कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)
कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)
द्वारा संशोधित
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अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ५ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
मूल्य : १२० रुपये मात्र ।
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कबीरपंथके प्रधान आचार्य
A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.
श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब
THE NEW YORK
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बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका
इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें-
चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।
पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।
छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।
सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।
आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।
उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-
अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|---|---|
| धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर | ५ | राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना | ११ |
| धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देना | राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना | १२ | |
| सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देना | ॥ | मंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना | १५ |
| कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जाना | ६ | इति | |
| राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना | ७ | अथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका | |
| राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृता | ८ | धर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर | २१ |
| रानीका सद्गुरुके अधीन होना | ९ | गर्भोत्पत्ति वर्णन | २२ |
| कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझाना | ॥ | जगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना | २३ |
( ६ )
बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर | सदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना | ||
| गर्भसे मुक्त करना | २५ | कर गमन करना | ४९ |
| पिशुन कर्म वर्णन | २६ | राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना | |
| पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ- | और अधिकारी हूँताँका साथ जाना | ५० | |
| का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमें | सत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का | ||
| मगन होना | २९ | वातालाप | ५१ |
| सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे | कामिनीसे बातचीत | ५२ | |
| बागमें ठहरना, उसका हरा होजाना | हंस गुज्रन जनसे बातचीत | ५३ | |
| और राजाका खबर पाकर बाग देखने | सब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके | ||
| आना फिर कबीर साहबसे मिलना | ३२ | सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता | ५४ |
| सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल याद | ग्रन्थसार | ५६ | |
| दिलाना | ३४ | इति | |
| राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना | ३५ | अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका | |
| सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप- | सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर | ||
| देश देना | ३० | जीवोंको चितानेको आज्ञा देना | ६५ |
| राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना और | ज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे | ||
| सदगुरुका उत्तर देना | ३७ | भेट होना | ६६ |
| राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद- | गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना | ६७ | |
| गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका | गुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना | ६८ | |
| हट करना पीछे शरणमें आना | ३९ | श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु | |
| कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय | ४० | बनानेको आज्ञा देना | ७० |
| सत्यलोकके आनेका मार्ग | " | गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना | ७१ |
| आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों- | गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके | ||
| का पान लेना | ४३ | लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना | " |
| तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न | महादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें | ||
| २ लोककी प्राप्ति | ४४ | समझाना | ७२ |
| राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्ली | गुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और | ||
| करना | ४५ | गुरुका परवाना लेना | ७३ |
| सदगुरुका प्रसाद पाना | ४६ | गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना | ७४ |
| पान माहात्म्य | ४७ | गुरु और ब्रह्मासे जर्बा | " |
| काल ज्ञान | " | ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव | |
| सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगट | को बुलाना | ७७ | |
| करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली | ४८ |
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
( ७ )
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत | ७९ |
| गरुड़ और महादेवका बातलाप | ८१ |
| तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद | |
| पूछनेको जाना | ८३ |
| निर्गुण भेद वर्णन | ८६ |
| लौकिक ज्ञान वर्णन | ८७ |
| महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान | ८८ |
| गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये | |
| बालक लाना | ८९ |
| बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे | |
| विनती करना | ९० |
| तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ | |
| होना और गरुड़का बालकको जिलाने की | |
| प्रतिज्ञा करना | ९३ |
| गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये | |
| फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा | |
| करना | ९६ |
| गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना | |
| और तीनों देवका हार मानना | १०४ |
| गरुड़ बोधका संक्षेपसार | १०५ |
| इति | |
| अथ हनुमान बोधकी अनु- | |
| क्रमणिका | |
| धर्मदास साहबका प्रश्न | ११३ |
| हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका | |
| भाव (टीप्पणीमें) | ” |
| बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना | |
| हनुमानका अपनी बड़ाई करना और | |
| मुनीन्द्रजीका समझाना | ११५ |
| हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर | |
| बापना (रामनामकी बड़ाई) | ११६ |
| मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन | |
| कर देना | ११७ |
| हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई | |
| करना | ११९ |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना | |
| और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ | |
| की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी | |
| बात कहना | १२१ |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें | |
| लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास | |
| करनेकी बात कहना | १२३ |
| मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका | |
| घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका | |
| प्रगट होना | ” |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर | |
| लेनेको प्रार्थना करना | १२४ |
| मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर | |
| आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको | |
| सुनाना | ” |
| हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे | |
| प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग | |
| युक्ति का वर्णन करना | १२५ |
| साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन) | १२६ |
| हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां | |
| पहुँचनेकी युक्ति पूछना | १२७ |
| मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना | |
| समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना | ” |
| हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी | |
| युक्ति पूछना | ” |
| मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये | |
| सुरति निरति एक करनेकी युक्ति | |
| हनुमान को बताना | १२८ |
| हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना | १३१ |
| ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास | |
| प्रति | १३२ |
| सारविचार पचीसी | १३३ |
| इति |
( ८ )
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता- | |
| चरण और उत्थानिका | १४१ |
| कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी | |
| का संदेश और कृष्णका समझाना | ” |
| बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके | |
| समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा | |
| के राजाको स्वप्न देना | १४२ |
| राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण | |
| के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ | |
| कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना | १४३ |
| समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि- | |
| रको छः बार बहा ले जाना | ” |
| सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर | |
| बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना | ” |
| लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप | १४४ |
| समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत | १४६ |
| ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध) | १४८ |
| समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर | |
| साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा | |
| का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन | |
| तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले | |
| के दंडका वर्णन | १४९ |
| ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना | |
| वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा | |
| करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| का कबीर साहबसे प्रार्थना करके | |
| ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना | १५० |
| जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके | |
| लिये राजाको स्वप्न देना | १५१ |
| राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और | |
| मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना | |
| और कारीगर न मिलनेसे राजाका | |
| विकल होना | ” |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर | |
| जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका | |
| वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना | १५३ |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार | |
| पर जाना और सोलह दिनतक द्वार | |
| न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा | |
| अपूर्ण रहना | १५४ |
| जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और | |
| योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना | ” |
| सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल | |
| दीप गमन | ” |
| संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि | १५४ |
| इति |