कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
त्रेतायुगका वर्णन
सर्वज्ञसागर
(१३१)
चित्ररेखा रानी कर नाऊ । तिन सुनिशब्द श्रवण चितलाऊ ॥
तिन युगबन्ध चौका कीन्हा । युग बन्धी परवाना लीन्हा ॥
राजा रानी पूछत मोही । सो हकीकत कहौ मैं तोही ॥
अष्टचौकाको शब्द सुनावा । राजा रानी लोक पठावा ॥
दुसरे राय वटक्षेत्रके आवा । सतसुकृति तहँ नाभ धरावा ॥
तिन राजा पूछा चित लायी । तब तेहि भेद कह्यो समझायी ॥
पान परवाना राजहिं दीन्हा । राजा वास लोकमें कीन्हा ॥
तिसरे राय हरचन्द कहँ आये । बन्ध काटिके लोक पठाये ॥
चौथे पुरी मथुरामें आयी । विकसी ग्वालिनके समझायी ॥
चारिहंस सतयुग समझाये । ते चारों गुरुवंश कहाये ॥
चारिहंस नौ लाख बचाये । शब्द भरोसे घरहि पठाये ॥
त्रेता युगका वर्णन
पुनि त्रेता युग कहौ विचारी । सात हंस त्रेतायुग तारी ॥
प्रथम ऋषी शृंगी समझाये । दुसरे अयोध्या मधुकर आये ॥
तिनसे शब्द कह्यो टकसारा । चौथे बोधे लछन कुमार ॥
पचवें चलि रावण लगि गयऊ । तहाँ भेंट मन्दोदरिसे भयऊ ॥
गर्वी रावण शब्द न माना । मन्दोदरी शब्द पहचाना ॥
छठै चलि वसिष्ठ लगि आये । ब्रह्म निरूपन उर्नहि सुनाये ॥
सतये जंगलमें कियो वासा । जहाँ मिले ऋषी दुर्वासा ॥
सात हंस सातौ गुरु कीन्हा । परमतत्त्व उन्ही भल चीन्हा ॥
सातौ गुरु त्रेतामें भयऊ । देह उपदेश सो हंस पठयऊ ॥
द्रापरयुग वर्णन
त्रेता गत द्रापर युग आया । सत्रह जीव परवाना पाया ॥
प्रथमें रायचन्द विजय कहँ गयऊ । ताकी रानी इन्दुमति रहेऊ ॥