कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे विनती करना
(९०)
गरुडबोध
कहै गरुड सुनो यक बानी । यहि बालककीमृत्यु नियरानी ॥
याको कोई नाहिं सहाई । याते आयो तुव शरणायी ॥
यहि बालक को कौन जो राखे । सत्य बचन हम सुखते भाखे ॥
तुम तीनों त्रिभुवनके देवा । बालक ठान्यो तुम्हरी सेवा ॥
ब्रह्मा बचन
तब ब्रह्मा बालक सों बोले । जानि प्रभुता आपन सुख खोले ॥
कहे ब्रह्मा बचन हित कारी । को तेरा बाप को है महतारी ॥
कहु बालक कहाँते आया । किन तुमको यहाँ पठाया ॥
कौन साहब दीन्हा औतारा । कौन तुझेको मारनहारा ॥
बालक बचन
तब बालक बोले अनुसारि । को है पिताको है महतारी ॥
ना जानूँ किन दिया औतारा । ना जानूँ को मारन हारा ॥
हम पूछे कोई राखहु भाई । तेहि कारन आये तुम्हरे ठाई ॥
साखी-तीनलोक के ठाकुर तुम, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
मैं तो कछु जानो नहीं, काहि कहौं संदेश ॥
महादेव बचन
सुनो बालक मैं कहूँ बुझायी । मृत्यु तुम्हारी नियरे आयी ॥
इहाँ कौन है राखन हारा । धर्मराज तुव कीन पुकारा ॥
केहि विधि यहाँ कैसे रहिहो । कौन शब्द पुरुष पद पैहो ॥
कैसे के भवसागर तरिहो । कौन भक्ति हृदय चित धरिहो ॥
सोई भेद कहौं समुझायी । जाते तुम्हरा दुःख नशायी ॥
हंसा ( बालक ) बचन
हम तो तुम्हरी शरणे आये । जस जानो तस करो उपाये ॥
हमरी तो अब मृत्यु तुलानी । हम का जानें शब्द औ बानी ॥
बोधसागर
( ११ )
अब करू वेगि सम्भारी मेरी । अब जनि करहु देव तुम देरी ॥
मृत्यु हमारी तुली अब आयी । तुम अब हमको लेहु बचायी ॥
जो तुमसे नहि बाचै भाई । मिथ्या तुम का करहु बड़ाई ॥
तुम सेवक साहब का होऊ । दूसर साहब है निज कोऊ ॥
विष्णु वचन
विष्णु कहे सुनु बालक भाई । अब तोको यहाँ कौन छुड़ाई ॥
कैसे को अब राखै भाई । कैसे को तुव काल छुड़ाई ॥
कैसेको तोर काल छुड़ाओं । कैसे आवा गमन मिटाओं ॥
साखी-काल बड़ा प्रबल अहै, मो पै कछू ना होय ।
वासे नहिं कोइ बाचई, ब्रह्मा विष्णु विगोय ॥
चौपाई
सब मिलि रहे काल के साथ । काल फिरत है सबके माथा ॥
काल की गति हम नहिं जाने । धोखे यम के हाथ विकाने ॥
साखी-काल कि गति जाने नहीं, ब्रह्मा विष्णु महेश ।
ऋषी सुनी सब कम्पहीं, कम्पे शेष सुरेश ॥
चौपाई
केतिक देह हमहीं जो धरिया । फिरि फिरि कालके फन्देपरिया ॥
देह धरी धरि जगमें आये । यहि पृथ्वी में नाम धराये ॥
साखी-कालसों कोई ना बचै, सुनु बालक चित लाय ।
कैसे कै मैं राखिहौं, मोसों राखि न जाय ॥
चौपाई
देह धरे नहिं बचिहो भाई । सबको काल धरी धरि खाई ॥
काल बड़ो है अति बलवंता । देवी देवा खाय अनन्ता ॥
सप्त दीप जो हैं नौ खण्डा । काल बली सबहिन को डण्डा ॥
तीन लोक पै करे रजधानी । हमहूँ ताकी सेवा मानी ॥
( ९२ )
गरुडबोध
विष्णु कहे ब्रह्मा सों बाता । यह बालक कीन्ह्ना उत्पाता ॥
यह वृत्तांत तुम जानो भाई । तुम बालक को लेहु बचाई ॥
ब्रह्मा तव सुनि रहे लजाई । हमसे बालक राखि न जायी ॥
गरुड वचन
तबही गरुड जो बोलै बानी । बालक जिये तब तोहि जानी ॥
आपा रोपि रहे ठहराई । किया तुम्हार न होवे भाई ॥
जो तुम आज बालकको राखो । तौ तुव वचन सत्य कै भाखो ॥
कहै गरुड सो तरक लगायी । बालक काहे न राखु बचाई ॥
ऐसी विधि फिरि फिरि अवतरहु । पुनि अपनी बुधि भरमत रहहु ॥
सबको ब्रह्मा देउ उपदेशा । अपने गर्वका न जानहु लेशा ॥
हम जानी तुमरी मति भाई । अब तुम थापि रहहु ठहराई ॥
गरुड कहै अस ज्ञान विचारी । ऐसी भूल परी संसारी ॥
सतगुरु वचन
धर्मदास तुम सुनो विचारी । गरुड या विधि दीन्ह प्रचारी ॥
तब तीनों मन में कीन विचारा । करि विचार ज्योति कहैं उरधारा ॥
तीनों मिलिके पूछैं माता । जो वह कहै सुनौ विधाता ॥
आप आपमें तीनों ठानी । अन्त काल गमि पूछन आनी ॥
त्रिदेव वचन माता प्रति
माता ते पूछै चितलाई । सत्य वचन कहो तुम माई ॥
तुमरा चरित हमहीं नहि जाना । आप आप मिलि कीन बखाना ॥
माता वचन
तबहीं ज्योति उचारी बानी । अहै काल सब पर परधानी ॥
कौन है बालक राखन हारा । आप पुरुष जो कीन हँकारा ॥
जाइके तुरत देहु पहुँचायी । जहवाँका जीव तहँवा चलियायी ॥