कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
गैबी रहनी
( ९० )
ज्ञानसागर
चौपाई
जैसे ग्रेही के मन नेहा । तैसे साथे जोग सनेहा ॥
आसन हठ पर नारि न जावै । ग्रेही रहै न भेष बनावै ॥
देखी देखा भेष बनावै । राध जोग तो शोभा पावै ॥
भेषै धरे सूरता चाही । कादर भेष की हांसी आही ॥
जाते मन सूरमा नहिं होई । तातैं ग्रेही थाप्यो सोई ॥
ग्रेही मैं छल मता अपारा । तातैं सत्य भक्ति चित धारा ॥
करे जो सेवा सन्त की सोई । आरत भक्त महा फल होई ॥
धन्य सन्त जो आरति साजा । काल जंजाल तेहि घरतैं भाजा ॥
आरति समान भक्ति नहीं दूजा । सब ते भली सन्त की पूजा ॥
चरणामृत तासु को लेई । सुरति निरति चरणन चित देई ॥
साखी-सन्त आरती जोग मन, करहि गगनमें बास ॥
ग्रेही जोग न जानहीं, कर आरति परकाश ॥
चौपाई
विना जोग मैं होय उबारा । कै नेवर कै दीपक बारा ॥
तातैं सहज जोग मैं भाखा । शिरनि पान महातम राखा ॥
आरति तो नानाविधि साजै । पान मिष्टान्न भक्त भय भाजै ॥
जो कछु आहि जोगकर भाऊ । सब भाखौ आरति पर भाऊ ॥
वह देही यह ग्रेही व्यवहारै । काया संजम दै अनुसारै ॥
निशिदिन सुरति निरति बिचारा । तातैं मंदिर सेत सद्धार ॥
पांचौ तत्त्व तीन गुण साथै । तातैं मन बिच आरति राधै ॥
इंगला पिंगला सुषमनि वासा । मन बिच कर्म आरत परकाशा ॥
बांधै मूल नाम को साथै । दुबिधा मिटै एक अवराधै ॥
एक घरै कर प्रकृति पचीसा । सोई पुरुष आरति मैं दीसा ॥
साखी-उलट पवन जब आवै, त्रिकुटी भेट जो होय ॥
गुरु की दायो प्रकट हो, संपुट उघरै सोय ॥