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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

धर्मदासजीका भयमान होना

सर्वज्ञसागर

(१३३)

तेरहैं नानकसे कह्यो उपदेशा । गुप्त भेदका कहा संदेशा ॥
चौदहैं साहु दमोदर समझावा । करामात दै जीव मुक्तावा ॥
चौदह हंस कलियुगमें कीन्हा । गुरु स्वरूप परवाना दीन्हा ॥
पांचलाख हम पहिले तारे । पीछे धर्मनि तुम पगुधारे ॥
वंशन थाप्यों कियो कडिहारा । लाख ब्यालिस जीव उबारा ॥

साखी- तुम जानो हमही मिलै, फिर पूछो मोहि ॥

नाम भरोसे पहुँचि हैं, ज्ञान करे का होहि ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास जिव संशय मानी । जब बोले सतगुरु अस वानी ॥
दोह करजोरि चरण चित धरई । फिर फिर गुरुसों विनतीकरई ॥
बड़ी भूल हमरे जिय आयी । समरस करिके ज्ञान फैलायी ॥
मेटचो धोखा साहिब मोरा । दयासिन्धु जिव बन्दी छोरा ॥
धर्मदास जिय भये मलीना । जैसेकमलजिव सम्पुटदीन्हा ॥
अजान जीव हम तुम्हैं न चीन्हा । भाग बड़े मोहि दर्शन दीन्हा ॥
जो कुछ कहब सोई हम मानब । वचन तुम्हार हृदयमें आनब ॥

साखी-धर्मदास जिव डरपे, गुरुकी मानी त्रास ॥

अब नहिं पूछौं ज्ञान मैं, मोहिं दरशकी आस ॥

सतगुरुबचन-चौपाई

सुनु धर्मदास कहौं मैं तोसो । जो कछु भेद पूछिहौ मोसो ॥
प्रथमहिं समरथ आप अकेला । उनके संग दोसर नहिं चेला ॥
तब निश्चल शब्द उच्चारण भयऊ । तेहि शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥
तेहि कमलमें आसन दियऊ । तहाँ शब्द एक कमल निर्मयऊ ॥
तेहि कायाको रूप अपारा । असंख पाखरीको विस्तारा ॥

(१३४)

सर्वज्ञसागर

तहाँ बैठि सब रचना कीन्ह। सोई शब्द अधार जो लीन्ह। ॥
सुख हिरदय ते कीन्ह प्रकाशा। तहाँ रूप अति भयी उजासा ॥
काया ते काया निरमाये। सुख कमल हो बाहर आये ॥
रूप सुरतिका रूप अपारा। भुंगि शब्द पारस अनुसारा ॥
भुंगिशब्द पुनि पारस दीन्ह। निःकलंकपुरुषप्रकटकरलीन्ह। ॥
रूप सुरति ते निकलंकी भयऊ। तिनको आज्ञा उत्पति दियऊ ॥
निकलंक विनती तब कीन्ह। कौन सन्धि साहब मोहि दीन्ह। ॥
कहौ भेद जेहि उत्पन होई। सोई शब्द गुरु भाषो सोई ॥
तब समरथ अस वचन उचारा। निष्कलंक सुन मता हमारा ॥
शब्द हमार दृढ हिरदय धरहू। निज सुमिरण तुम हमरा करहू ॥
जो चित सुरति तुम्हारे होई। तौन वस्तु सिसै सब कोई ॥
साखी-जो कुछ रचना चाहो करन, सुरति करत सो होई ॥
रचहु लोक तुम वेगि पुनि, दीन्ह वचन मैं सोई ॥

चौपाई

सुरति करत सबही बनि आई। इच्छा करत सन्धि होय भाई ॥
निश्चल लोक हमारो बासा। अविगति कमल कीन्ह प्रकासा ॥

साखी-जीव सृष्टि रचना करो, सकल जीव उत्पान ॥
शब्द भरोसे तुम रहो, लेउ वचन सिर मान ॥

चौपाई

तुम धर्मदास सुनो चित लाई। तब निष्कलंक सृष्टि निरमायी ॥
निःकलंक सुरति स्वास ठहरायी। सहज सुरतिको टेक बनायी ॥
दहिने अंक सो शब्द निर्मायी। सहज शब्द सुरति अंकुर उपायी ॥
सात करी विस्तार बनायी। यहि विधि रचना निरमायी ॥

सर्वज्ञसागर

( १३५ )

सात करी अंकुर ते भयऊ । भिन्न भिन्न प्रसंग सो लयऊ ॥
सीप सरूपी करी जो कीन्हा । स्वास स्वरूपी इच्छा दीन्हा ॥
सात इच्छा सात करिनमें भयऊ । स्वाति सरूप बून्दतेहि दयऊ ॥
सातो करि भयी प्रकासा । नहिं तब धरती नहीं अकाशा ॥
अर्द्ध अंकुर रहा ठहरायी । तब मुख शब्द स्थिर कहैं आयी ॥
सोरह अंस जो जन विस्तारा । इतनी दृष्टि अंकुरज पसारा ॥
तेहिमें सास करी उपजायी । ताकर मर्म काहु नहिं पायी ॥
तेहि करिन ते अण्डा भयऊ । द्योयकरी विन अण्डा रहेऊ ॥
नहिं तब धरती नहीं अकाशा । अधरहिं अघर अण्ड प्रकासा ॥
मध्य में अण्ड करे चौ चण्डा । एक अण्ड उपज्यो प्रचण्डा ॥
भिन्न भिन्न गति न्यारी कीन्हा । शिवशक्ति अण्डमहँ धरि दीन्हा ॥
नौसे निमिष अन्तर होय छूटा । तबहीं अण्ड उठचो पुनि फूटा ॥
प्रथमहिं तेज अण्ड विगस्यो भाई । तामें पांच तत्त्व निर्माई ॥
बाहर पालँग तेज अण्ड विस्तारा । तामें पांच तत्त्व भौ सारा ॥
तत्त्व स्नेह अण्ड सो कीन्हा । अस्थिर शब्द काल भल दीन्हा ॥
तबहीं श्रवण साजी वानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलपरस सुरति कहि दीन्हा । सात संधि प्रकट कर लीन्हा ॥
सात सन्धि तब गुप्तहिं पेखा । पीछे सोहँ शब्द विवेखा ॥
सोहँ शब्द सत्य अनुसारा । सोहँ सुरति अजावन पसारा ॥
जावन ते पुरुष अचित निर्मायी । तेहि पुरुष अपने निकट बुलायी ॥
तेहि सो पुरुष ऐसी कही । सकल सृष्टि रचो तुम सही ॥
पुरुषको विनय कीन्ह करजोरी । हो सतगुरु विनती यक मोरी ॥
केहि विधि रचौं सो देहु बतायी । तीन भेद गुरु देउ पढायी ॥
नीकलंकी पुरुष वाच उच्चार । शब्द प्रतापकर अगम विचारा ॥
शब्द प्रताप लेओ शिर नायी । सुमिरण करौ हमहिं लौलाई ॥