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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

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बोधसागर

( ८५ )

ही कृपासे शाहजादी फिर जीवित होकर मेरे जीवनका कारण बनी है तुम्हारे इस पुण्यका फल परमात्मा तुम्हें देगा किन्तु जबतक मेरे शरीरमें प्राण है तब तक मैं तुम्हारा कृतज्ञ रहूँगा। अब सुझे सिवाय शाहजादीसे विवाह करनेके किसी प्रकारकी और इच्छा नहीं है। यदि यह स्वीकार करलेतो धर्मानुसार तुम दोनों अपने सन्मुख साक्षी बनकर हम दोनोंका सम्बन्ध जोड़ दो।

अब्दमशाहकी बातको सुनकर व्यापारीने शाहजादीको कहा कि, हे शाहजादी! यदि अब्दमशाह न होता तो तू कब्रकी कब्रमें मरकर संसारसे चलबसी होती। इसके अतिरिक्त उसने तेरे लिये कैसे २ कष्ट उठाये हैं अब उचित है कि, तू भी उसे स्वीकार करले इस प्रकारसे अनेक बातोंके समझानेपर शाहजादीने उत्तर दिया कि, आप लोगोंकी मैं बहुत कृतज्ञ हूँ आप लोगोंकी आज्ञा कदापि उल्लंघन नहीं कर सकती किन्तु अब्दमशाह इस बातका प्रण करे कि, वह कभी मुझसे अलग न होगा और न कभी मेरी आज्ञासे बाहर जायगा तब मैं इसको स्वीकार करूँगी और मेरे विवाह का यही मुद्दर होगा।

शाहजादीकी बातको सुनकर अब्दमशाह आनन्दके मारे उछल पड़े और शपथ पूर्वक शाहजादीके कहे अनुसार प्रतिज्ञा करके शाहजादीके उत्तरकी प्रतीक्षा करने लगे। फिर शाहजादीने व्यापारी और हकीमसे कहा कि शरअ ( मुसलमानी धर्मशास्त्र )

१ मुसलमानी धर्मानुसार विवाह करनेके समय बरकी ओरसे कन्याके लिये मुहर की रीतिपूरीकी जाती है। जिसमें बर अपनी प्रतिज्ञाके साथ २ नियत रुपया या अशरकी का दस्तोबेज अपनी स्त्रीके नामसे लिख देता है कि, वह आजसे उसके इतने रुपयाका ऋणी हुआ प्रथम तो कभी वह उस स्त्रीको छोड़ेगा ही नहीं यदि किसी कारणवश उसे छोड़ना चाहें अमुक रकम देकर केही छुटकारा पा सकेगा जब तक वह ऋण उसका न चुकादे तब तक वह उसको कदापि नहीं छोड़ सकता इसीका नाम मुहर है शाहजादीने अपना मुहर यही मांगा कि, यावज्जीवन अब्दमशाह छोड़कर कहीं न जावे।