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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

भविष्यत् कथा । चक्रवर्त्तीका वर्णन

ज्ञानसागर

( १०५ )

महल पंच भूत तहाँ नाहीं । हँसा बैठे सुख करे ताहीं ॥
अग्र रुचिर छत्र सिर छाजा । हँसा लइत बहुत सुख साजा ॥
जाय दिव्य तहाँ कर्गहि निवासा । विमल अंग शोभा बहु पासा ॥
मिटै अम तव परिचय पाई । जहाँ रहै तहवाँ ठकुराई ॥

सारखी-करहीं हंस सुख अस्थिर, अम्बू करी अस्थान ॥

देखौ द्रौप सो पावन, कमल करी निर्वाण ॥

चौपाई

धन्य जीव पुरुष शब्द उचारा । जातै शोभा अगम अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे प्रभु सुन्यो हंस कर भेऊ । जो कछु प्रछौँ सो कहि देऊ ॥
जो कछु होय आगे व्यवहारा । आगे होय सो कहौ विचारा ॥

साहेब कबीर वचन

सुनु धर्मदास मैं कहौ बुझाई । आगे जस करि है अन्याई ॥
वंश व्यालीस अचल तुम्हारा । नाद बहुत है विंद विचारा ॥
तेही पाछे चरित अस होई । कहौँ प्रगट नहिं राखौँ गोई ॥
अग्नि कौन अचिन्तपुर गाऊँ । तहाँ कौ वरणन तुमहि सुनाऊँ ॥
अमृत नयन विकट है काया । नाम चक्ररथी काल स्वभाया ॥
मानै जीव सो कहो विचारा । जस रविकोट है मृत्यु है सारा ॥
ताहि नय की राज कुवारी । सोभा चहै सहित जनु नारी ॥
ताकौ भेद मैं कहौँ बुझाई । घर कुम्हार के जन्मे आई ॥
जनमत तात जननी कहैं खाई । दृष्टि परत हतन होइ जाई ॥
जस पावक महैं तुनै समाई । वहिनी खाय जो देखन आई ॥
अग्नि समान चक्ररथी भाई । तृण समान मलेछ अधिकाई ॥
बत्तिस अंगुल तासु शरीर। कहौ अगम अस दास कबीरा ॥
श्रवण एक नौ अंगुल ताही । डेढ नाक दो जिभ्या जाही ॥
यही स्वरूप विश्व कहैं ढावै । तेहि अन्तर रानी चलि आवै ॥
रानी दृष्टि परे तेहि पाहीं । भाजे गज केहरि की छाहीं ॥

( १०६ )

ज्ञानसागर

तैसई भाजै अंतक दूता । वंश तुम्हार थकै अजगूता ॥
मिटहि पंथ धर्मदास तुम्हारा । काल चरित्रै करै अपारा ॥

धर्मदास वचन

हे सतगुरु सो पुनि बतावहु । चक्ररथी को भाव बुझावहु ॥
जब दिखराय काल कौ भाऊ । धर्मदास मन त्रास जनाऊ ॥
साखी-बहुत त्रास जब कीन्है, भये व्याकुल मति भंग ॥
चक्ररथी को भाव बतायो, कह्यो वचन परसंग ॥

साहित कबीर वचन-चोपाई

अबही भाव दूर है ताही । जनि डरो त्रास वज्र जिव चाही ॥
हदूता जान करौ गुरुवाई । जातैं जीव लोक कहैं जाई ॥
जीवको बन्ध छुड़ावहु यम ते । हंस मुक्तावहु नाम जतन ते ॥
साखी-नाम जतन जो करै, ताकर होइ न हानि ॥

ज्ञान सागर सुख आगर, कहे कबीर बखानि ॥

सत्य विचार-चोपाई

ज्ञान सागर ग्रन्थ को भाऊ । समझि बूझि के पारख लाऊ ॥
अनन्त प्रकार के शब्द पसारा । विनु पारख नहीं होय उबारा ॥
शब्द परख की युगती आही । गुरु सुख कहा रमैनी माही ॥
रमैनी सताईस तेहिको जानू । बूझि विचारके हिरदय आनू ॥
पारख करनकी युक्ति जब जानो । सांच झूठ की परीक्षा आनो ॥
काल दयालको स्वरूप पिछनौ । काल सन्धि झाई मन जानो ॥
सार शब्द का पाओ लेखो । उभय आनंद तबहीं तुम देखो ॥
करु पारख तब बन्धन छूटै । विनु पारख जमै धरि कूटै ॥
इति श्रीज्ञानसागर समाप्त ॥