कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
निरंजनके जाल काटनेका हथियार
अनुरागसागर
( ६३ )
तिनहू बहु बाजी रचि राखा । हमरी डोरि ज्ञानमुखिभाखा॥
देवल देव पखान पुजार्ह । तीरथ व्रत जप तप मनलाई॥
पूजा विश्व बलिदेव अपराधी । यहि मति जीवनराख्यो बांधी॥
जग्य होम अहू नेम अचारा । और अनेक फन्द मैं डारा ॥
जो ज्ञानी जैहो संसारा । जीव न माने कहा तुम्हारा ॥
ज्ञानीवचन
ज्ञानी कहे सुनो अन्याई । काटों फन्द जीव ले जाई ॥
जैतिक फन्द तुम रचे विचारी । सत्य शब्दते सबै बिडारी ॥
जौन जीव हम शब्द दृढ़ावे । फंद तुम्हार सकल मुक्तावे ॥
जबजीव चिन्हा है शब्द हमारा । तजहि भरम सब तोर पसारा ॥
सत्य नाम जीवन समझायब । हंस उबार लोक ले जायब ॥
छन्द
देहैं सत्यशब्ददिदायहंसहि, दयाशील क्षमाघनी ॥
सहज सील सन्तोषसारा, आत्मपूजा गुन धनी ॥
पुरुष सुमिरन सार वीरा, नाम अविचल गाइहौं ॥
शीस तुम्हरे पाँव देके, हंसहि लोक पठाइहौं ॥४६॥
सो०-अमीनाम विस्तार, हंसहि देह चिताइहौं ॥
मरदहि मात्र तुम्हार, धर्मदास सुनु चित्तदे ॥४९॥
चौका करी परवाना पाई । पुरुषनाम तिहि सेउँ चिन्हाई ॥
ताके निकट काल नहि आवे । संधि देख ताकहैं शिर नावे ॥
इतना सुनत काल सकाना । हाथ जोरिके विनती ठाना ॥
दयावन्त तुम साहिब दाता । एतिक कृपा करो हो ताता ॥
पुरुष शाप मोकहैं अस दीन्हा।लच्छजीव नित आसन कीन्हा ॥
धर्मरायवचन