कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीर साहब का सत्यलोकसे चलकर निरंजनसे वार्तालाप करके पृथ्वीपर आनेका वृत्तांत
( ६० )
अनुरागसागर
और देव ऋषि मुनिवर जेते । जिन गुरुलीन्ह उत्तर सो तेते॥
जो गुरु मिले तो पंथ बतावे । सार असार परख दिखलावे॥
गुरु सोई जो सत्य बतावे । और गुरु कोइ काम न आवे॥
सत्य पुरुषके कहे सँदेशा । जन्म जन्मका मिटै अँदेशा॥
पाप पुन्यकी आशा नाहीं । बैठे अक्षय वृक्ष की छाँही ॥
भुङ्गी मत होवे जिहि पासा । सोइ गुरुसत्य सुनो धर्मदासा॥
छन्द
जो रहित घर बतलावई, सो गुरु सांचा मानिये ॥
तीन तजि मिलि जाय चौथ, तासुवचनपरमानिये ॥
पांच तीन अधीन काया, न्यार शब्द विदेह हैं ॥
देह माँहि विदेह दरशै, गुरुमत निज ए कहौं ॥४५॥
सोरठा-ध्यान विदेह समा, देह धरेका फल यहै ॥
नहि आवै नहि जाय, मिलइ देह विदेह होइ ॥४६॥
अस गुरु करे बनाय, बहुरि न जग देही धरे ॥
नहि आवे नहि जाय, जिहि सतगुरुदाया करे ॥४७॥
धर्मदासवचन
हे प्रभु मोहि कृतार्थ कीन्ह। पूर्ण भाग्य दरश सुहि दीन्ह॥
तव गुण मोसन वरणि न जाई। मो अचेत कहै लीन्ह जगाई ॥
सुधा वचन तुम मोहि प्रिय लागे। सुनतहि वचन मोह मद भागे ॥
अब वह कथा कहो समुझायी। जिहि विधि जगमें प्रथमें आयी॥
कबीरसाहबका सत्पुरुषकी आज्ञा पाकर जीवोंको चितानेके लिये
चलना, निरंजनसे भेंट होना और उससे बात चीत करके आगे बढ़ना
कबीरवचन
धर्मदास जो पूछ्यो मोही । युग युग कथा कहौं मैं तोही॥
जबही पुरुष आज्ञा कीन्ह। जीवनकाज पृथ्वी पग दीन्ह॥