कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
शिवकी समाधि छुड़ानेके लिये कामदेवका प्रयत्न करना और नारदका कामवश होना तथा विष्णुको शाप देना
( ३४ )
ज्ञानसागर
साखी-शिव समाधि छूटै नहीं, कीन्हौ विष्णु उपाय ॥
काम भाग परंपंच कर, संगहि दीन्ह छिपाय ॥
चौपाई
सर समीर लागौ जब अंगा । बाल वृद्ध व्यापौ सब संगा ॥
बार बार सब जग बस भयऊ । ऋषिमुनिव्याप्तिकाम जो ठयऊ ॥
नारद ऋषि पारासर दोऊ । भये काम बस मुनिवर सोऊ ॥
तिन कुल व्यासदेव उतपानी । इनहू रति जो बरबस ठानी ॥
पारासर गए सागर तीरा । देख नारि मन धरहि न धीरा ॥
मछोदरी जा कहैं जग कहैं । व्यास देवकी जबनी अहैं ॥
नारद ऋषि किय तहां तिमाना । राजा एक स्वयम्बर ठाना ॥
ता कुल कन्या है कुलवंती । निश्चय व्याह करो जिहि संती ॥
चल ऋषि हरिमों बिन्ती कीन्हा । ब्रह्मा पुत्र कहि वचन अधीना ॥
हे स्वामी मोहि दीजे रूपा । करिहौ व्याह मोहि रुचि भूपा ॥
विष्णु अपन मन कीन्ह विचारा । कर परंपंच ऋषि सब झारा ॥
साखी-शिव की नारि बनाऊं, सोई करब उपाय ॥
भयो काम बस नारद, वैर देव मम भाय ॥
चौपाई
नहिं जाने नारद मतिहीना । वानरकर मुख ऋषिकर दीन्हा ॥
चलो ऋषी मन भयो अनंदा । कृपा कीन्ह मोहि बालगुविन्दा ॥
अवशि जाय हम व्याहैं नारी । जहैं पुनि पहुँचे तहां कुँवारी ॥
दर्पन दीन्हों सभा मैझारी । ऋषि अपनो प्रतिबिंब निहारी ॥
देखन ऋषि क्रोध तब कीन्हा । विष्णु भाव कबहुँ नहिं चीन्हा ॥
जब हरि बिहँसे नारद पाहीं । सती यज्ञ तुम बूझव नाहीं ॥
परबस देखत मैं तन जारा । अब मैं कीन्हा भाव तुम्हारा ॥
साखी-बूझ परचो नारद जबै, गहे विष्णु के पांय ॥
क्षमा करो अपराध प्रभु, नर कौ रूप बनाय ॥