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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मदासजीका अपने पिछले जन्मका हाल पूछना और सद्गुरुका बतलाना

(३६)

ज्ञानप्रकाश

बोलत घट महाँ ब्रह्म अखण्डा । रोमहिं रोम गरजे ब्रह्मण्डा ॥
जो बोले सो कबहिं न मरई । गन्दा तन नर सरि गलि जरई ॥
ब्रह्म देह धरि जीव कहावै । पाँच स्वाद रति सो दुख पावै ॥
निज घर डोरी छूटै भाई । जीव रहे यमफन्द अरुझाई ॥
सदगुरु मिले डोरि घर पावै । पाँचन्ह कर परपञ्च नसावै ॥
आपुहि जीव ब्रह्म है भाई । गुरु परिचय बिन लखो न जाई ॥
निः अक्षर लख तत्त्व विदेही । सत्यनाम गहि मिलै सुख तेही ॥
जौं लहि तन महाँ ब्रह्म सुरंगा । तब लगि रहै तन मन बहुरंगा ॥
यंत्री ब्रह्म यंत्र तन आही । यंत्री विनु नहीं यंत्र बजाही ॥
परिचै ब्रह्म दया चित लावै । सदगुरु सेह परम पद पावै ॥
पूजहु सरजिव साधु अमोला । लहहु अभयपद निश्चय लोला ॥
छंद-परसि देखहु श्रेष्ठ वानी शास्त्र सुस्मृति मत घना ॥
जिन्ह साधु सेवा कीन्ह तिन्ह लीन्ह अभैपद सुखसना ॥
योग यज्ञ आरम्भ कीन्हों ते गये पुनि हारि हो ॥
गुरु भक्ति अरु सतसंग कीन्हो ते चले कुल तारि हो ॥
दोहा-महिमा अनित साधु गुरु, समझहु सन्त सुजान ॥
पाहन सेवत भरम वश, बूडे सकल जहान ॥
सोरठा-साहब सन्तन पाहिं, जो सेवै सो भव तरे ॥
करम भरमके माहिं, जाय विगुरचे जीव बहु ॥

धर्मदास बचन-चोपाई

हो साहब तव पद शिर नाऊँ । तब पद परसि परमपद पाऊँ ॥
केहि विधि आपन भाग सराही । तुम बरत गहैं भाग पुनि ताही ॥
कोधो मैं शुभ करम कमाया । जो सदगुरु पद दर्शन पाया ॥

सतगुरु बचन

धर्मनि सुनो आपनी करनी । तुम सुकृत आये जिव तरनी ॥
पुरुष पठाये जीवन काजा । तुम पर कला कीन्ह यमराजा ॥

बोधसागर

(३७)

तब सत्य पुरुष आज्ञा मोहि कीन्हा। तत क्षण आय पृथ्वी पग दीन्हा
बार अनेक कीन्ह मिलापू। धरम दास नहिं चेतहु आपू ॥
पाहन पूजि ध्यान मन लाये। सदगुरु शब्द चीन्हि नहिं पाये ॥
तीरथ व्रत कीन्ह बहु करनी। रूपदास गुरुकी गहि शरनी ॥
तासु प्रीति तोहि आन जगावा। नाम प्रताप यह परभावा ॥
जो जिव नाम तुम्हारा लैहैं। ताहि जीवको काल न खेहैं ॥
सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पुरुषा सोई ॥

दूसरी प्रतियोंमें नोचे लिखे अनुसार है

सदगुरु वचन

धर्मनि सुनु आपनी करनी। जेहि तोहि मिले उशब्द भौतरनी ॥
द्रापर अन्त सुपच तुम रहेऊ। तव सुत एक सो मम व्रत गहेऊ ॥
तासु प्रीति तोहि आनि जगावा। है परताप नाम परभावा ॥
सदगुरु भक्ति जाहि कुल होई। तरे एकोतर पछिला सोई ॥
वही संयोग तोहि हम भेटे। तुव सुत प्रीति तार दुख मेटे ॥

नोट—एक प्रतिमें तो ऊपरके प्रमाणहो लिखा है किन्तु कई प्रतियोंमें ऊपरको नो पंक्तिके बदले नोचेकी पंक्तियाँ लिखीं हैं। पाठक गण स्वयम् विचार करके जो उत्तम और प्रामाणिक समझे वह रखें और पाठ करें। किन्तु इतना तो अवश्य कहा जायगा कि भिन्न २ ग्रन्थोंमें इन दोनों बातों का प्रमाण मिलता है। और लेखक महात्माओंकी कृपा से पक्षपात और अविद्यावश कबीरपंथके ग्रन्थोंकी जो दुर्दशा हुई है वह साक्षर वर्गसे छिपा नहीं है। ग्रन्थोंकी यही दशा देखकर स्वयम् कबीर पंथ यहाँतक बंशधर कहीं कतिपय महंत संत लज्जावश हो किसीके सामने इन ग्रन्थोंका नाम लेते भी सकुवाते हैं। और हृदयसे इन सब ग्रन्थोंपर अभ्रदा रखते हैं। इस ज्ञान प्रकाश की कई प्रतियाँ मेरे पास उपस्थित हैं किन्तु किसी भी प्रतिका एक दूसरे के साथ मिलाप नहीं होता है। इसी प्रकारसे लगभग सब ग्रन्थोंकी दशा हो गयी है। जो जो नवीन प्रतियाँ हैं उन सबोंमें अटपट छन्दोंमें अर्थमंग और भावमंग आदि दोष पूर्ण रीतिसे भरे हैं। हाँ पहलेकी प्रतियाँ कुछ शुद्ध हैं उसीके अनुसार जहाँतक होता है रखनेका प्रयत्न करता हूँ। ऐसा करनेपर भी प्रस्तुत विषयके समान जहाँ संबंध विषय आजाते हैं वहाँ-वोनों को रख देना उचित जानता हूँ। इतना होगा जिनके पास जैसी २ प्रति होगी वे अपनी प्रति—