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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

चित्रगुप्तसे वार्तालाप

(८४)

अमरसिंह बोध

यहिविधिजोयम शासतिकरई । कहैं लगि कहौं पार नहिं परई ॥
सुनत हाल व्याकुल धर्मदासु । सुख प्रस्वेद नहिं आवै श्वासु ॥
देखि दशा सदगुरु बोले । केहि कारण धर्मनि तुम डोले ॥
धरि धीरज तब धर्मनि भाषा । नरककथासुनिभयमन भाखा ॥

धर्मदास वचन

हो साहेब यम बड विकरारा । केहि विधि हंसा पावे पारा ॥
यही भय मम मन महाँ आवै । चितवत चितव्याकुलहोयजावै

सतगुरु वचन

सुनत वचन प्रभु मन विहँसाये । कही शब्द धर्मनि समुझाये ॥
धर्मनि तुमही भय कलु नाही । सतगुरु शब्द है तुमरे पाही ॥
अपर कथा सुनहु चितधारी । संशय मिटै तो होहु सुखारी ॥
जब राजा विनती ममकीन्हा । तब हम ताहि दिलासा दीन्हा ॥
शब्द गहै सो नाहि डराई । तुम किमिडरहु सुनहु हो राई ॥
सत्य शब्द मम जे जिव पैहैं । काल फांस सो सबै नशैंहैं ॥
सुनत वचन राजा धरु धीरा । बोले वचन काल बलबीरा ॥

चित्रगुप्त वचन

है साहब तुम काह विचारो । नगर हमार उजारन धारो ॥
हो साहब जो तुम अस करहु । न्याय नीति सबही तुम हरहु ॥
सुनो साहेब एक बात हमारी । पंथ तुम्हारा चले संसारी ॥
ताते बिनती करैं बहोरी । सुनो गुसाइयाँ अरनो मोरी ॥
ब्रह्मा विष्णु शिव अधिकारी । तीनकी आशजगतमहैं भारी ॥
उनको हम नहिं कबहु डरावैं । चूक चाल तो ताहि नचावैं ॥
और जीवकी कौन चलावे । हमते उबरन एको न पावे ॥
सीधि चाल चलुजीव सुजाना । सो जीव देहों लीक पयाना ॥
परंपंच करी साहेबको धावे । हम ते जीव जान नहिं पावे ॥
चाल चलत लागै बडिबारा । ताते नाहीं दोष हमारा ॥