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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

कबीर साहबका परलोकके मार्गका वृत्तान्त राजासे कहना

(११४)

बीरसिंह बोध

सत्य कहूँ सुनु धर्मदासा । विनु बीरा पावै यम फांसा ॥
बीरा पाय राय भय भागा । सत्य ज्ञान हृदयमें जागा ॥
काल जाल तब सबै पराना । जब राजा पायो परवाना ॥
गद्गद् कंठ हरष मन बाढा । विनती करै राजा होय ठाढा ॥
प्रेमाश्रु दोइ नयन ढरावै । प्रेम अधिकता वचन न आवै ॥

राजा बीरसिंहका स्तुति करना

करुणारमन सद्वरु अभय मुक्तिधामी नाम हो ॥
पुलकि सादर प्रेम वश होय सुधरे सो जीवन काम हो ॥
भवसिन्धु अति विकराल दारुण तासु तत्त्व बुझायऊ ॥
अजर बीरा नाम दै मोहि पुरुष दरश करायऊ ॥
सोरठा-राय चरण गहे धाय, चलिये वहि लोकको ॥
जहवाँ हंस रहाय, जरा मरण जेहि घर नहीं ॥

कबीर वचन

आदि अन्त जब नहीं निवासा । तब नहिँ दूसर हते अवासा ॥
तौन नाम राजा कहँ दीना । सकल जीव आपन करि लीना ॥
रायं श्रवण जब नाम सुनायी । तब प्रतीति राया जिव आयी ॥
सत्यपुरुष सत्य है फूला । सत्य शब्द है जीवको मूला ॥
सत्य द्वीप सत्य है लोका । नहीं शोक जहाँ सदा अशोका ॥
सत्यनाम जीव जो पावै । सोई जीव तेहि लोक समावै ॥
ऐसो नाम सुहेला भाई । सुनतहिँ काल जाल नशि जाई ॥
सोई नाम राजा जो पाये । सत्य पुरुष दरशन चित लाये ॥
साखी-ऐसो नाम है खसमका, राय सुरति करि लीन ॥
दर्षित पहुँचे पुरुष घर, यमहिँ चुनौती दीन ॥

चौपाई

जब हंसा यम छेके आयी । चलत बेर निज मना सुनायी ॥
मंडल अखण्ड ब्रह्मण्डे बासा । नीर पवन हंस रहिवासा ॥

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥