कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
मायाका विष्णुको सर्व प्रथम बनाना
( ४२ )
अनुरागसागर
पुनि वहि मास लीन्ह धमराई । पुरुष प्रताप सु बाहर आई ॥
सो अछंगीहि असछल कीन्ह । गोइसि पुरुष प्रगटयम कीन्ह ॥
पुरुष भेद नहि सुनन बतावा । कालनिरञ्जन ध्यान करावा ॥
यह कस चरित कीन्ह अछंगी । ताजा पुरुष भइकाल किसंगी ॥
सद्गुरु वचन
धर्म सुनहु जन नारि सुभाऊ । अब तुहि प्रगटवरणिसमझाऊ ॥
होय पुत्री जेहि घर माहीं । अनेक जतन परितोषै ताहीं ॥
वन्न भक्ष सुख सेज निवासा । घरबाहर सब तिहि विश्वासा ॥
यज्ञ कराय देय पितु माता । बिदाकीन्हहितप्रीतिसों ताता ॥
गयी सुता जब स्वामी गेहा । रात्या तासु संग गुण नेहा ॥
माता पिता सबै बिसरावा । धर्मदास अस नारि स्वभावा ॥
ताते अद्या भई बिगानी । काल अंग है रही भवानी ॥
ताते पुरुष प्रगटने लायी । कालरूप विष्णुहि दिखलायी ॥
धर्मदासवचन कबीर प्रति
हे साहब यह जान्यो भेदा । अब आगेका करहु उछेदा ॥
कबीर वचन धर्मदास प्रति
पुनि माता कहि विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निजबारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु अशीशा । सब देवनमें तुमहीं ईशा ॥
जो इच्छा तुम चितमें धरिहौं । सो तब तोर काज मैं करिहौं ॥
मायाका विष्णुको सर्वप्रधान बनाना
प्रथम पुत्रब्रह्म दुरि गयऊ । अकरमझूठिताहि प्रिय भयऊ ॥
देवन श्रेष्ठ तुमहि कहैं मातहि । तुम्हारी पूजा सब कोई ठानहि ॥
कबीरवचन धर्मदासप्रति
कृपा वचन अस माते भाखा । सबते श्रेष्ठ विणुकह राखा ॥
माता गयी रुद्रके पास । देख रुद्र अति भये हुलासा ॥