कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत
बोधसागर
( ७९ )
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । गुरुडको ज्ञान सुनो विख्याता॥
हम तीनों अवरे नहिं कोई । हमरे परे सुनावै सोई ॥
ब्रह्मा कहै विष्णु सों बाता । हमको कहत है परलय घाता॥
हम तो तीन लोकको कीन्हा । हमको सकल देवता चीन्हा ॥
गुरुड वचन
तबहि गुरुड यक वचन उचारा । जब कर्ता तुम सृष्टि सव्वारा ॥
वह साहब सबही ते न्यारा । कस नहिं ताकर करो विचारा॥
जिन साहब तुम्हें निर्मायी । तुम कस ताको नाम छिपाई॥
विष्णु रहत हैं तुम्हरे पास । तिनहुं को पुनि काल गरासा॥
क्रोधवंत ब्रह्मा तब भयेऊ । अचरज बात गुरुड जो कहेऊ॥
जाकी तैं पुनि सेवा करई । सो तो हमरे त्रास महँ डरई ॥
सुर नर सुनि सब काहू चीन्हा । सुनु पंछी तैं मतिका हीना ॥
लोक वेद सब हम कहैं जाने । न जानूं कस आप चित आने॥
गुरुड वचन
सुनु ब्रह्मा तैं गर्व भुलासी । तोहि अस ब्रह्म कोटि मरासी॥
हम तो ब्रह्मा बहुत जो देखा । जी पूछहु तो काढों लेखा ॥
काढों विष्णु कोटि सै चारी । महादेव जाके भंडारी ॥
मैं तो भक्त कवीरका चेला । युगन युगन जिन कीन्हो मेला॥
हमसों कह्यो कवीर बुझायी । ताते आय कह्यो गोहराई ॥
ब्रह्मा वचन
ब्रह्मा कोपि उठे तब भाई । विष्णु महादेव सुनहुँ आई ॥
विष्णु वचन
आये दूनों जन ब्रह्मा ठाई । विष्णु कहै कस मता दिढाई ॥
काह आज जिव बहुत उदासा । कीन्हो क्रोध गुरुड के पास ॥
कहो वचन मुख होय प्रकाश । हम अजान है तुम्हरे आसा ॥
( ८० )
गरुडबोध
ब्रह्मा कहै सुनो हो भाई । अविगत की गति गरुड सुनाई॥
हमहीं तीन अवर नहिं कोई । चौथे एक निरंजन सोई ॥
ताको गरुड न माने भाई । ताते मोहि कोध भौ आई ॥
तिहि कारण हम तुम्हें बुलावा । गरुड ज्ञान हमहीं समझावा ॥
विष्णु वचन
विष्णु कहैं सुनो गरुड विचारी । आदि अंत कोई अगम है भारी॥
एक ध्यान हमहूं नहिं कीना । अविगति बात हमहूँ नहिं चीना॥
अहमेव मटी सुरत लगाया । अविगति ध्यान तबहूँ नहिं पाया॥
ध्यान मध्य हम देखा जाही । ब्रह्मा विष्णु महादेव नाहीं ॥
साखी-विष्णु नहीं ब्रह्मा नहीं, माहादेव नहिं कोय ।
ओम्ओंकार तहवाँ नहीं, निरखि देखा हम सोय ॥
ब्रह्मावचन-चौपाई
तब ब्रह्मा अस वचन उचारा । यह है बड़ा काल वटपारा ॥
विष्णु वचन
सुनु ब्रह्म अविगती कहानी । विना तत्त्व मैं निरखा बानी ॥
ताकी का कहिये अब वाता । अगम अपार कहूँ विरुगता ॥
साखी-निःकामी निध्यानि सोई, निज्जेमी निर्वान ।
कहै विष्णु ब्रह्मा सुनो, अविगति यहि विधि जान ॥
चौपाई
ब्रह्मासों कहै विष्णु बखानी । है कोई आदि पुरुष निर्वानी ॥
दुर्वासा संग रहे जब भाई । अविगतिकी गति तब हम पाई ॥
तबका बोल हम कीन्ह परमाना । ताते हम जानहिं निरवाना ॥
दुरवासा गुरुभक्ति दृढाया । तब ते हमहु परम पद पाया ॥
साखी-ब्रह्मा हमकहैं जानहुँ, और न कोई सांच ।
दृढा ज्ञान नहिं आवई, ताते काया कांच ॥