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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

गरुड़ और महादेवका वार्तालाप

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बोधसागर

( ८१ )

ब्रह्मा कहै सुनो विष्णु विचारी । हमही रचा पुरुष औ नारी ॥
हमते और कौन है भाई । सो मोहि भेद कहौ समझाई ॥
हम तो सर्गुण सकल पसारा । हमतो अगम निगम विस्तारा ॥
हमतो रचा पवन औ पानी । हम कहैं वेदव्यास बखानी ॥
हम चौरासी नाव जो कीन्हा । हम निर्गुण सरगुण चीन्हा ॥
इतनी कथा कहि ब्रह्मा सुनाई । तबहूँ गुरुड न मानैं भाई ॥

गुरुड वचन

कहै गुरुड सुनो ब्रह्म कुमारा । तुम कहैं रची सृष्टि करतारा ॥
सबको रची सबै जिन कीन्हा । वह तो पुरुष सबन ते भीना ॥
वह तो पृथ्वी पाँव न दीन्हा । शब्दहि ते सकलो जग कीन्हा ॥
जो आप रचना करि जाना । तो हमसे हठि भाषहु ज्ञाना ॥
जो तुम रचा पवन औ पानी । पृथ्वी अकाश तुमहिं जो ठानी ॥
रचा तुम्हार तब जानहिं भाई । अब रचहु तुम फिरि विनशाई ॥
जो तुम्हार है सकल बनाई । फिरिके परलय करहु तुम भाई ॥
तब हम जानहिं कीन तोहारा । यह मेटहु सकलो विस्तारा ॥
अपने हाथ रचै जो कोई । फिरिकै मेटि सके पुनि सोई ॥
तब ब्रह्मा सुनि रहे लजाई । सम्मुख उत्तर कह्यो न जाई ॥

महादेव वचन

कहे महादेव सुनो रे भाई । अचरज बात कही नहिं जाई ॥
सुनु ब्रह्मा गुरुड जो कहई । ताकर भेद कोई विरला लहई ॥
दश औतार विष्णु जो लियऊ । काया काल ब्रास जो कियऊ ॥
तबही कृष्ण भेद यक कीन्हा । ताको ब्रह्मा तुम नहिं चीन्हा ॥
गोपी ग्वाल सबै हरि लाये । तब जो कृष्ण सब दीन मेराये ॥
इतनी बात ब्रह्मा तुम नहिं जानो । अविगतिकी गति कैसे पहिचानो ॥

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( ८२ )

गरुडबोध

सारखी-कौन सरूपी कृष्ण है, कौन धरे अनुमानु ।
देह धरे नहीं चीन्हहूँ, निर्गुण कैसे जानु ॥

चोपाई

निरगुणको गुण है बड भारी । जिन उत्पन्न कियो सब सारी ॥
वह तो पुरुष मूल है माथा । गति प्रतीति ताहीके साथा ॥
नहीं महात्म पुरुष की पूजा । जप तप संयम नाम विनु दूजा ॥
वार पार नाम नर सेई । अजर नामको सुमिरन देई ॥
बारहिं बार नाम लौ लावे । अजर अमर होय लोक सिधावे ॥
नाम सिखापन बदन सो खोले । विना नाम विनु महात्म डोले ॥
सतगुरु विना मर्म नहीं जाने । हमैं तुम्हैं सब जगत बखाने ॥

ब्रह्मा वचन

सुनो महादेव साँच बखाना । निर्गुणके गुण हमहूँ नहीं जाना ॥
अविगतिकी गति हम ना जानी । योगी जंगम सेविं हम जानी ॥
सुर नर मुनि सब हमको ध्यावें । हम उपजावें हमही विनशावें ॥
साखी-मैं उपजावों मैं विनसावों, मैं खरचों मैं खाऊँ ।
तीन लोक पैदा करें, मोर ब्रह्म है नाऊँ ॥

गरुड वचन चोपाई

ममताते नर नरकें जायी । ताते बहुरि बहुरि जन्मायी ॥
तुहि अब ब्रह्मा बहुत विचारा । ताते काया विनसे सब सारा ॥
तू ब्रह्मा अस जो धरे हँकारा । तेहिते काल भया वटपारा ॥
सुनु ब्रह्मा अविगति की बाता । एकै पुरुष एक है माता ॥
सुनहू सब सभा विचारो । यक मैं निरखिकहौं निरुआरो ॥
वहि साहबकी खबरि न पावा । तुव अस ब्रह्मा बहुत उपावा ॥
वही हम निरखि परखिके जानी । साहब शब्द लेहु पहिचानी ॥

१ ब्रह्मा शिवकी बातकी व्यंगसे हँसी करते हैं ।