कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन
(१२२)
बीरसिंह बोध
राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥
पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥
गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥
जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥
मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥
सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥
ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥
अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥
यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥
गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥
सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥
आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥
भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥
छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥
धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥
अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥
पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥
अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥
असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥
दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥
करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥
सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥
श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥
चौपाई
गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥
नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥
बोधसागर
(१२३)
धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥
ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥
सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥
शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥
पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥
चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥
नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥
तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥
घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥
तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥
राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥
एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥
राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥
बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥
तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥
भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥
चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥
चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥
यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥
हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥
दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥
जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥
साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥
ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥
(१२४)
बीरसिंह बोध
चौपाई
तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥
निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥
धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥
जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥
अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥
चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥
तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥
मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥
छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥
बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥
काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥
करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥
सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥
कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥
चौपाई
तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥
आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥
साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥
हरिहर वचन
हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥
दूत वचन
कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥
वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥
आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥