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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

Devanagarihipublished2,136 pages

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बोधसागर

( ८३ )

इशकने अद्भमके वह तासीरकी ।
वह परीरू उस पैँ आशिक हो गयी ॥
देखकर एहवाल अद्भमका तबाह ।
चश्म नम गमसे हुई वह रश्केमाह ॥
गुजरी जो जो उसपैँ थी तकलीफ ओ दर्द ।
सुनके दुखतर होगयी दहशतसे जर्द ॥
देखकर अद्भमको यों पज मुद्दैं हाल ।
आया दिलमें उस परीरूके रुयाल ॥
मोरी खातिर इसने यह रंजो बला ।
लेके सरपर कर दिया जीको फिदा ॥
खीचकर क्या र अजीत औ बला ।
मिहनतो तकलीफो रंजै लादवा ॥
बाद मरनेके भी यह आशुफतः हाल ।
लाश मेरी कब्रसे लाया निकाल ॥
इसके बायस फिर खुदाने दी हयात ।
जीस्तका मेरी सबब है इसकी जात ॥
गर न होता मुझपैँ आशिक यह जवाँ ।
कब्रमेंसे क्यों यह फिर लाता यहाँ ॥
रुकके दम यकदममें मैं होती फना ।
जिस्म होता तमए मूरों मारका ॥
थी यह इसदुर्वैशकी तासीर इशक ।
मुर्दा जिन्दाहो है यह तदबीरइशक ॥
जीस्त दुनियाकी है बसख्वाबोरुयाल ।
इस जहाँकी इशक पर तु खाक डाल ॥
तालिबे दुनिया न हो अब जीनहार ।