कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीर साहबका चार ज्ञान कहना
(१२८)
सर्वज्ञसागर
सारखी-बहुत भेद कहो तुम, सुन्यो सुरति दे कान ॥
अब कछु ऐसो भाषिये, आदि अंत बंधान ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
तब सतगुरु असवचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥
बहुत ज्ञान सुनायो तोही । तुम अंतर जाना अब मोही ॥
कोटि ग्रन्थ ज्ञान हम भाखा । सुनिके भेद तुम अन्तर राखा ॥
पुनि टकसार मैं कहाँ अमानी । सो धर्मनि तुव मन नहिं मानी ॥
बीजक ज्ञान मैं कहो अरथाई । सो तुमरे चित एक नहिं आई ॥
चौथे मूल ज्ञान लै आवा । सर्व लोकन को भेद बतावा ॥
चार ज्ञान मैं कहा समझायी । तेहिमें तुम्हे परतीति न आयी ॥
विनु परतीति काज नहिं होई । श्रद्धा विना जिव जाय विगोई ॥
सारखी--पुरुष हमसों जो कही, सो तोहि दीन्ह दिखाय ॥
और धर्म नहिं गोइहों, सुनु धर्मनि चित लाय ॥
धर्मदास वचन-चौपाई
धर्मदास विनती अनुसारी । साहिब विन्ती सुनो हमारी ॥
सकल भेद गुरु कहौ बुझायी । जाते संशय सब मिटि जायी ॥
आदि अंत मधि गति सोई । सबै कहौ राखो मति गोई ॥
पहले आदि समरथ किमि होई । उत्पति प्रलय भाषो तुम सोई ॥
तुम संदेशी आदिते आये । सर्व भेद तुम हमें सुनाये ॥
चारि ज्ञान तुम भाषि सुनावा । ज्ञान चारिको अर्थ बतावा ॥
अब त्रयवाचिक मोहि सुनावहु । दया करो जनिमोहि छिपावहु ॥
सारखी--तुम निज सतगुरु आदि हो, हम हैं वंश तुम्हार ॥
समरथ अन्त बतावहु, मिटे भर्म कौवार ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
तब साहिब अस वचन उचारा । सुनु धर्मनि प्राण अधारा ॥
आदि अन्त नहिं कोई वासा । आपहि आप कीन्ह प्रकासा ॥