सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मरायका कबीर साहबको धोखा देकर उनसे गुप्त भेद पूछना

( ६६ )

अनुरागसागर

सो०—पुरुषवचनअसनाहिं,यहै साच चित कीन्हेऊ ॥
लै पहुँचावहुँ ताहि, सत्यशब्द जा टट गहे ॥ ५१ ॥
द्वादश पन्थ कहेउ अन्याई । सो हम तोहि दीन्ह बगसाई॥
पहिले प्रगटे दूत तुम्हारा । पीछे लेहि अंश औतारा ॥
उदधि तीर कहँ मैं चलि जायब । जगन्नाथको माड मडायब ॥
ता पाछे हम पन्थ चलायब । जीवन कहँ सतलोक पठायब॥

धर्मरायका कबीरसाहबको धोखा देकर उनके गुप्त भेदका पूछना

धर्मराय वचन

सन्धि छाप मोहि दीजे ज्ञानी । जस दैहौं हंसहि सहिदानी ॥
जो जिन मोकहँसन्धि बतावे । ताके निकट काल नहिं आवे ॥
नाम निसानी मो कहँ दीजे । हे साहिब यह दाया कीजे ॥

ज्ञानी वचन

जो तेहि देहु सन्धि लखाई । जीवन काज होइहो दुखदाई ॥
तुम परपंच जान हम पावा । काल चलै नहिं तुम्हरो दावा ॥
धर्मराय तेहि परगट भाखा । गुप्त अंक बीरा हम राखा ॥
जो कोई लेई नाम हमारा । ताहिछोड़ि तुम होहु नियारा ॥
जो तुम हंसहि रोको जायी । तो तुम काल रहन नहिं पायी ॥

धर्मराय वचन

कहे धर्म जाओ संसारा । आनहु जीव नाम आधार ॥
जो हंसा तुम्हरो गुण गाये । ताहिं निकट तो हम नहिंजाये ॥
जो कोई जैहै शरण तुम्हारा । हम शिर पग दै होवै पारा ॥
हम तो तुमसन कीन्ह ठिठाई । पिता जान कीन्हीं लरिकाई ॥
कोटिन औगुण बालक करई । पिता एकहिरदय नहिं धरई ॥
जो पितु बालक देह निकारी । तबको रक्षा करे हमारी ॥
धर्मराय उठ सीस नवायो । तब ज्ञानी संसार सिधायो ॥