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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पाण्डव यज्ञ तथा सुपच सुदर्शन कथा-वर्णन

( ५२ )

ज्ञानसागर

पांडव निवते यज्ञ पठाये । चलिये स्वामी बेग बुलाये ॥
मारन बंधु या किया लागा । तातें यज्ञ रची है रागा ॥
चल भये कृष्ण बार नहिलाये । पुर पांडव के आश्रम आये ॥
आवत समाधान नृप कीन्हा । छत्र तानि सिंहासन दीन्हा ॥
आवत कृष्णसभा सिर नावा । भोजन को तब आज्ञा पावा ॥
साखी-बैठे गन्धरव देव गण, ऋषि मुनिवर सब झार ॥
सब मिलि कीन्हा भोजन, इच्छा के अनुसार ॥

चौपाई

भोजन भये घंट नहिं बाजा । राय युधिष्ठिर को भयी लाजा ॥
अहो कृष्ण का करौं उपाई । सोमोहि स्वामी कहिये समुझाई ॥
जबहि कृष्ण अस भाव बताया । सुनहू मंत्र युधिष्ठिर राया ॥
खोजहु भक्त जो निर्गुण गावयी । सतगुण महिमा सदा बतावयी ॥
आनब ताहि यज्ञ निवताई । दीन भाव कर ताहि लिवाई ॥
कृष्ण वचन सुनि युधिष्ठिर राया । भगत बुलावन दूत पठाया ॥
सुनिके दूत चले चहुँ देशा । नहिं कोइ भक्तन भेटे वेशा ॥
चले भीम तब लागि न वारा । चहुँ दिश फिर काशी पगुधारा ॥
बैठे सुपच ताहि सों कहई । निर्गुन भक्त यहाँ कोइ रहई ॥
कहै सुपच निर्गुन को जानों । सतगुरु महिमा सदा बखानों ॥

साखी-कहै भीम सुन हरिजन, कृपा करौं मम संग ॥
चलो जहाँ हरि बैठे, स्वामी बाल गुविन्द ॥

चौपाई

कहै सुपच प्रभु कैसे कहऊ । कालहि जान कृष्ण परिहरऊ ॥
सुनतहि भीम कोप तब कीन्हा । यामैं कहा भक्त वर चीन्हा ॥
यहि मारो तो राख रिसाई । कह्यो मंत्र राजा पर जाई ॥
तीन लोक के जे प्रभुराई । तिनको भाखै काल कसाई ॥

ज्ञानसागर

( ५३ )

कृष्णहि कहै काल की फांसी । कीन्हही आय भक्त की हांसी ॥
मारचो नहि पर तुव भय माना । यह सुनकर विहिसे भगवाना ॥

सारखी-जाव युधिष्ठिर वेग दै, तुम आनो गहि पांय ॥

आज्ञा मानि चले तब, आये युधिष्ठिर राय ॥

चोपाई

अहो संत तजिये अपराधा । अधम उधारन सुनियत साधा ॥

चलो स्वामी मेरे गृह आजू । कृपा करौ मम होवै कालू ॥

कहैं सुपच सुन पांडव राज । तोर का काज होय वहि ठाऊ ॥

तुम्हरे गये होय मम काजा । परमारथ तुम को बड़ साजा ॥

चल परमारथ कारण संता । सभा माहिं बैठे हरषंता ॥

आवत स्वपच कृष्ण जब जाना । होय काज पूरण सनमाना ॥

राय युधिष्ठिर पखारे पांऊ । भोजन सादर आन जिवाऊं ॥

भोजन करके सुपच भयो ठाढा । बाज्यो घंट शब्द भयो गाढा ॥

बाज्यो घंट यज्ञ भयो पूरा । कौतुक देखि ऋषीगण भूला ॥

पूरण यज्ञ विष्णु जब जाना । तबही कीन्ह द्वारिका पयाना ॥

सारखी-बूझो रे नर परानी, क्या सुपचे अधिकार ॥

गण गन्धर्व सुनि देव ऋषि, सब मिलि कीन्ह अहार ॥

चोपाई

सब के खाये घंट नहि बाजा । धर्म की देह युधिष्ठिर राजा ॥

सो सब रहे पूर्ण यज्ञ नाहीं । नामहि महिमा जानत नाहीं ॥

सुपच जान भल नाम प्रभाऊ । ताते पूरण यज्ञ कराऊ ॥

कृष्ण शक्ति में सुनि ऋषि झूला । जान बूझिकै पंडित भूला ॥

बूझौ सन्तो नाम हमारा । नाम विना किमि उत्तरौ पारा ॥

कृष्ण पारथ ही वेग बुलावा । तेहि पुनि निज मतौ सुनावा ॥

गोपी लैकै जाऊं मैं जहँवा । पुर वैकुंठ सुमेर है तहँवा ॥