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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

क्रोध और क्षमाका युद्ध

(११४)

विवेकसागर

इत काम सुनिके अस्त्र डारे आनिके चरण परचो ॥
विचार ब्रह्म उर्द्ध वीर्य मोह भय वश स्वरभरचो ॥

टीका-हे धर्मदास ! वस्तु विचारके निर्मल ब्रह्मज्ञानरूपी बाणसे विंघा हुआ काम तेजहीन होगया और अपने सर्व अभिमान और घमण्ड को भूलकर विचारके आगे अपना हथियार डालकर उसके आधीन होगया । उसके आधीन होतेही उसकी स्त्री रति आदि सब आकर विवेकरायके आगे माथा नवाकर अपने सब पराक्रम छोडकर आधीन होगयी ।

(जिस समय मन कामातुर होता है उसी समय ब्रह्मविचार द्वारा इसे मारनेसे वीर्यका बल जिसके बलसे काम अपना पराक्रम दिखाता है एकदम शान्त हो जाता है ।)

कामको मंरते देख मोह राजाके दलमें खलबली मच गयी स्वयम् मोह भी भयभीत हुआ तब-

क्रोध मोह सुनि तुरतही निजबल भावेऊ ॥

मोसन करि संग्राम कवन पत राखेऊ ॥

विचार विवेक सहित सब सेन संधारि हौं ॥

करौं निकंटराज वचन प्रतिपारि हौं ॥

टीका-हे धर्मदास ! काम सेनाके मरनेका समाचार और उसके मरनेसे राजाके भयभीत होनेकी खबर जब क्रोधको पहुँची तब वह उसी समय रणके लिये तैयार होकर मोहराजाके निकट जाकर कहने लगा हे राजन् ! क्या आप जानते नहीं हैं कि, मुझसे संग्राम करके किसीकी पत बची नहीं है । मैं तो सबको जीतनेवाला आपकी सेवाके लिये तैयार हूँ तब आप एक काम


१ मरना और शत्रुके अधीन होना इन दोनों बातोंमेंसे अधीन हो जाना मान अपमान सूचक होने से मृत्युसे भी अधिक है इस कारण “मरते देख” लिखा है ।

विवेकसंगर

(११५)

के मरने से ऐसी चिन्तामें क्यों डूबे हुए हैं। देखिये प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि, अभी संग्राममें जाकर विचार विवेक सहित उसकी समस्त सेनाका नाश करके आपका राज्य निष्कंठक बना दूंगा। आप किसी प्रकारकी भी चिन्ता न करें। इस प्रकार अपनी बड़ाई आपही करके रणभूमिमें जाकर उपस्थित हुआ।

दोहा-मोह भूप यह सुनतहि, होगया व्याकुल अंग ॥

बूझे मन्त्रिन से यहै, जूझे बन्धु अनंग ॥

बड़ो सुभट मोसे नमो, हुतो सहस कन्दर्प ॥

मो जावत सो हत गयो, हुस्तर कठिन जो सर्प ॥

महामोहको वचन सुनि, मोह उठयो गण गाजि ॥

मेरे बन्धुहि मारिके, कित जैहैं रण भाजि ॥

मेटौं मारि विवेकमन, ज्ञाने देहुँ बहाय ॥

शील सत्य संतोष सब, चितवत जाहि पराय ॥

हौं जब प्रगटो तेज है, संग पुत्र मम चार ॥

व्याकुल करि वैराग्यको, हरौं भक्ति परिवार ॥

असत्संग मन्त्री कहै, हे प्रभु बडभट क्रोध ॥

आयुस जाको दीजिये, विजय करै रण बोध ॥

हरण्यो मोह नरेश तब, सुन्यो क्रोध बल शूर ॥

आज्ञा तब रणको दर्द, करौ रिपुहि चकचूर ॥

चल्यो क्रोध वंदन कियो, प्रभु आज्ञा धरि माथ ॥

आइ गयो रणभूमिमें, दलबल लीन्हैं साथ ॥

टीका-क्रोधका रणमें आगमन सुनकर विवेक राजाने भी विचार करके अपना योद्धा भेजा ॥

तब विवेक क्षमा कहैं आयसु दीन्हिया ॥

सुभट दोऊ संग्राम समागम कीन्हिया ॥

(११६)

विवेकसागर

टीका-विवेक राजाने मंत्रियोंसे विचार करके क्रोधके सन्मुख क्षमाको संग्रामके लिये भेजा । अब दोनों ओरकी सेनाके बीचमें एक ओरसे महा विकाल क्रोध और दूसरी ओरसे महाकोमलांगी परमशान्त क्षमाका युद्ध आरंभ हुआ ॥

दोहा-नृप विवेकविस्मित भयो, सुनतहि क्रोध प्रभाव ॥
बृह्यो मंत्रिनसे यहै, कांजे कौन उपाय ॥
दियो मन्त्र सत्संग वर, धीरज अचल सवीर ॥
क्षमा नारि मन भावती, पुत्र आर्य्यव धीर ॥
धीरज रु क्षमा पठायो, ज्ञान भक्ति ता संग ॥
तेज क्रोधको सहजही, क्षमा करे तन भंग ॥
धीरज क्षमा विदा कियो, पुत्र आर्य्यव जान ॥
दीन्है सकल सहायको, विमल भक्ति अरु ज्ञान ॥
धीरज धरि धीरज चलयो, गयो आप रणभूमि ॥
जहाँ क्रोध गर्जत रह्यो, नयन मद झूमि ॥
मिलि दृष्टिसे दृष्टि जब, भयो क्रोध रिस अंग ॥
गरज्यो सन्मुख जायके, मारि करौं बल भंग ॥

क्षमाको सन्मुख लड़नेके लिये आया देखकर क्रोध गरज कर कहने लगा ।

क्रोध कहै सुनु भीता मोहिं न जानसी ॥
कम्पित है त्रिलोक मरण निज ठानसी ॥

टीका-क्रोधने कहा हे डरपोक क्षमा ! क्या तू मुझे नहीं जानती है कि, मेरे भयसे तीनों लोक कम्पायमान हो रहे हैं ऐसा जानकरके भी तू मरनेके लिये सामने क्यों आयी है ॥

क्रोध सँधारैउ छित्तिपति राज जित कित कियो ॥
क्रोधविश सुरलोक दैतन जहरहि दियो ॥

विवेकसागर

(११७)

क्रोध कटुक अतिदार्शनको आडो तोही ॥
तेहिको हात संधार मम दरैरा पर जोही ॥

टीका-क्रोध कहता है कि, हमने असंख्य राजाओंका नाश करके उनका राज तितर वितर कर दिया है। हमारेही कर्तव्यसे देवोंने राक्षसोंको विषपिला दिया था। हमारी सेना ऐसी प्रलय है कि जो इसके सम्मुख आता है उसका ऐसा नाश हो जाता है कि कहीं पता भी नहीं लगता। भला ऐसी बिकट सेनाके समक्ष तू क्या वस्तु है और तेरा रक्षककौन है कि तू मेरे सम्मुख आयी है॥

दोहा-कहा बापुरी भक्ति है, कहा बापुरो ज्ञान ॥

कहा बापुरी क्षमा तू, कहा तोहि गुमान ॥

कहा नृपति तुव रंक है, कहा धर्म सन्तोष ॥

सम्मुख मेरे ना टिकै, जब चित्तवो भरि रोष ॥

इस प्रकार कहकर फिर क्रोध कहने लगा ॥

माता पिशाची कुजन बन्धु करनकी सामानते ॥

गुरु कौन बापुरा वदन देखुँ मोहि सू बडज्ञानते ॥

निजनारिको अपमान करि वृषली सो लोकसमाज है ॥

क्षण सुरति ते तेहि काटिके तब करूँ राज विराज है ॥

टीका-हे क्षमा ! मेरे पिता राजा मनने अपनी स्त्री निवृत्तिका अपमान करके उसको लौंडीसे भी नीच गतिको पहुँचा दिया है, जिससे समाजमें वह पिशाचनीके समानही आदरको पाती है। और तेरे भाई जो विवेक आदि हैं ये तो महा दुष्ट हैं और तू तो तेजहीन साक्षात् वर्णसंकर समान देख पडती है। हाँ तेरे को मेरे सम्मुख आनेकी शिक्षा देनेवाला गुरु कौन बापुरा है। क्या वह मुझसे अधिक ज्ञानी है ? अब देख क्षणमात्रमें दृष्टि डालतेही तेरे सब परिवारका नाशकरके निवृत्तिका नामही मिटा देता हूँ ॥

नं. ३ कबीरसागर - ६

(११८)

विवेकसागर

दोहा—तबै भक्तिको बोलि ढिग, कहै क्षमा सुसकाय ॥
वचन कोध कै सुनतहिं, तुरतहिं देव बहाय ॥
कोपि कोध बोल्यो तबै, धिग धिग है तुव मात ॥
नाम निवृत्ति जासु तुव, प्रगट भयो कुल घात ॥
तब क्षमा निज पियतन, चितई दृष्टि पसार ॥
कोपि वचन सुनि करिक्षमा, सहियेशब्द विचार ॥
कछो कोध अतिरिस भरे, रे धीरज मतिहीन ॥
कहा प्रातहि आइ तुम, अशुभ दृष्टि मुहि दीन ॥
लियो ज्ञानको बोलिके, क्षमा आपने तीर ॥
कहत वचन और कछू, मेटि कोधकी पीर ॥
कहत वचन अति रिस भरचो, रक्त वर्ण कर नयन ॥
तन पर स्वेद कंपित अधर; सुखते कटुतर वयन ॥
प्रकट भइ हिंसा तबै, कोध नारि विकराल ॥
अब सबको धीरज गयो, प्रगट भयी ज्यों काज ॥
बोली हिंसा रिसभरि, लिये खड्ग विपरीति ॥
कोपि क्षमा मारण चली, लिये खड्ग अपकीर्ति ॥
शतमुंख निजगुरु मारचो, शंभु सतीको तात ॥
कहुको मोरे जियतते, निकसि बाहिरें जात ॥
सुर नरमुनि व्याकुल किये, ताहि सकै कहि कौन ॥
लगी समाधि युगाधि भर, ताहि छुडावत मौन ॥
क्षमा कहे भृगु लात जब, हनी विष्णुके हीय ॥
क्षमा किये प्रभुता भयी, सुर नर मुनिके जीय ॥
क्षमा नाम यह भूमिको, लहत सकल अपराध ॥
है सबके अपराध शिर, जेहि वन्दे सुर साथ ॥

१ इन्द्र । २ इन्द्रको ब्रह्मज्ञानके उपदेश देनेवाले दध्यङ्गकृष्णिये थे । इन्द्रने इनका धार
काट लिया था उपनिषदोंमें इसकी कथा प्रसिद्ध है आत्मपुराणमें विस्तार से है ।

विवेकसागर

(११९)

बहुरि क्रोध बोल्यो तहाँ, धरे भार बहु भूमि ॥
मोर भार सहस्रके, जाय पताल झूमि ॥
को मोरी तेजै सहे, कहा बडो अस वीर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश हू, सो उर धरत न धीर ॥
कहे क्षमा पुनि भक्ति सो, हम सब विधि लछु आहि ॥
कब सम्पति यह क्रोधकी, क्यों पटतरि हैं ताहि ॥
क्रोध सुभट बोल्यो तबै, कहत वचन यह क्रूर ॥
मेटो मार विलम्ब नहीं, दया धर्म बड शूर ॥
जैसे कोऊ यत्न करी संग्रहि कीन्हो वित्त ॥
तस्कर पलमें लैगयो, शोक अग्नि जर वित्त ॥
क्षुधा पिपासा नींद पुनि, सिन्धु तरहि ज्यों यार ॥
गोपद लै बोलो तिन्हैं, ऐसेही वरियार ॥
जबै क्षमा सब सहि रहि, गहि रहि भगवत आस ॥
हृदय समझ बोलत भयी, हम तो हैं तुव दास ॥

यों कहत तुरत क्षमा कहे पौरुष बोलेऊ ॥

कुशल कुशल कहि फिर उत्तर खोलेऊ ॥

टीका—हे धर्मदास ! जिस समय क्रोधने महा कटु और हृदयमें शूल उत्पन्न करनेवाले महानिन्द्य वचन कहकर क्षमाके समस्त परिवारको गाली दियो उस समय भी क्षमा शान्तिसे कहने लगी हे क्रोध ! आपने जो कुछ कहा बहुत अच्छा कहा वाह ! वाह ! ऐसेही चाहिये ! इस प्रकार बार बार उसकी स्तुति करती हुई क्षमाने कहा आपने जो कुछ अपना पुरुषार्थ और बल वर्णन किया सब ठीक है । इसमें क्या संदेह आप बहुत बडे हैं । इस प्रकारसे क्षमाके कहनेपर क्रोधने उसकी बातोंको कटाक्ष समझकर और भी अपनी शक्ति अधिक प्रकाशित की । और—

(१२०)

विवेकसागर

कीन्हेसि चरण प्रहार सो अति विहसत भयो ॥
तो कुछ मम अपराध स्वामी अब गयो ॥

टीका-कोधने क्षमापर अपने लातसे प्रहार किया। उधर कोधने लात मारा इधर उसके बदलेमें क्षमाने हँसकर हे भाई! हे मालिक! अब मेरा जो कुछ अपराध था सो सब छूट गया। किन्तु मम हिय अतिहि कठोर चरण मृदुलैं अहे ॥
शासन उचित सो कीजिये अनुजैं निर्वहे ॥

टीका-मेरा हृदय अत्यन्त कठोर और आपका चरण अत्यन्त कोमल है इससे आपको चोट लगी होगी सो क्षमा करना, हे भाई! मैं आपसे छोटी हूँ आप मेरे जो उचित शासन समझिये सो कीजिये मेरा निर्वाह सब प्रकार हो सकता है ॥

दोहा-यहि मुनि झख लागे बकन, कोध बहुत दुख पात ॥

दास कहत हियसो मनहुँ, लगे चरनको घात ॥

धर्म तपस्या दया धन, पुनि संयम अरु नेम ॥

ज्ञान भक्ति वैराग बल, तजत शील रो प्रेम ॥

मेरे तेज प्रतापते, ये सब जाहि पराय ॥

धीरजहु धीरज तजै, मेरो दर्शन पाय ॥

क्षमा कहे तुमहो बडे, गुनहु बडे तुम माहिं ॥

जो कछु कहो सो सत्य है, यामैं संशय नाहिं ॥

कृपा करी मोपर बडी, मैं मान्यो बड भागि ॥

क्षमा दीन है कोध के, तुरतै पायन लागि ॥

क्षमाकी ऐसी अधीनताको देखकर कोधका तेज हत हो गया।