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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

ज्योतिदर्शन रहस्य

अवुरागसागर

( ४१ )

बाजासुनततबमगनभापुनिकीन्हमनकसख्यालहो ॥
शून्यस्वेतपीतसब्जलालदियायरंगजगालहो ॥३०॥
सो०-ताहपीछे धर्मदास, मनपनि आपदिखायल ॥
कीन्ह ज्योति परकास, देखि विष्णु हरित भये३०॥
मातहि नायो शीश, बहु अधीन पुनि विष्णुभा ॥
मैं देखा जगदीश, हे जननी परसाद तुव ॥ ३१ ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास गहि टेके पाया । हे साहिबइकसंशय आया ॥
कन्या मनको ध्यान बतावा । सो यह सकल जीव भरमावा॥

सदगुरु वचन

धर्मदास यह काल स्वभाऊ । पुरुष भेद विष्णु नहीं पाऊ ॥
कामिनिकी यह देखहु बाजी । अमृतगोय दियो विष साजी ॥
जात काल दूजा जनिजानहु । निरखि धर्म सत्यहिं पुरआनहु ॥
प्रगट सु तोहि कहो ससुझाई । धर्मदास परखहु चितलाई ॥
जब परगट तस गुप्त सुभाऊ । जोरह हृदय सो बाहर आऊ ॥
जब दीपक बारे नर लोई । देखहु ज्योति सुभाव विलोई ॥
देखत ज्योति पतंग हुलासा । प्रीति जान आवै तिहिपासा ॥
परसत होवे भसम पतंगा । अनजाने जरि परहि मतंगा ॥
ज्योतिस्वरूपकाल अस आही । कठिनकाल यह छांडत नाही ॥
कोटि विष्णु औतारहि खाया । ब्रह्मा रुद्रहि खाय नचाया ॥
कौन विपति जीवनकी कहऊँ । परखि वचन निज सहजहि रहऊँ ॥
लाख जीव वह नित्यहि खाई । असविकरालसोकालकसाई ॥

धर्मदास वचन

धर्मदास कह सुनहुँ गुसाई । मोरे चित संशय असआई ॥
अष्टंगीहि पुरुष उत्पानी । जिहिविधि उपजी सो मैं जानी ॥