कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
धर्मदासके पिछले जन्मकी कथा
( १०६ )
अनुरागसागर
सन्त सुदर्शन द्वापर भयञ् । तासुकथा तोहि प्रथम सुनयञ् ॥
तेहि ले गयो देशनिज जबहीं । विनती बहुत कीन तिन तबहीं ॥
सुपच वचन
कहे सुपच सतगुरु सुनलीजै । हमरे मात पिता गति दीजै ॥
बन्दी छोड़ करो प्रभु जाई । यमके देश बहुत दुख पाई ॥
मैं बहु भांति पिता समुझावा । मातु पिता परतीति न पावा ॥
बालकवत नहिं ज्ञान सिखावा । भक्ति करत नहिं मोहि डरावा ॥
भक्ति तुम्हारी करन जब लागे । कबहुँ न द्रोह कीन्ह मम आगे ॥
अधिक हर्ष ताही चित होई । ताते विनती करौ प्रभु सोई ॥
आनहु तेहि सत शब्द दृढ़ाई । बन्दीछोर जीव सुकताई ॥
कबीर वचन धर्मदासप्रति
विनती बहुत संत जब कीन्हा । ताकर वचन मान हम लीन्हा ॥
ताकर विनय बहुरि जग आवा । कलियुग नाम कबीर कहावा ॥
हम इक वचन निरंजन हारा । वाचा बंध उदनि पगु धारा ॥
और दीप हंसन उपदेशा । जम्बुदीप पुनि कीन प्रवेशा ॥
सन्त सुदर्शनके पितु माता । लक्ष्मी नर हर नाम सुहाता ॥
सुपच देह छोड़ी तिन भाई । मानुष जन्म धरे तिन आई ॥
सुपच सुदर्शन माता पिताके पहला जन्म कुलपति और महेश्वरीकी कथा
सन्त सुदर्शन केर प्रतापा । मानुष देह विप्रके छापा ।
दोनों जन्म होय तब लीन्हा । पुनि विधि मिलै ताहि कहँ दीन्हा ॥
कुलपति नाम विप्रकर कहिया । नारि नाम महेसरि रहिया ॥
बहुत अधीन पुत्र हित नारी । करि अस्नान सुर्यव्रत धारी ॥
अञ्जल ले विनवै कर जोरी । रुदन करे चित सुत कह दौरी ॥
तत्क्षण हम अञ्जल पर आवा । हम कहँ देखि नारि हरषावा ॥
बाल रूप धरि भेंटयो बोही । विप्र नारि गृह ले गइ मोही ॥