कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
योनिप्रभाव मेटनेका उपाय
( ४८ )
अनुरागसागर
जिहि जो इतने जो नर आज । ताको तैसो आहि सुभाऊ ॥
अघकरमी घातक विष पूजा । जो इन प्रभाव होय नहि दूजा ॥
योनिप्रभाव मेटनेका
सतगुरु मिले तो ज्ञान लखावै । काग दशा तव सब बिसरावै ॥
मुरचा जो इन छूटे तब भाई । ज्ञान मसकला फिरे बनाई ॥
जब धोबी वस्तर कहैं धोवे । जससाबुन मिल उज्वल होवे ॥
थोर मैल कर वस्तर भाही । थोड़े परिश्रम मैल नसाई ॥
निपट मलिनजे वस्तर आही । ता कहैं अधिक अधिक श्रम चाही
जैसे मैल वस्तर कर भाऊ । ऐसे जीवन करे सुभाऊ ॥
कोइ कोइ जो अंकुर होई । स्वरूप ज्ञान सो गहे विलोई ॥
धर्मदास वचन
यह तो स्वरूप जोनि करलेखा । खानि भाव अब कहूँ विशेषा ॥
चारि खानिको जिव है जोई । मनुष्य खानमहँ आवे सोई ॥
ताकर लच्छन मोहि बताओ । विलग विलग करि मुहिस मझाओ
जेहि परखी सुहहिं महँ चेतू । कर अब साहब यहि बड़ हेतू ॥
चारि खानिके लक्षणोंकी पारख । कबीर वचन
धर्मदास परखहु चित लायी । चारि खानि गुण कहूँ समुझायी ॥
चारों खानि जीव भरमाया । तब ले नरकी देह धराया ॥
देह धरे छोड़े जस खाना । तैसे ता कहैं ज्ञान बखाना ॥
लच्छन औ अपलच्छन भेदा । सो सब तुमसौ कहौ निषेदा ॥
अण्डजखानसे मसुष्यदेहमें आये हुए जीवकी पारख
प्रथम कहौ अण्डजकी बानी । एकहि एक कहौ बिलछानी ॥
आलस निद्रा जा कहैं होई । काम क्रोध दारिद्री सोई ॥
चोरी चंचल अधिक सुहाई । तृष्णा माया अधिक बढ़ाई ॥
चोरी बुगुली निन्द्रा भावे । घर बनझाड़ी अगिन लगावे ॥
रोवे कूंदे मंगल गावे । भूत प्रेत सेवा मन भावे ॥