Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

पुरुषका निरञ्जनको शाप देना

Page 19Permalink

ज्ञानसागर

( ९ )

चौपाई

कन्या सों अस कीन्ह अन्याई । सहजसों लियो जो तुरत बुझाई ॥
यहै चरित पुरुष जब देखा । दीन्हें शाप सो कहों विशेखा ॥
सवा लक्ष जीव करौ आहारा । तऊ न ऊदर भैर तुम्हारा ॥
सुमिरन कूर्म पुरुष को कीन्हा । अहहो पुरुष धरम सिरछीन्हा ॥
तुव आज्ञा मैं अंड जो दीन्हा । धर्मराज काहे सिर लीन्हा ॥
सुनत वचन प्रभु बहुत रिसाने । जोगजीत तबही उतपाने ॥
आज्ञा भई तुम वेग सिधारी । धर्मराज कहैं मार निकारी ॥
आज्ञा मांग चले तब ज्ञानी । धर्मराय सो बातैं ठानी ॥
अरे पापी तू पुरुष को चोरा । भागहु वेग कहा सुन मोरा ॥
सुनतहि कोध भये धर्म धीरा । जोग जीतके सन्मुख भीरा ॥
जोग जीत तबहीं फटकारा । जाय रहौ तब लोक ते न्यारा ॥
जोग संतायन चल भये जबही । धर्म धीर आयौ पुनि तबही ॥
बार अनेक युद्ध जिहि कीन्हा । मारे न मरत बहुत बल कीन्हा ॥

धर्मराज वचन

तब मैं हतौ पुरुष के ठाऊँ । तब नहिं सुन्यो तुम्हारौ नाऊँ ॥
को तुम हौ सो मोहि बताऊ । सहज भाव तुम फेर बनाऊ ॥

ज्ञानी वचन

धर्म धीर सों कहा बखानी । मर्दन धर्म नाम मम ज्ञानी ॥
जब तुम कीन्ह चार का काजा । तातैं पुरुष मोहि उपराजा ॥
मारहुँ तोहि कहौ सतभाऊ । अष्टांगी तैं कामिन खाऊ ॥
सुनतहि कोध धरम पर जरेऊ । जरत हुताश मनहु घृत परेऊ ॥

साखी-करहि युद्ध बहु भांति सों, कैसेहु क्षमा न होय ।
क्षण एक लरचौ सहज तुम, करु उपाय अब सोय ॥

Page 20Permalink

( १० )

ज्ञानसागर

चौपाई

पुरुष आज्ञा अस भयउ अपारा । मारहु धर्म के मांझ कपारा ॥
आज्ञा पुरुष ज्ञानीदियो जबही । मारौ शीश परो खस तबही ॥
संशय भयो तासु की देहा । ताकहैं भयो जी महाँ संदेहा ॥
धर्म धीर कौ रुधिरसे जबही । विषम सरोवर उपजौ तबही ॥
कन्या निकस जो बाहिर आई । संशय काल तिहि घटहि समाई ॥
शीश दियो लै कुर्म के पास । पुरुष आज्ञा सौ कीन्ह निवासा ॥
आज्ञा कीन्हही बेग निकारहु । कहै जोइ अब धर्म सिधारहु ॥
छाड़हु अंश खंड का गाऊ । विषम सरोवर माहि सा जाऊ ॥
देखो बहुत रूप उजियारा । अस कामिनि तैं कीन्ह अहारा ॥
फिर मैं गयो पुरुष के पास । धर्म धीर अस करहि तमाशा ॥
कह कामिनि सुन पुरुष पुराना । मैं अपना कछु मरम न जाना ॥
कौन पुरुष मोही उपजाई । सो मोहि गम्य कहौ समुझाई ॥

धर्मराय वचन

कन्या मैं उपजायो तोही । रहौ अलख नहि भेंटसि मोही ॥
कन्या कह सुन पिता हमारा । खोजो वर होय व्याह हमारा ॥
वर खोजौ जो दुतिया होई । कन्या मैं अब व्याहौ तोही ॥
पुत्री पिता न होवत व्याहा । पितहि पाय बहुतै औगाहा ॥
साखी-धर्म कहै सुन कन्या, भर्म भयो मति तोहि ॥
पाप पुण्य हमरे घरे, क्या डहकस तैं मोहि ॥

चौपाई

आदि भवानी और धर्मराऊ । इन सब कीन्ह सृष्टि निर्माऊ ॥
पांच तत्त्व तीन गुण रहेऊ । बीज सहित अष्टांगी दण्ड ॥
चौरासीलक्ष जीवदियो सम्हारी । रचहु सृष्टि अब आदि कुवारी ॥
सेवा करहु सृष्टिकी ओरा । अलख निरंजन नाम है मोरा ॥