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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत

(१४६)

लक्ष्मणबोध

सत्यकबीर-वचन

तब ठाकुर मन चकित भयऊ । सुनत तब गरव गलि गयऊ ॥
तब गोविन्द आपु चलि आये । तब कबीर उठि मिले जो धाये ॥
लक्ष्मी गोविन्द कबीर बैठाये । तब गोविन्द एक बात सुनाये ॥

गोविन्द वचन

हम तो गतिमति तुमरी न पाई । हमको लक्ष्मी अब समझाई ॥
सार्वी-जो तुम अंशपुरुष के, सतगुरु हौ तुम सोउ ।
देवल गाडे रेत में, ताहि वन्दन करि लेउ ॥

चौपाई

जबहि उदधिपल सजिके आया । तबहि कबीर पुकार जनाया ॥
घँसि समुद्र पताले भयऊ । देखत गोविन्द चकित भयऊ ॥
तब विन्ती सतगुरु सो कीन्हा । दौयकर जोरि लक्ष्मी आधीना ॥
चलो कबीर यज्ञमें पगधारो । तुमते शोभा रही हमारो ॥

सत्यकबीर-वचन

छप्पन भोग चढाओ जाई । सत्य समरथको भोग लगाई ॥
तब तुम हमको देखो जाओ । अरध प्रसाद रखा जब पाओ ॥
तब गोविन्द स्थान उठि आये । जाई उपदेश राजहि सुनाये ॥
छप्पन भोग चढाओ जायी । सत्य समरथ को भोग लगायी ॥
राजा पंडा कहै बुझाई । छप्पन भोग चढावहु जाई ॥
सो समरथ को भोग लगायी । तब तुम पावो प्रसाद अघायी ॥
आध प्रसाद ऋषी जब पाई । तब तुम हमको दिखाओ भाई ॥
हारि समुद्र तब ब्राह्मण भयऊ । हाथ जोरिके ठाढे रहऊ ॥

समुद्र वचन

कौन हौ भाइ कहाँते आये । वस्ती छोड़ि यहाँ कस बैठाये ॥
यहाँ तो लहर समुद्रकि आई । आओ यज्ञमें भोजन पाई ॥

बोधसागर

( १४७ )

सत्यकबीर वचन

तबहि कबीर कहे समुझायी । तुम समुद्र कस वरण छिपायी॥

समुद्र वचन

तब समुद्र अस वचन सुनाई । कहा है नाम तुम्हारो भाई ॥

सत्यकबीर वचन

हम तो अंश पुरुष सरदारा । भक्त कबीर है नाम हमारा ॥

समुद्र वचन

तब समुद्र बोले ऐसी बानी । हमतो हार तुमहिं से मानी ॥
हमरो मंथन जब इन कीया । बड़दुख तब इन हमको दीया ॥
और त्रेतामें पैज बँधाई । तबका वैर हमको साले भाई ॥
तुम तो हो सतगुरु होड़ु सहाई । तुमते हमार कछू न बसाई ॥

सत्यकबीर वचन

तब समुद्र को हम समझायी । निर्धनको चोर कहा लै जायी ॥
सब जग साख तुम्हारी देई । तुम दाता हम भिक्षुक होई ॥
इतनी दया तुम हमपर कीजो । बोली करी कथा सुनि लीजो ॥
इनको टहल शीश जो दीना । तापर दुष्ट दगा जो कीना ॥
त्रिया हरण इनकी जो भयऊ । जब इन बनहि बसेरा लियऊ ॥
राम लक्ष्मण हनुमान मिलायी । तब तिन मति असकीन बनायी ॥
सागर बाँधनका मता जो कीना । मच्छरूप तुमही धरि लीना ॥
तब तुम ला उनके ठगिरहेऊ । करि विश्वास बहुतै दुख सहेऊ ॥
यह अपने मन गरब झुलाना । हमरे नाम सो शिला तराना ॥
राम नाम जब अंक चढावा । धरे पैर जब लीन चुवावा ॥
खत राम तब चकित भयऊ । तबही शीश धूनि कर रहे ऊ ॥
अतिही शोच करे बल वीरा । शीश डुलावे सागर तीरा ॥
जलमें जंतु देख्यो बड़ भारी । यह तो झूठी पैज हमारी ॥