कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना और अधिकारी हंसोंका साथ जाना
( ५० )
जगजीवनबोध
सुनो हंस गहो पद सांची । ध्यान विदेह में रहि हो रांची॥
इतना कहि सतगुरु बतलावा । सबको विदेह ध्यान समझावा॥
ध्यान पाइ आनन्द सबै भयञ्ज । सतगुरुदरश प्रत्यक्षहि पयञ्ज ॥
फिर सतगुरु राजहि समझावा । सब हंसन को करहु चितावा ॥
पुनि हंसनसे अस प्रभु भाख्यो । हमरे ठौर राय तुहि राख्यो ॥
हम सम रायको सबही जानो । हमसन राय को अन्त न मानो॥
तब सदगुरु तहाँ ते पगुधारा । सब हंसन दुख भयो अपारा ॥
चलत गुरु सब सीस नवाया । करि मिलाप गुरु कण्ठ लगाया॥
तुम सों राजा कहू चितायी । रहो सदा शब्द लवलायी ॥
चले गुरु समरथ जेही वारा । रोवै हंस बहैं जल धारा ॥
जैसे रंकहि रतन हिराना । जैसे भुजंग मणी विसराना ॥
मानि सतगुरु आज्ञा लीना । विदेह ध्यान गुरु दर्शन दीना ॥
ध्यान पाइ गुरु करें सब भक्ती । काल नाल सब छूटी युक्ती ॥
केते दिवस ऐसे चलि गयञ्ज । तबही राजा आगम पयञ्ज ॥
सब हंसनको वेगि बुलायी । राजा कहै शब्द बतलायी ॥
राजा वचन
जेहि कारण हम भक्ति कराई । सो दिन अब पहुँचा है आई ॥
ताल पखावज वेगि लै आओ । शब्द चलावा मंगल गाओ ॥
बाजा बाजे बहुत वधायी । सबै त्रिया मिलि मंगल गायी ॥
सब ही लोक खबर यह पायी । राय जगजीवन लोक सिधायी ॥
पाटन नगर में बहुत उछावा । घर घर तिरिया करे बधावा ॥
बैठे राजा आसन धारी । जुरे हंस जहाँ बहुत अपारी ॥
ले परवाना बन्दगी कीना । सबही हंस परिकरमा दीना ॥
रानी पांच कुँवर दौय जाना । ❁ दासी चार हजुरी साना ॥
• इसके विरुद्ध दूसरों पुस्तकोंमें इस प्रकार लिखा है
जब राजा एक शब्द उचारा । कौन कौन चले हमारे लारा ॥-