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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

बलिचरित्र (वामन अवतार)

ज्ञानसागर

( २७ )

धर्मदास वचन-चोपाई

धर्मदास विन्ती अनुसारी । हे स्वामी तुम्हरी बलिहारी ॥
अब मैं पायो भेद तुम्हारा । मोर मनोरथ करौ प्रतिपारा ॥
पृथ्वी केर चरित्र सुनावहु । जन्म जन्म के भाव बतावहु ॥
जग समीप हरि को विस्तारा । तुम कह्यु स्वामी अगम विचारा ॥
आदि अन्त बूझौ प्रभु राया । अब गुरु कहौ गहौ तुव पाया ॥

साहित्य कबीर वचन

सुन धर्मन मैं तोहि बुझाऊँ । हरि चरित्र सब तोहि सुनाऊँ ॥
दैत्य महा बलि भये अपारा । यज्ञ अश्वमेध कीन्ह विस्तारा ॥

बलि चरित्र

बलि भयो दानी महा प्रचंडा । स्वर्ग पताल मही नौ खंडा ॥
जो जांचै तिहि देय तुरन्ता । जांचय फिर आवै हरषन्ता ॥

छन्द

जाचक भयो जो धनी बहुविधि दीन्ह नहि कोई जग रह्यो ।
पाई मुक्ति वर अवराध्यौ दैत्य ऐसो वृत्त गह्यो ॥
शुक्र मन्त्री मन्त्र ठान्यो अश्वमेध यज्ञ जो कीजिये ।
मुक्ति बर पावै नहौ तो स्वर्ग बरबस लीजिये ॥

सोरठा-अश्वमेध रचि राज, जान महाफल मुक्ति कर ।
करब स्वर्ग कर राज, इन्द्र करब बस आपने ॥

चोपाई

जानी तीन लोक के भूपा । तब पुनि कीन्हो वामन रूपा ॥
तौन रूप धरि गये पताला । जहँवाँ बलि राची यज्ञ शाला ॥
प्रतिहारै तब बात जनाई । है दुज ठाढ़ सुनौ बलिराई ॥
महा पंडित मुख वेद उच्चार । आज्ञा कहा सो कहौ भुवारा ॥

( २८ )

ज्ञानसागर

सुनतहिं बलि अब धरे उपाऊ । अर्घ पाबडे कीन्ह बनाऊ ॥
नमस्कार कर पूछी बाता । आज्ञा कहा सुनौ तुम दाता ॥
माँगौं सो मोहि दीजै राऊ । दानी सुन आएऊ तोहि ठाऊ ॥
मोहि देव माँगौं जो स्वामी । महा पंडित तुम अन्तर्यामी ॥

छन्द

परनकुटी छावन चहैं महि देव तुम बलिराई हो ।
पग तीन माँगौं नापतै जायैं होय अटाव हो ॥
सुनि विहँसे बलिराय तबही अहो विप्र माँगौं कहा ।
हीरा रत्न मानिक पदार्थ छांड महिमें क्या रहा ॥
सोरठा-माँगौं थोरा दान, यही रुचि मोहि सुन नृपति ।
प्रथम वचन परमान, तृष्णा स्वारथ निधि कहौ ॥

चोपाई

शुक्र मंत्रि सुन शीश डुलावा । हे नृप दान मोहि नहिं भावा ॥
राजा सुनत कोथ तब कीन्हा । बृद्धि बोल मन्त्री मतिहीना ॥
लीन्हा नृपति हाथ कुशपानी । कीन्ह संकल्प मही दियो दानी ॥
मानहु विप्र वचन परवाना । लेव तहां जहँवौं मन माना ॥
तीनौं पुर तीनौं पग कीन्हा । प्रगटे हरि तब सबहिन चीन्हा ॥
देव पूरा नृप आधा पाऊँ । नातर जाय पुण्य परभाऊ ॥
लेव नापि प्रभु पीठ हमारी । तातैं विष्णु वाक्य मैं हारी ॥

छन्द

नाप दीन्ही पीठ अपनी बलि नृपति बड़ राइ हो ।
वाचा व्रत में बांधि राख्यो लक्षमता पैठाय हो ॥
विश्वास दीन्हा मुक्ति कौ भरमाई राख्यो तेहि हो ।
यही भांति प्रपंच कीन्ह्यो तपी सिद्ध सबहि हो ॥
सोरठा-बूझो सन्त मुजान, हरि दीन्हा जस मुक्ति फल ।
पछतइहो अन्त निदान, एक नाम जाने विना ॥