कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय
( ४० )
जगजीवनबोध
सतगुरु वचन
तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥
जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥
गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥
साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान ।
चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥
राजा--वचन चौपाई
राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥
महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥
सतगुरु वचन
तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥
असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥
जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥
विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥
रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥
युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥
युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥
जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥
लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥
गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥
पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥
राजा वचन
राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥
लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥
कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥
बोधसागर
( ४१ )
कौन वस्तु कहाँ लै आवै । काह भेट गुरु आगे धरावै ॥
लोकलोक गुरु कहो समझायी । कहौ हंस कहैं जाय समायी ॥
कैसे पावै लोक निवासा । कौन कौन घर करिहै वासा ॥
सतगुरु बचन
तब सतगुरु अस बचन उचारा । शिष्य होय सौपूँ भंडारा ॥
शिष्य होय सँवारे देही । लोक द्वीपकी गम्य तब लेही ॥
शिष्य होय गुरुवश करलीजै । तन मन धनही नथर कीजै ॥
जो कछु आपन भक्ति करावै । पान पान सँग लोक पहुँचावै ॥
ताकी देह बनत है भाई । तामें हंस तब जाय समाई ॥
जोइ वस्तु ध्यानमाँहि चढावै । सोई हंसा सत्यलोक पहुँचावै ॥
ताका नाम रेवती भाई । विना शिष्य कोइ पावै नाई ॥
तन मन धनको नेह न आवै । तब जिव लगन जैसुनी पावै ॥
तब राजा मन हरष अपारी । करहु शिष्य जाऊँ बलिहारी ॥
कुँवर बचन
कुँवर कहै विलम्ब किमि साहूँ । दया करो हो शीस उताहूँ ॥
रानी बचन
रानी मनमें हर्ष अनन्दा । मानों ऊगे कोटिक चन्दा ॥
तन मनसे करिहौं गुरु सेवा । हमको शिष्य करहु गुरु देवा ॥
अन्तर बात सब देहु बनायी । जैसे सीप मोती कूँ भायी ॥
सतगुरु बचन
करनी कठिन सत्य करिजानो । कहनि करनि बहुभेद बखानो ॥
कठिन करनी टले जो भाई । ताकर जीव बहुत दुख पाई ॥
शिष्य होय जब कौल बँधावे । तन मन धन सब आनि चढावे ॥
किये कौल निबाहे पूरा । करे गुरुसेवा शिष्य सोइ शूरा ॥
पूरा होय के शूर कहावे । सतगुरु बचन सदा लौलावे ॥
१ भाव ।
( ४२ )
जगजीवनबोध
करी कौल निर्बाहे नाहीं । ऐसो शिष्य सो यम मुख जाहीं ॥
तन मन चढावे वही सुख पावे । आखिर धन यौवन बहि जावे ॥
कौल करे सो जाल भुलाई । अँटके भव में नाहिं सहाई ॥
किया कौल टालि जो देई । बहु दुख संकट माथे लेई ॥
होय दुखी दुख देह समावै । ताकी देह रोग है आवै ॥
गुरु को दोष देहु जन कोई । आज्ञा मेटे सजा तेहि होई ॥
सो जिव कदी न उतरे पारा । करन द्वेष जो गुरु से धारा ॥
अन धन ताकहैं चहिये भाई । जापर सतगुरु होहि सहाई ॥
कर्म सतगुरु दया कटावे । साहब ध्यान सो फल यह पावे ॥
गुरु छोडि जो कर्म करावे । उन मनमें जो लीन रहावे ॥
सो नहिं पावै वस्तु अपारा । मनमें देखहु करहु विचारा ॥
सहज भक्ति करो तुम भाई । होय शिष्य नहिं डर कछु ताई ॥
सहज भक्ति राजा तुम करहु । शिष्य होइ भक्ति पद तरहु ॥
सहज भक्ति सबही सुखदाई । कठिन कमाई दुस्तर भाई ॥
कठिन कमाई खाँडेकी धारा । सहज भक्तिसे उतरो पारा ॥
सदा सुखारि भक्ति रस पीजै । मूली ऊपर घर नहिं कीजै ॥
राजा वचन
सब कर्म कठिन सहज कर जानू । तन मन धन कर लोभ न आनू ॥
हमको सीख अब देउ गुसाई । कौल कहैं सो चूंकू नाई ॥
जो कहैं चूकि कौल हम जावै । अपनी करनी हम भरि पावै ॥
कौल चुके सो मूँढ गवारा । विनु स्वारथ जग होवे ख्वारा ॥
रंकके हाथ रतन जो आवे । कौडी बदले काह गवाँवे ॥
अब सतगुरु दाया मोहि कीजै । चूके कौलका फलहि कहीजै ॥
फिर कैसे सो सुख पावे । कैसे वह फिर कौलमें आवे ॥
कैसे निर्धन धनै बहोरे । कैसे रोगी रोग सो छोरे ॥
अब करु शिष्य शब्द मुहिदीजै । नहिं तो देह त्याग हम कीजै ॥