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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

छठे दिन कबीर साहबका धर्मदास साहबसे दूसरी बार मिलना

(१४)

ज्ञानप्रकाश

विकल भये आवै नहिं स्वासा । हमहिं छोंडि कहैं गये उदासा ॥
जो मैं जनतेउँ होइ विछोही । पलकन लइतों निरखत तोही ॥
छन्द-मोहिं काह जानि दरश दिये प्रभु जुदा पुनि काहे भये ॥
छिन पलक देत विलम्ब नहिं कौन दिशा गवनन किये ॥
बहु छोभ होत न जात विरह मन विकल धीरज ना धरे ॥
जमुनातट खड़े झखहिं जिमिपिया वियोगी भवन मुछितपरे ॥
साखी-शोच हृदया रैन दिन, भोजन भवन न भाव ॥
बड़े भाग्य सो मिले प्रभु, बिछुरे कबहुँ भेटाव ॥
सोरठा-करत शोच मन भाव, सुख सम्पत न सोहावई ॥
मोहिं चैन नहिं आव, जौं लगि चरण न देखिहौं ॥

छठ दिन कबीर साहेबका फिर मिलना-चौपाई

दिवस पाँच जब ऐसहि बीता । निपट विकल हिय व्यापेउ चिन्ता ॥
छठयें दिन अस्नान कहैं गयऊ । करि अस्नान चितवन कियऊ ॥
पुहुप वाटिका प्रेम सोहावन । बहु शोभा सुन्दर झुठि पावन ॥
तहाँ जाय पूजा अनुसारा । प्रतिमा देव सेव विस्तारा ॥
खोलि पेटारी मूर्ति निकारी । ठाँव ठाँव धरि प्रगट पसारी ॥
आनेउ तोरि पुहुप बहु भाँती । चौका विस्तार कीन्हीयहि भाँती ॥
भेष छिपाय तहाँ प्रभु आये । चौका निकटहिं आसन लाये ॥
धर्मदास पूजा मन लाये । निपट प्रीति अधिक चित चाये ॥
मन अनुहारि ध्यान लौलावई । कहि कहि मंत्र पुहुप चढ़ावई ॥
चन्दन पुष्प अच्छत कर लेही । निमित होय प्रतिमा पर देही ॥
चवर डोलावहिं घण्ट बजायी । स्तुति देवकी पढ़ै चित लायी ॥
करि पूजा प्रथमहि शिर नावा । डारि पेटारी मूर्ति छिपावा ॥

सतगुरु वचन

अहो सन्त यह का तुम करहुँ । पौवा सेर छटंकी धरहुँ ॥
केहि कारण तुम प्रगट खिडायहु । डारि पेटारी काहे छिपायेहु ॥

बोधसागर

(१५)

धर्मदास वचन

बुद्धि तुम्हार जान नहि जाई । कस अज्ञानता बोलहु भाई ॥
हम ठाकुर कर सेवा कीन्ह। हम कहैं गुरु सिखावन दीन्ह ॥
ता कहैं सेर छटंकी कहहुँ । पाहन रूप ना देव अनुसरहुँ ॥

सतगुरु वचन

अहो संत तुम नीक सिखावा । हमरे चित यक संशय आवा ॥
एक देव सम सुनेउ पुराना । विप्रन कहे ज्ञान सुनिधाना ॥
वेद वाणि तिन्ह मोहि सुनावा । प्रभुके लीला सुनि मन भावा ॥
कहे प्रभू वह अगम अपारा । अगम गहे नहि आव अकारा ॥
सुनेउँ शीश प्रभुकेर अकाशा । पगपताल तेहि अपर निवाशा ॥
एके पुरुष जगतके ईसा । अमित रूप वह लोचन अंमीसा ॥
सोकित पौतिन्ह माहि समाहीं । अहो सन्त यह अचरज आहीं ॥
औ गुरुगम्य मैं सुना रे भाई । अहैं सङ्ग प्रभु लखौ न जाई ॥
अहो सन्त मैं पूछहुँ तोहीं । बात एक जो भाषो मोहीं ॥
यहि घटमहैं को बोलत आही । ज्ञानदृष्टि नहि सन्त चिन्हाही ॥
जौ लगि ताहि न चीन्हहुँ भाई । पाहन पूजि मुक्ति नहि पाई ॥
कोटि कोटि जो तीर्थ नहाओ । सत्यनाम विन मुक्ति न पाओ ॥
को तुझ को तव को घट माहीं । सन्तों चीन्ह वेगि तुम ताहीं ॥
सर्वे मई औ सबते न्यारा । सो खेले यह खेल रिसाला ॥
जो घरवा में बोले भाई । काहि नाम तेहि कहहु बुझाई ॥
कीन सुन्दर यह साज बनाया । नाना रंग रूप उपजाया ॥
ताहि न खोजहु साहु के पूता । का पाहन पूजहु अजगूता ॥
धर्मदास सुनि चकित भयऊ । पूजापति बिसरि सब गयऊ ॥
एक टक मुख जो चितै रहाई । पलकौ सुरति ना आनौ जाई ॥
प्रिय लागे सुनि ब्रह्मका ज्ञान । विनयकीन्ह बहु प्रीति प्रमाना ॥

१ अमित का विगाड़ है ।

(१६)

ज्ञानप्रकाश

धर्मदास वचन

अहो साहब तब बात पियारी । चरण टेकि बहु विनय उचारी ॥
अहो साहब जस तुम्ह उपदेशा । ब्रह्मज्ञान गुरु अगम सँदेशा ॥
छठयें दिवस साधु एक आये । प्रीय बात पुनि उनहु सुनाये ॥
अगम अगाधि बात उन भाखा । कृत्रिम कला एक नहिं राखा ॥
तीरथ व्रत त्रिगुण कर सेवा । पाप पुण्य वह करम करेवा ॥
सो सब उन्हहि एक नहिं भावै । सबते श्रेष्ठ जो तेहि गुण गावै ॥
जस तुम कहेहु विलोइ विलोई । अस उनहूँ मोहिं कहा सँजोई ॥
गुप्त भये पुनि हमकहँ त्यागी । तिन्ह दरशनके हम वैरागी ॥
मोरे चित अस परचै आवा । तुम्ह वै एक कीन्ह दुइ भावा ॥
तुम कहाँ रहो कहो सो बाता । उन्ह साहब कहँ जानहु ताता ॥
केहि प्रभु कै तुम सुमिरण करहु । कहहु विलोइ गोइ जनि धरहु ॥

सतगुरु वचन

अहो धर्मदास तुम सन्त सयाना । देखौं तोहि मैं निरमल ज्ञाना ॥
धर्मदास मैं उनकर सेवक । जहँहि सो भव सार पद देवक ॥
जिन कहा तुमहिं अस ज्ञाना । तिन साहेब कै मोहिं सहि दाना ॥
वे प्रभु सत्यलोकके वासी । आये यहि जग रहहिं उदासी ॥
नहिं वो भग दुवार होइ आये । नहिं वो भग माहिं समाये ॥
उनके पाँव तत्त्व तन नाहिं । इच्छा रूप सो देह नहिं आहिं ॥
निःइच्छा सदा रहँहीं सोई । गुप्त रहहिं जग लखै न कोई ॥
नाम कबीर सन्त कहलाये । रामानन्द सो जान सुनाये ॥
हिन्दू तूर्क दोउ उपदेशैं । मेटैं जीवन केर काल कलेशैं ॥
माया ठगन आई बहु बारी । रहैं अतीत माया गइ हारी ॥
तिनहि उठावा तोहि पाही । निश्चय उन्ह सेवक हम आही ॥
अहो सन्त जो कारज चहहु । तो हमार सिखावन गहहु ॥
उनकर सुमिरण जो तुम करिहौ । एकोतरसौ पुरुषा लै तरिहौ ॥

बोधसागर

(१७)

वो प्रभु अविगत अविनाशी । दास कहाय प्रगट भे काशी ॥
भाषिन निरगुण ज्ञान निनारा । वेद कितेब कोइ पाव न पारा ॥
तीन लोक महाँ महतो काला । जीवन कहैं यम करै जँजाला ॥
वे यमके सिर मर्दन हारे । जनहि गहै सो उत्तै पारे ॥
जहाँ वो रहहि काल तहाँ नाही । हंसन सुखद एक यह आहीं ॥

धर्मदास बचन

अहो साहब बलि बलि जाऊँ । मोहिं उनके सँदेश सुनाऊँ ॥
मोरे तुम उनहीं सम भाई । तुम वै एक नाहिं विगराई ॥
नाम तुम्हार काह है स्वामी । सो भाषहु प्रभु अन्तर्यामी ॥

सतगुरु बचन

धर्मनि नाम साधु मम आही । सन्तन माँह हम सदा रहाही ॥
साधूसंगति निशिदिन मन भावै । सतगुरु ज्ञान साधु मिलि गावै ॥
जो जिव करै साधु सेवकाई । सो जिव अति प्रिय लागै भाई ॥
हमरे साहिबकी ऐसन रीती । सदा करहिं साधुन सो प्रीती ॥
जो जिव उन्हकर दिशा लेहीं । साधू सेव सिखावन देहीं ॥
जीव दया पर आतम पूजा । सद्गुरु भक्ति देव नहिं दूजा ॥
सद्गुरु सङ्कट मोचक आहीं । निरगुण भक्ति छुवैं यम नाहीं ॥

छन्द-है आपु सत्यकबीर सद्गुरु प्रकट कहु तुम सना ॥
सत्यनाम भक्ति हठावहिं दया क्षेम निश्चल मना ॥
मन कर्म भर्म अबाट परिहरि बाट घरको देत हैं ॥
जो शीश अरपे भव तरे सार जेहि यह लेत हैं ॥

साखी-सुनहु संत मति धीर, हृदया करहु विवेख ॥
हो ज्ञाता परखहु हिये, संत असंतको रेख ॥

सोरठा-जीवन यम धरिखाय, सत्यनाम जाने बिना ॥
वाचै एक उपाय, सत्यकबीर कहि भव तरे ॥

(१८)

ज्ञानप्रकाश

धर्मदास वचन-चोपाई

अहो साहब तुम्ह अविगत अहहू । अमृत वचन तुम निश्चय कहहू ॥
हे प्रभु पूछेउ बात दुइ चारा । अब मैं परिचय भेद विचारी ॥
सो तो हम नहि जानहि स्वामी । तुम कहहु प्रभु अंतरयामी ॥

सतगुरु वचन

अहो धर्मदास तुम्ह भलयह भाखो । कहो सो जो प्रतीति तुम राखो ॥
अहहु निगुरा कि गुरु किहुँ भाई । तौन बात मोहि कहहु बुझाई ॥

धर्मदास वचन

हे सामर्थ्य गुरु हमतौ कीन्हा । यह परिचे गुरु मोहि न दीन्हा ॥
रूपदास विठलेश्वर रहहीं । तिनकर शिष्य सुनहुँ हम अहहीं ॥
उन मोहि इहे भेद समुझावा । पूजहु शालिग्राम मन भावा ॥
गया गोमती काशि परागा । होइ पुण्य शुद्ध जनम अनुरागा ॥
लक्ष्मीनारायण शिलाकै दीन्हा । विष्णुपंजर पुनि गीता चीन्हा ॥
जगन्नाथ बलभद्र सहोद्रा । पञ्चदेव औरो योगीन्द्रा ॥
बहुतैं कही प्रमोध दढाई । विष्णुहिं सुमिरि सुक्ति होइ भाई ॥
गुरुके वचन शीश पर राखा । बहुतक दिन पूजा अभिलाखा ॥
तुम्हरी भेष मिले प्रभु जबते । तुम बानी प्रिय लागी तबते ॥
वे गुरु तुम्हहीं सतगुरु अहहू । सारभेह मोहिं प्रभु कहहू ॥
तौहैर दास कहाउब स्वामी । यमते छोडावहु अन्तरयामी ॥
उनहुँ कर नाहीं निन्द करावै । अस विश्वास मोरे मन आवै ॥
वह गुरु सर्गुण त्रिगुण पसारा । तुमहौ यमते छोडावनहारा ॥

सतगुरु वचन

सुनु धर्मनि जो तव मन इच्छा । तौ तोहिं देउँ सार पद दिच्छा ॥
तुम अब निज भवन चलि जाऊ । गुरु परीक्षा जाइ कराऊ ॥
जो गुरु तुम्हैं न कहैं सँदेशा । तब हम तुम्ह कहैं देव उपदेशा ॥
हमहुँ जाहिं सतगुरु पहुँ भाई । तुम्हरी प्रीति अब उनहिं सुनाई ॥

बोधसागर

(११)

धर्मदास बचन

हे साहेब एक आज्ञा पावों । दया करो कछु प्रसाद लै आवों ॥

सतगुरु बचन

हे धर्मदास मोहि इच्छा नाहीं । क्षुधा न व्यापै सहज रहाहीं ॥
सत्यनाम है मोर अंधारा । भक्ति भजन सतसंग सहारा ॥

धर्मदास बचन

अहो साहब जो अन्न न खाहू । तो मोरे चितकर मिटै न दाहू ॥

सतगुरु बचन

तुम्है इच्छा तो ल्यावहु भाई । अन्तै लेइ पाइव हम जाई ॥
धर्मदास उठि हाट सिधाये । बतासा पेडा रुचि लै आये ॥
आनि धरेउ आगे प्रभुकेरा । विनय भाव कीन्ह बहुतेरा ॥
अहो साहु अब अज्ञा देहू । गुरु पहाँ जाब आशिष लेहू ॥

धर्मदास बचन

करि दण्डवत धर्मनि कर जोरी । अबधौ सुदिन होइ कब मोरी ॥
तेहि दिन सुदिन लेखब प्रभुराई । जेहि दिन तुव पगु दरशन पाई ॥
हम कहैं निज चेरा करि जानो । सत्य कहौं निश्चयकरि मानो ॥
आशिष दे प्रभु चले तुरन्ता । अबिगति लीला लखेको अन्ता ॥
धर्मदास चितवहि मगु ठाढो । उपजा प्रेम हृदय अति गाढो ॥
छंद-विलखि लोचन जब प्रभु अन्तर भये तबहीं चित अति खरभरे ॥
चक्षुवारिध प्रबल प्रवाह भव हिय धीरज तनिको ना धरे ॥
धरि स्वास आस विश्वास मिलन बहुरि जो भवन सिधायऊ ॥
गिरहि सेज विथा विकल होइ उर विरह अति दुख छायऊ ॥
साखी-भोजन क्षेम मलीन तन, बसन विभेष बनाइ ॥
रेनि दिवस छिन कल नहीं, जहाँ तहाँ बैठे जाइ ॥