कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्णके शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझकर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना
बोधसागर
( १४३ )
अब कलियुग बैठेगा सोई । बौद्ध थापना हमरो होई ॥
जगन्नाथ मम नाम है सोई । हमरी थापना यहि विधि होई ॥
सत्यकबीर वचन
राजा जब स्नानको गयऊ । पेई गडी रेत में पयऊ ॥
तब राजा परिकरमा दीना । पेई उठाय कै शिर पर लीना ॥
तुरतहि राजा महल ले आवा । तबहि रानि कहैं तुरत बतावा ॥
करै निछावर मंगल गावै । घर घर नगर में बाजु बधावै ॥
राजा ब्राह्मण लीन बुलायी । सपने की सब बात सुनायी ॥
ब्राह्मण वचन
ब्राह्मण कहै सुनो महाराजा । सुफल जनम सरिहैं सब काजा ॥
शुभ नक्षत्र वार धरि लीजै । तब देवल की थापना कीजै ॥
रोहिणी नक्षत्र वार बुध लीना । तब देवल की नींव जो दीना ॥
जब देवल सम्पूर्ण भयऊ । तबही राजा जग मंडयऊ ॥
पुरातन वार्ता
मंथन उदधि विष्णु जब कीन्हा । निकसी वस्तु बांटि सो लीना ॥
और त्रेता में बांध बैथाये । ताको बैर उदधि मन लाये ॥
उदधि विचार
तबका बैर अबहीं मैं लेऊँ । देवल गाडि रेतमें देऊँ ॥
सत्य कबीर वचन
लगन मुहूरत पहुँचे आयी । तबही देवल गाडि के जायी ॥
छे बार देवल गाडयो भायी । तब हम इतो जगत के माही ॥
पूर्विल कौल सुरति धरि लीना । जाय आशन समुद्र पर कीना ॥
उदधि साजि दल जबही आवा । तब हम डाट समुद्र बतावा ॥
तब हंकार समुद्र बतावा । महा क्रोध करि हम पै आवा ॥