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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना

बोधसागर

( ४५ )

जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥
वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥
वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥
नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥
जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥
गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥
दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥
हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥
बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥
पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥
कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥
कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥

राजा वचन

धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥
सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥
कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥
जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥
कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥

सतगुरु वचन

तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥
सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥
गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥
जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥
यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥
अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥