( ८१ )

आता पठना जिसका खातिरमें पसन्द ।
उसको देता नकद औरों से दो चन्द ॥
देके जर उस्ताद को शाहे निकों ।
छुट्टी दिलवाता था फिर हर तिफलको ॥

अपने सदा की आदतके अनुसार बादशाहने मुकदंबके हर एक लडके का पठना सुना और सबको इनाम भी दिया । परन्तु जब इब्राहीम की बारी आयी तब उस छोटेसे बच्चे का शुद्ध शुद्ध पठना, उसकी अदब के साथ बात चीत और उसके रंग रूप को देखकर बादशाह एकदम आश्चर्य सागर में गोता खाने लगा । उसके हृदयमें उस बच्चे का इतना प्रेम प्रवाह उमड़ चला कि वह हैरतमें पड़ गया । आखिर अपने प्रेम प्रवाह को रोक नहीं सका एक दम इब्राहीम को गोदमें उठाकर प्यार करने लगा । यद्यपि बादशाही रोंब दाब से यह बात कदापि मुमकिन नहीं थी तथापि अन्तर्गत हृदयमें किसी अनजानी शक्तिने ऐसा काम किया कि बादशाह अपना पद एक दम भूल गया और इब्राहीम को उठाकर गले लगा लिया । इब्राहीम के हृदय में भी खून ने जोश मारा वह भी बादशाह के हृदय से चिपट गया । अब बादशाहके हृदय पर और भी बड़ा भारी प्रभाव पड़ा ।

जुज्वको है जुज्वसे पैवस्तगी ।
खून को है खून से दिलवस्तगी ॥
दाब शाही से यह विलकुल दूर था ।
लेकरह इस अमरमें मजबूर था ॥
दिलको अपने जब्रगो उसने किया ।
जोश उलफतपर न उससे रुकसका ॥

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(१०)

मुलतानबोध

जुज्वको है गचै जायद इजतरार ।
कलको भी बेजुज्वके कबहो करार ॥
गो नहीं जाहिरका पैगामों सलाम ।
जुज्व कलमें है मगर पिनहाँ कलाम ॥
दिलको हरेकके खलिश है जो यहाँ ।
है अनासिरकी कशिशयह ऐ जवाँ ॥
जज्व अपने जुज्वको करते हैं कल ।
उस कशिशका है बदनमें शोरोगुल ॥
हरबशरको है जो दिलमें इजतराब ।
खींचती है उसको पिनहानीतनाब ॥
रिश्तए उलफसे रहता है बंधा ।
जुज्व अपने कुलके साथऐबाखुदा ॥
जुज्व तनको है जो कुलके साथरन्त ।
है कशिशसे उसकी तेरी अकलखब्बत ॥
अपनी गुलफतसे तुझे है यह गुमाँ ।
मुझको जोफे कलब और मादा है अयाँ ॥

बादशाह दिल भरके इब्राहीमको प्यार कर लेने पर जैसे
ही गौर से उसकी ओर देखने लगा वैसे ही उसे अपनी लडकी
की याद आयी । लडकी की याद आतेही उसकी सुरत बाद-
शाह के सामने आ खड़ी हुई । अब बादशाह देखता है तो इब्रा-
हीमकी और उसकी लडकी की शकल में बाल बराबर भी भेद
नहीं है । कहते हैं कि, उस समय बादशाह इतना रोया कि,
उसका चेहरा लाल हो गया और आगे के कपडे आँसू से भीग
गये । फिर जब मन कुछ ठहरा तब बादशाहने मुल्लाजीसे पूछा
कि,—यह लडका कहाँ रहता है ? इसका बाप कौन है ? यह

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बोधसागर

( ११ )

यहाँ कितने दिनोंसे पढने आया है ? मुल्लाजीने बादशाहके प्रश्नोंका यथायोग्य उत्तर दे दिया ।

दस्त बस्तः यों मुअलिमने कहा । बाप इसका है फकीरे बेनवा ॥ रहता है सहरामें आबादीसे दूर । अहल दुनियासे निहायत है नफ़ूर ॥ अह्म उसका है लकबएनेकपै । इस पेसरका नाम इब्राहीम है ॥ एक बरस गुजरा कि पढनेको यहाँ । आता है यहतिफलेशाहेजहाँ ॥ सुबहको लाता है बाप इसका यहाँ । शामको लेजाता है आकर वहाँ ॥ है जेवस दुर्वैश वह साफी निहाद । है मुझे हृदसे ज्यादा एतकाद ॥ जसतन अल्लाह इसे बहरेसबाब । याद करवाता हूँ रब्बानी किताब ॥

मुल्लाजीकी जबानी अह्मशाहका नाम सुनतेही बादशाह चौंक उठा । उसे पहलेकी सब बातें :—अह्मशाहका शाहजादी पर आशिक होना, उसका मोती लाना, वजीरका उसे धक्का देकर निकाल देना उसके छातीपर सुक्का मारना और शाहजादीका मर जाना इत्यादि-याद आगयीं । तब बादशाहने अपने मनमें अनुमान किया कि, हो नही इसमें जरूर कोई छिपा हुआ भेद है । नहीं तो इस बालकके ऊपर मेरा इतना प्रेम क्यों होता ? दूसरे इसका रूप मेरी बेटीसे पूरा पूरा मिल रहा है । सो इसमें अवश्य कुछ भेद छिपा हुआ है । इसलिये इस बालकको अपने महलमें लेचलकर बादशाह बेगमको दिखलावें जिसमें उसके हृदयमें कुछ संतोष हो । इतना सोचकर बादशाह इब्राहीमको गोदमें लिये हुए उठ खड़ा हुआ और मुल्लाजीसे कहा कि, जब इस लड़के का बाप आवे तब उसे मेरे पास भेज देना वहीं से वह अपना लडका ले जायगा । फिर मुल्लाजीको बहुत कुछ इनाम देकर रवाना होगया ।

महलमें पहुँचकर बादशाहने बेगमको बुलाकर इब्राहीमको

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( ९२ )

मुल्तानबोध

उसकी गोदमें रख दिया । बेगमने जैसेही इब्राहीमको गौर करके देखा वैसेही लडकीकी शकल देखकर एकदम बेहोश होकर गिर पड़ी । फिर तो महलमें धूम मच गयी । बेगमको होशमें लानेके सैकड़ों उपाय किये गये । जब वह होशमें आयी तब इब्राहीमको गोदमें लेकर बार बार बलाई लेने और नाना प्रकार के संकल्प विकल्प मनमें करने लगी ।

गोदमें फिर उसको लेकर नागहाँ । साँस ठंडीभरके करती थी व्यों ॥
ऐ मेरे लखते जिगरके हम शबीह । ऐ मेरे नूरे बरसके हम शबीह ॥
ऐ मेरे रशके कमरके हमसिफत । ऐ मेरे गुल वर्गतरके हम सिफत ॥
ऐ मेरे उस गुलबदनके हम अनाँ । ऐ मेरे शीरी दहनके हमनिशाँ ॥
ऐ मेरे उस लाबुते चींके करीं । ऐ मेरे आहुये मिराकीके करीं ॥
ऐ मेरे ताबिन्दः अखतरकी शबीह । ऐ मेरे मेहरे मनौवर की शबीह ॥
ऐ मेरे नादीदः दुनियाके मिसाल । ऐ मेरे फरजन्द जेबाके मिसाल ॥
ऐ मेरे युसुकके हमतजाँतराश । ऐ मेरे लैलाके हमवज अवकमाश ॥
ऐ मेरे जाने जहाँके हम अनाँ । ऐ मेरे गुंचः देहाँके हम अनाँ ॥
ऐ मेरे उस मूकभरके हम कमरा । ऐ मेरे याकूत लबके हम गोहर ॥

देताहै हर जुज्व तेरा बे गुमाँ ।

युसुफे गुमगश्तः मेरे का निशाँ ॥

है जो हर हर जुज्व तेरा बिलएकीं ।

यादगार लैलीय महमल नशी ॥

इस प्रकार अनेक तरहसे बेटीका स्मरण कर लेनेके पश्चात् बेगम ने इब्राहीम से पूछा कि, तेरी माँ और बापका नाम क्या है ? इब्राहीमने बापका नाम अह्मशाह और माँका नाम वही बतलाया जो बादशाह की लडकीका नाम था ।

शाहकी दुखतरका जो कुछ नाम था । वही इब्राहीमने माँका लिया ॥

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बोधसागर

( १३ )

और बतायानामअद्दम बापका । दशतमें अपनीकहीरहनेको जा ॥

अद्दम शाहके नाम को बलख निवासी स्त्री पुरुष बच्चे से बूढे तक सभी जानते थे । क्यों कि वह शाहजादी पर आशिक था । और शाहजादीका मरजाना भी अद्दमशाहके ही शापका फल लगाना मान रखा था । यही कारण हैकि, अद्दमशाहको सब लोग महात्मा सिद्ध समझते थे । इब्राहीमके मुखसे बादशाह-जादी और अद्दम दोनोंका नाम सुनकर लोगोंको बड़ा आश्चर्य हुआ । बादशाह और बेगमके अन्तःकरणमें न जाने कितनी करुपनाएँ आती थीं और कितनी आशा और निराशा उनके चारों ओर फिर रही थीं । आखिर बादशाह बेगमने अपने हाथसे इब्राहीमको स्नान कराकर अच्छे २ कपडे पहनाया और उत्तम उत्तम पदार्थ उसे खानेको दिया । फिर बादशाह इब्राहीमको बेगमके पास छोड़कर अपने खानगी स्थानमें जा बैठा और इस भेद पर विचार करने लगा । अन्तमें बादशाहने निश्चय किया कि, अद्दमशाहसे इनका वृत्तान्त पूछना चाहिये वह संसार त्यागी फकीर है वह कदापि झूठ नहीं बोलेगा ।

बादशाहके दिलमें आया यों रुयाल ॥

पूछिये अद्दमसे उस दुखतर का हाल ॥

फर्कऊसकीरास्त गौरीमें नहीं । जो कहेगा वह सच्चहै बिल यकीं ॥
मर्द हकहै पाय बन्दे रास्ती । झूठ हर्गिज न बोलेगा कभी ॥

इतना विचार कर बादशाहने दरवान को बुलाकर हुकम दिया कि अगर कोई लड़का लेने आवे तो उसे द्वारपर मत रोकना बल्कि उसे सीधा मेरे पास पहुँचाना । उसको प्रतिष्ठापूर्वक ले आना, खबरदार उसके मनमें किसी प्रकारसे बुरा न लगने पावे इतना हुकम देकर बादशाह अद्दमशाहकी इन्तजारी करने लगा ।