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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

गुरु महिमा

( ६८ )

अनुरागसागर

छन इक जीवन कहँ सुख दयऊ । जीव प्रबोध पुरुष पहुँ गयऊ ॥
छन इक जीवन कहँ सुख दीन्हा । जीवन कह्यो ज्ञानको चीन्हा ॥
जब तुम देह धरो जग जाई । तब हम शब्द कहब गोहराई ॥
जौ गहि हो सत नामकी डोरी । तब आनब हम जमसे छोरी ॥
जीव परमोधि पुरुष पहुँ गयऊ । जीवनको दुख वरनि सुनयऊ ॥
पुरुष दयाला दयानिधि स्वामी । जिनके मूल अमान अकामी ॥
कह्यो मोहिँ बहुविधि समुझाई । जीवन आनों शब्द चेताई ॥

धर्मदासवचन

धर्मदास अस विनती लायी । ज्ञानी मोहिँ कहो समझायी ॥
जो कछु पुरुष शब्द सुख भाखो । सो साहिब मोहि गोयन राखो ॥
कौन शब्दते जीव उबारा । सो साहिब सब कहो बिचारा ॥

सदगुरुवचन

पुरुष मोहि जैसे फुरमायी । सो सब तुमसों संधिलखायी ॥
केहेउ मोहि बहुविधिसमझायी । जीवहि आनो शब्द चितायी ॥
गुप्त वस्तु प्रभु मोकहँ दीन्हा । नाम विदेह मुक्तिकर चीन्हऽ ॥
दीन्ह पात परवाना हाथा । संधिछाप मोहि सौंप्यो नाथा ॥
बिनु रसनाते सो धुनि होई । गुरुगमते लखि पावे कोई ॥
पंच अमीय मुक्तिका मूला । जाते मिटे गर्भ अस्थूला ॥
यहि विधि नाम गहे जो हँसा । तारौ तासु इकोतर बँसा ॥
नाम डोरि गहि लोकहि जायी । धर्मराय तिहि देखि डरायी ॥
ज्ञानी करो शिष्य जेहि जाई । तिनका तोरो जल अँचवाई ॥
जिहि विधि दीन्ह तुमहि मैं पाना । तेहि विधि देहु शिष्य सहिदाना ॥

गुरुमहिमा

गुरुमुख शब्द सदा उर राखे । निशिदिन नाम सुधारस चाखे ॥
पियानेह जिमि कामिनि लागे । तिमिर गुरुरूप शिष्य अनुरागे