कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
कबीर सागर कबीरपन्थ, विशेषकर धर्मदासी शाखा, का विशाल धार्मिक ग्रन्थ-समूह है, जो मुख्यतः कबीर साहब और उनके शिष्य धर्मदास के संवाद के रूप में है। इसमें अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ, जैसे ज्ञान सागर, अनुराग सागर और बोध सागर के विभिन्न बोध, ग्यारह भागों में संकलित हैं। यह कबीरपन्थ के सृष्टि-विचार, गुरु-परम्परा और साधना का मुख्य स्रोत है।
पहले भाग ज्ञान सागर के प्रकरणों से इसकी विषय-वस्तु का अनुमान होता है: मुक्ति-भेद और अमरलोक, सत्य पुरुष का वर्णन, सृष्टि की उत्पत्ति, द्वीपों का वर्णन, धर्मराय (निरञ्जन) का सत्य पुरुष की सेवा से द्वीप और मानसरोवर पाना, कामिनी को निगलना और शाप पाना, चौदह यमों के नाम और कर्म, ज्ञानी जी (कबीर) का पृथ्वी पर आना और धर्मराय से वचन लेना, जगन्नाथ की स्थापना का प्रसंग, तीन देवों और आदि माया की कथा, समुद्र-मन्थन, वेदों और चार खानियों की उत्पत्ति, और फिर बलि, सनक-सनन्दन तथा नारद के चरित्र।
यह सम्पूर्ण ग्यारह भागों का संस्करण खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई ने प्रकाशित किया है। २१३६ पृष्ठों में पूरा कबीर सागर एक साथ उपलब्ध होने से यह कबीरपन्थ के अध्येताओं के लिए एक सम्पूर्ण सन्दर्भ है।
बोधसागर
( ३३ )
राजा जगजीवन बचन
कौन देश तैं माली आया । फूल अन्नप कहाँसे लाया ॥
कौन बाग के फलन विशेषा । कानो सुनी न आँख न देखा ॥
माली बचन
नौ लखा बाग रहा होय आया । फल प्रसून सब नये बनाया ॥
सुनिके राजा हरषा भारी । संग उठी चली परजा सारी ॥
राजा बचन
कहु दिवान यह कौन प्रकारा । समझि बूझिके करो विचारा ॥
ज्योतिषी पण्डित सवैं बुलाये । पत्रा पोथी सबहीं लाये ॥
ज्योतिषी बचन
लगन सोधि सब ऐसी कही । कोइ पुरुष यहाँ आये सही ॥
है कोइ नर कै कोइ पखेहू । सोधो जाय बाग सब हेहू ॥
हेरे राय बागके माहीं । बैठे संत यक ध्यान लगाहीं ॥
राजा जाय धरा तब पाई । नगर भरेकी परजा आई ॥
कहे राजा धन मेरो भागा । दर्शन पाय अमर होय लागा ॥
आलसी घर गंगा आयी । मिटि गई गर्मी भयी शितलायी ॥
सतगुरु बचन
तब राजासों कही पुकारी । सुन राजा एक बात हमारी ॥
हम जनि भार चढाओ भाई । काहे को तुम देहु बड़ाई ॥
अच्छा बाग विमल हम चीन्हा । तासो आये आसन कीन्हा ॥
ऐसा तुमहीं बाग बनाया । नाना विध के रख लगाया ॥
आसन किया देखि हम ठारी । बहुत फूल फलकी अधिकारी ॥
राजा बचन
फिर कै राजा शीस नवाया । द्वादश वर्ष भये बाग सुखाया ॥
सूखा बाग भये बहु बारा । नहिं कोइ लोक आहे संसारा ॥
नं. ५ कबीरसागर - ३
सद्गुरुका राजाको गर्भका कौल याद दिलाना
( ३४ )
जगजीवनबोध
छाडी फल फूलनकी आसा । कोइ न आवै बागके पास । ॥
तुम समर्थ पग धारे आई । हरा हुआ बाग सब ठाई ॥
राजा कहै दया अब कीजै । मोकूँ मुक्तिदान फल दीजै ॥
मेरे मस्तक धरहू हाथा । मैं रहूँ सतगुरु तुम्हारे साथ । ॥
सतगुरु वचन
तुमको कौल भुलाना भाई । किया सो कौल गया बिसराई ॥
संकट गरभ में बाचा दीन्ह । बाहरनिकसि करमबहु कीन्ह ॥
किया कौल जब गये भुलाई । तब हम आइके चरित दिखाई ॥
बहु विधि बात कही चेताई । बाहर निकसि बुद्धि पलटाई ॥
तुमको तो कछु सूझत नाही । फन्दा मोहजाल के माहीं ॥
आवै यम दश द्वार मून्दी । तबहीं बांधि करेगा कून्दी ॥
सोच बूझ देख मन माहीं । इतने में तेरा कौन सहाहीं ॥
पिसुन मिलै सब वार न पारा । नरक बास में नाखन हारा ॥
बहु विधि तुमसों शब्द पुकारा । किया कौन नर भूल गवौरा ॥
घर घर हम सब कही पुकारी । कोइ न मानै कही हमारी ॥
हे राजा जब तू मातृगर्भमें था तब तू वचनवद्ध हुआ था कि भजनके अतिरिक्त अब और कुछ न करेगे । उस दुःखमें तो तू पुकारता था तथा हाय हाय करता था, कि मुझको इस दुःखसे निकालो । जब तू गर्भके बाहर आया तब तू अपनी प्रतिज्ञा भूल गया और शारीरिक कामना तथा पशुधर्मके वशीभूत होकर तूने कौन कौनसे कुकर्म न किये ? सत्यगुरुकी दयाको तू एकबारगी भूल गया, भोगविलासमें फँसकर अन्धा हो गया और मायाने तेरे ज्ञानको बिलकुल ही नष्ट कर दिया । जब यमदूत आवेगे और तेरी मुश्कें बांधकर नरक में लेजावेंगे तब तेरा कौन मित्र सहायता करेगा ? और तुझको उनसे कौन छुड़ावेगा ? राजा ! तू सोच तथा समझ कि, वे लोग जिन्हें तू अपना
राजाका सद्गुरुसे उद्धारकी विनती करना
बोधसागर
( ३५ )
मित्र समझता है उनमें से कौन तेरा उस समय सहायक होगा ?
कौन तुझको नरकसे बचावेगा ? गर्भमें मैंने तुझको बहुत सम-
झाया था सो हे गँवार ! तू उन सब बातोंको भूल गया मैंने
सबसे घर घर पुकार कर कहा मेरा कहना किसी मूर्खने न
माना । इतनी बात सुनकर राजा बोला ।
राजा बचन-चौपाई
अब तो गुरु होहु सहाई । मोकों यमसे लेहु छुड़ाई ॥
सबही करम बरुसकै दीजे । हूबत मोहि उबारके लीजे ॥
सैन करी पालकी मँगाई । लै सद्गुरु को माहिं बिठाई ॥
पाँव उधार काँध धर लीन्हा । तबही महल पयाना कीन्हा ॥
सद्गुरु पग धर महलके माहीं । सब रानिनको राय बुलाहीं ॥
समरथ दर्शन दीन्हा आनी । धनधन भाग्य तुम्हारो रानी ॥
सद्गुरु को पलँगा बैठाई । सब मिलि पाँव पखारो आई ॥
राजा भाखे शीश नवाई । मोकों राखो गुरु शरनाई ॥
करिये सद्गुरु जीवको काजा । दया करो मैं लाऊँ साजा ॥
अब हम शरना लेब तुम्हारी । दया करो तन दुखत हमारी ॥
सतगुरु बचन
तब कहे सतगुरु लेहु सँभारी । राजा सुनहु बात हमारी ॥
कस चले राजा लोक हमारे । मैं नहिं देखूँ लगन तुम्हारे ॥
कोटिन ज्ञान कथे असरारा । बिना लगन नहिं जीव उबारा ॥
जो कोई बूझे भक्ति हमारी । ताको चहिये लगन सँचारी ॥
जैसे लगन चकोरकी होई । चन्द्र सनेह अँगार चुगोई ॥
ऐसे लगन गुरुसे होई । धर्मराय शिर पग धर सोई ॥
तुम तो हो मोटे महाराजा । कैसे छोड़िहौ कुल मर्यादा ॥
कैसे छोड़िहौ मान बड़ाई । कैसे छोड़िहौ मुख चतुराई ॥
कैसे छोड़िहौ हाथी असवारा । कैसे छोड़िहौ अंथ भँडारा ॥
सद्गुरुका राजाको आरती करनेका उपदेश देना
( ३६ )
जगजीवनबोध
कैसे छोड़िहौ काम तरंगा । कैसे राजसे करो मन भंगा ॥
कैसे छोड़िहौ कनक जवाहिरा । कैसे छोड़िहौ कुल परिवारा ॥
तुम तो उनकी बांधी आसा । हम तो राजा कथैं निरासा ॥
जो तुम तजु अन्तरकी बाथा । तबहीं चलो हमारे साथा ॥
भक्ति कठिन करी ना जाई । काहे को हिंस करत हो राई ॥
राजा वचन
राजा कहे दोऊ कर जोरी । सुनिये समरथ बिनती मोरी ॥
नगरके सब षट् बरन बुलाऊं । यहि अवसर सब माल लुटाऊं ॥
तुम तो कह्यो बाहर लेव वासा । मैं तो देहकी छोड़ों आसा ॥
अमृत वचन पियाओ आनी । हंस उबार करो निरबानी ॥
नगर कोटकी छोड़ी आसा । निश दिन रहूं तुम्हारे पास ॥
हुकुम करो सोई मैं लाऊं । करो दया मैं शीस नवाऊं ॥
उमँग उठे हर्षित मन मोरा । थकित भये जनु चन्द्र चकोरा ॥
सूखा बाग जो फल परकाशा । तबते पूजी मनकी आशा ॥
कसनी कसो सो सहुँ शरीरा । तबहुँ प्रीत न छोड़ूँ तीरा ॥
जो तुम कहो सो भक्ति कराऊँ । दया करो तो शीश चढाऊँ ॥
सतगुरु वचन
तब समरथ अस शब्द उचारा । अब आरति का करो विस्तारा ॥
चार गुरुको चौक पुराओ । तिनका तोरायके जल अरपाओ ॥
राजा गर्भ निवारौं तोरा । भाव भक्तिसे करो निहोरा ॥
भाव भक्ति हम चाहें राजा । धन सम्पत्तिसे न कछु काजा ॥
राजा वचन
दया करो सो साज मँगाऊँ । कौन वस्तु ले आगे आऊँ ॥
मैं हूँ जीव मतीका भोरा । कहैं जानूँ चौका के व्योरा ॥
समरथ कहौ मैं आनूँ सोही । चौका जुगति बताओ मोही ॥
करहु गुरु चौका विस्तारी । जीवहि यमसों लेहु उबारी ॥
राजाका पहलेके हंसोंका हाल पूछना और सद्गुरुका उत्तर देना
बोधसागर
( ३७ )
सतगुरु वचन
चार गुरु को साज मँगाओ । चार सवा सौ पान लै आओ॥
चार सवा सेर कन्द मँगाओ । आठ अंश नारियल लै आओ॥
चार माला अरु लोटा चारो । सतगुरु आगे लाकर धारो ॥
चार थाली चार गादी कीजे । चार चँदोवा ताने लीजे ॥
चार कलस जल भरि धरवाओ । तब सतगुरुके आगे आओ ॥
सब यह साज आगे धरि दीन्हा । तब सतगुरुसे विन्ती कीन्हा ॥
राजा वचन
मैं हूँ जीव करम बहु कीना । कैसे यमसों करिहो भीना ॥
गिनत गिनत नहिं आवे चीना । बारम्बार मैं औगुन कीना ॥
ऐसा करम किया मैं भारी । कैसे यमसे लेहो उबारी ॥
एक बात गुरु कहौ विचारी । मोसम पतित आगे कोइ तारी॥
तब सतगुरु बहुत विहँसाने । फिर राजासों निरणय ठाने ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु सत्यसुकृत मम नाऊँ । जाइ मथुरामें धारेउँ पाऊँ ॥
खेमसरी ग्वालिनी उबारी । बहुत जीव लै लोक सिधारी ॥
द्वादश पहुँचे पुरुष हजुरी । और हंस द्रौपन मँझुरी ॥
त्रेता युगे मुनिन्दर नाऊँ । नगर अयोध्या धारे पाऊँ ॥
हंस बयालिस लीन्हा लारा । पहुँचे तहाँ पुरुष दरबारा ॥
और हंस द्रौप महाँ गयऊँ । जिन जैसी जिव देह बनयऊँ ॥
अब द्वापरका कहुँ विचारा । नरहर राजका किया उधारा ॥
सात सौ हंस पावन कीन्हा । कुटुम्ब सहित पयाना दीन्हा ॥
चन्द्रविजय घर इन्दुमति नारी । संकट राजा लीन उबारी ॥
केता पूछो जीव सनेही । गिनत गिनत ना आवे छेही ॥
युगन युगन भवसागर आऊँ । जो समझे तेहि लोक पठाऊँ ॥
( ३८ )
जगजीवनबोध
शब्द हमारा मानै कोई । तौ नहिं जाय यमपुरी सोई ॥
इतनी बात कही समझायी । दिल राजाके प्रतीति समायी ॥
राजा वचन
धन्य भाग मेरा कुल कर्मा । कोटित यज्ञ कियो तप धर्मा ॥
सत्यगुरु आयदरस मोहि दीन्हा । बूझत हंस उबार कै लीन्हा ॥
हो प्रभु मोर करो निवैरा । मै तो चरण कमलका चेरा ॥
कहु सन्देश नगर में भाई । जय जीवन राय लोकको जाई ॥
नेगी जोगी सबहि बुलायी । और नगरकी परजा आई ॥
चन्दनका सिंहासन कीन्हा । चौका पूरि कलश धरि दीना ॥
सतगुरु शब्द उचारे लीना । युक्ति साजि गादी पगु दीना ॥
सब रानिनको बेगि बुलायी । करि दण्डवत् गुरुचरणा आयी ॥
जीव प्रति नरियल ले आये । सो सतगुरु को आनि चढ़ाये ॥
सारखी-सब रानी बिन्ती करें, सुनु समरथ चित लाय ।
महा अकरमी जीव हम, सबहि लेहु सुकताय ॥
चौपाई
जेठी रानी चन्द्रमति जोई । सतगुरुकी गति जानी सोई ॥
दूजी रानी है मनकी युक्ती । निर्भय होय करै गुरु भक्ती ॥
तीजी रानी है मनपोई । लज्या कारण ना मानै कोई ॥
चौथी रानी भानुमति आही । जीवत सती सुजानो ताही ॥
पांचवीं रानी धन्ना बाई । कलावंत होय आगे आई ॥
छठवीं रानी प्राणप्यारी । पूजे सन्त वह लाज निवारी ॥
सतई रानी है सत मामा । निर्भय होय जपै गुरु नामा ॥
अठवीं आनन्दकला है रानी । सतगुरुसों प्रीति निज ठानी ॥
नौवीं रानी नामपियारी । भक्तिवंत जाने संसारी ॥
दशवीं रानी है दिल दायक । सब रानीकी सो है नायक ॥
ग्यारहवीं रानी है रंगरोपा । ताके कारन राव नहिं लोपा ॥
राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद्गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका हठ करना पीछे शरणमें आना
बोधसागर
( ३९ )
बारहवीं रानी सूरजमती । हंस रूप है ताकी गती ॥
द्वादश रानी सब बनि आयी । एक अंग होय सब भक्ति करायी ॥
राजा छडीदार पठवाई । तो वो कुँवरको लाय बुलाई ॥
छडीदार बचन
छडीदार कहै कर जोरी । राजकुँवर सुनु विन्ती मोरी ॥
राजा रानि गुरु चरणै आये । ताते तुमको बेगि बुलाये ॥
गरभवाससों करै निरुवारा । तुरत चलो जनि लावो बारा ॥
कुँवर बचन
तुम छडीदार कहो बात विचारी । कैसा गुरु है सो अधिकारी ॥
छडीदार बचन
हम मति हीन कछु नहि जाना । निश्चय आही पुरुष पुराना ॥
यह सुपने नाहीं कहुँ देखा । सुर मुनि नारद शारद पेखा ॥
कुँवर बचन
कुँवर बीनती कीन सुहाती । सुनतैं बात जुडानी छाती ॥
हंस रूप चारों हैं भाई । उमंग हरष हिये नाहि समाई ॥
जहाँ सतगुरु आसन कीन्हा । कुँवर चार आइ दर्शन लीन्हा ॥
बडा कुँवर वह सूरजभाना । गुरु स्वरूप हृदय में आना ॥
दूजा कुँवर इन्द्रमन दासा । शब्दै पीवै शब्दकी आसा ॥
तीजै कहिये चतुर्भुज कुमारा । शब्द सुनत वह सीस उतारा ॥
चौथा कुँवर विक्रम दासा । जिन तन मनकी छोडी आसा ॥
चारों कुँवर धरे गुरु पाई । तन मन धन सब प्रीति चढाई ॥
कदलौ केर पतवार धरायी । गज मुक्ताहल चौक पुरायी ॥
नरियल मोरि के मालूम कीन्हा । लिखि परवाना सबकूँ दीन्हा ॥
इतने हंस भये मन भावन । तिनको सतगुरु कीन्हा पावन ॥
तन मन धन सो बदला कीन्हा । शिरके साँट साहबको चीन्हा ॥
करी निछावर मेटे गर्भफेरा । अब तो भई भगतिकी वेरा ॥
कुकर्मी जीवके उद्धारका उपाय
( ४० )
जगजीवनबोध
सतगुरु वचन
तुमरी राय भली बनि आही । तुम गरभवासकीकौल निबाही॥
जोई कौल गरभका पालै । ताको सतगुरु होहि दयालै ॥
गरभ कौल कोई चूके भाई । असंख्य जन्म चौरासी जाई ॥
साखी-गरभ कौल चूके नहीं, वोही हंस सुजान ।
चौरासी भरमें नहीं, सो पहुँचे यहि परमान ॥
राजा--वचन चौपाई
राजा कहै दोऊ कर जोरी । सुनु समरथ यह विन्ती मोरी॥
महाकुर्मी जो होय प्रानी । करमनसे कैसे होय छुटानी ॥
सतगुरु वचन
तब समरथ गुरु शब्द उचारा । करमन काटि कहैं निरवारा ॥
असंख्यजन्म कर्म किय आयी । पान पान में करम कटायी ॥
जो जिव कर्म करै निरवारा । पाख पाख में कर्म सुधारा ॥
विना पान नहि कर्म कटाई । कोटिन ज्ञान करै जो भाई ॥
रेखा गुंज विचारै जानी । विना गुंज करै जिव हानी ॥
युग छत्र सो हंस उबारा । छत्र मुनी से उतरे पारा ॥
युग बन्धन ते शिष्य करीजै । असंख्यजन्मका कर्म जो छीजै॥
जैसा जीव तैसा होय पाना । सबही करम होय छय माना ॥
लगन जैमुनि आवै हाथा । धर्मराय तेहि नावै माथा ॥
गुरुशिष्य युक्ति एकजो आवै । पारसपान छत्र मुनि पावै ॥
पान एकोतर लैहैं जोई । असंख्य जन्मका कर्म नशाई ॥
राजा वचन
राजा सतगुरु विनती लायी । लगन जैमुनि देहु बतायी ॥
लगन जैमुनी कैसे पावै । कैसे सतगुरु सों लौ लावै ॥
कौन जुगति चरनामृत लेही । कैसे करै जो बने विदेही ॥
बोधसागर
( ४१ )
कौन वस्तु कहाँ लै आवै । काह भेट गुरु आगे धरावै ॥
लोकलोक गुरु कहो समझायी । कहौ हंस कहैं जाय समायी ॥
कैसे पावै लोक निवासा । कौन कौन घर करिहै वासा ॥
सतगुरु बचन
तब सतगुरु अस बचन उचारा । शिष्य होय सौपूँ भंडारा ॥
शिष्य होय सँवारे देही । लोक द्वीपकी गम्य तब लेही ॥
शिष्य होय गुरुवश करलीजै । तन मन धनही नथर कीजै ॥
जो कछु आपन भक्ति करावै । पान पान सँग लोक पहुँचावै ॥
ताकी देह बनत है भाई । तामें हंस तब जाय समाई ॥
जोइ वस्तु ध्यानमाँहि चढावै । सोई हंसा सत्यलोक पहुँचावै ॥
ताका नाम रेवती भाई । विना शिष्य कोइ पावै नाई ॥
तन मन धनको नेह न आवै । तब जिव लगन जैसुनी पावै ॥
तब राजा मन हरष अपारी । करहु शिष्य जाऊँ बलिहारी ॥
कुँवर बचन
कुँवर कहै विलम्ब किमि साहूँ । दया करो हो शीस उताहूँ ॥
रानी बचन
रानी मनमें हर्ष अनन्दा । मानों ऊगे कोटिक चन्दा ॥
तन मनसे करिहौं गुरु सेवा । हमको शिष्य करहु गुरु देवा ॥
अन्तर बात सब देहु बनायी । जैसे सीप मोती कूँ भायी ॥
सतगुरु बचन
करनी कठिन सत्य करिजानो । कहनि करनि बहुभेद बखानो ॥
कठिन करनी टले जो भाई । ताकर जीव बहुत दुख पाई ॥
शिष्य होय जब कौल बँधावे । तन मन धन सब आनि चढावे ॥
किये कौल निबाहे पूरा । करे गुरुसेवा शिष्य सोइ शूरा ॥
पूरा होय के शूर कहावे । सतगुरु बचन सदा लौलावे ॥
१ भाव ।
( ४२ )
जगजीवनबोध
करी कौल निर्बाहे नाहीं । ऐसो शिष्य सो यम मुख जाहीं ॥
तन मन चढावे वही सुख पावे । आखिर धन यौवन बहि जावे ॥
कौल करे सो जाल भुलाई । अँटके भव में नाहिं सहाई ॥
किया कौल टालि जो देई । बहु दुख संकट माथे लेई ॥
होय दुखी दुख देह समावै । ताकी देह रोग है आवै ॥
गुरु को दोष देहु जन कोई । आज्ञा मेटे सजा तेहि होई ॥
सो जिव कदी न उतरे पारा । करन द्वेष जो गुरु से धारा ॥
अन धन ताकहैं चहिये भाई । जापर सतगुरु होहि सहाई ॥
कर्म सतगुरु दया कटावे । साहब ध्यान सो फल यह पावे ॥
गुरु छोडि जो कर्म करावे । उन मनमें जो लीन रहावे ॥
सो नहिं पावै वस्तु अपारा । मनमें देखहु करहु विचारा ॥
सहज भक्ति करो तुम भाई । होय शिष्य नहिं डर कछु ताई ॥
सहज भक्ति राजा तुम करहु । शिष्य होइ भक्ति पद तरहु ॥
सहज भक्ति सबही सुखदाई । कठिन कमाई दुस्तर भाई ॥
कठिन कमाई खाँडेकी धारा । सहज भक्तिसे उतरो पारा ॥
सदा सुखारि भक्ति रस पीजै । मूली ऊपर घर नहिं कीजै ॥
राजा वचन
सब कर्म कठिन सहज कर जानू । तन मन धन कर लोभ न आनू ॥
हमको सीख अब देउ गुसाई । कौल कहैं सो चूंकू नाई ॥
जो कहैं चूकि कौल हम जावै । अपनी करनी हम भरि पावै ॥
कौल चुके सो मूँढ गवारा । विनु स्वारथ जग होवे ख्वारा ॥
रंकके हाथ रतन जो आवे । कौडी बदले काह गवाँवे ॥
अब सतगुरु दाया मोहि कीजै । चूके कौलका फलहि कहीजै ॥
फिर कैसे सो सुख पावे । कैसे वह फिर कौलमें आवे ॥
कैसे निर्धन धनै बहोरे । कैसे रोगी रोग सो छोरे ॥
अब करु शिष्य शब्द मुहिदीजै । नहिं तो देह त्याग हम कीजै ॥
आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवोंका पान लेना
बोधसागर
( ४३ )
साखी-चरण वन्दुँ कर जोरिके, सतगुरु सुनो पुकार ।
लगत जैसुनि जब मिले, तबही करब अहार ॥
सतगुरु वचन-चौपाई
ऐसे कष्ट करो मत भाई । करो विचार मैं कहूँ सुनाई ॥
करो आरती साज मँगाओ । लेई पान परम सुख पाओ ॥
प्रथम सिंहासन लाइ बिछाओ । सर्वजीव एकसुरति होय आओ॥
सवा सै पान जीव प्रति लाओ । सवा सेर महाकन्द मँगाओ ॥
कपडा बस्तर धातु धराओ । ताँबा पीतल बर्तन लाओ ॥
सोना रूपा मोती हीरा । लाल जवाहिर बने सो चीरा॥
जैसो साज जोई लैं आवै । तैसो हँसा देह बनावै ॥
इतनी साज नहीं बनि आवै । ताके हेतु यह गौ ठहरावै ॥
गौ नाम पृथ्वी का होई । पृथ्वी नाम यह देह संजार्ई ॥
सोधन चले अग्रकी धारा । अगर वास तहैं होय अपारा ॥
पान संग सो देउँ पहुँचायी । लोक जात सो बार न आयी ॥
जब सतगुरु आज्ञा फरमायी । तब राजा सब साज मँगायी॥
सब ही राज जब आनि धरावा । तब सतगुरुको तरुत बिठावा ॥
जुगति साजि चरणामृत लीन्हा । तन मन धन अर्पण करदीना ॥
पुनि सतगुरु पान सो लीना । जैसो जीव तैसो तेहि दीना ॥
पाइ पान सबही चित दीना । होय अधीन सत्य सुख लीना॥
तब सतगुरु यक वचन उचारा । सबहीको कह्यो करन विचारा ॥
सतगुरु वचन
सुनु राजा यक कहूँ विचारा । मानो राजा कहा हमारा ॥
जो वस्तु तुम हम सो पाओ । रखो चेत नहि अनत गँवाओ ॥
जुगाओ शब्दै करो कमाई । हट करि रखो नहि देहु गवाई॥
सेवा करत सुरति चलि जायी । तबहि कालघर बजे बधायी ॥
जे जिव शब्द सुरति पर चाले । सबही विधि सो होय निहाले ॥
तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न भिन्न लोककी प्राप्ति
( ४४ )
जगजीवनबोध
सारखी-शिष्य होय तनै छिपाइ, ताका कहूँ विचार ।
कहै कबीर निर्भय नहीं, निश्चय यमके द्वार ॥
राजा वचन-चौपाई
राजा कहै सुनो गुरु मोरा । मैं लागत हूँ चरने तोरा ॥
सहस्र अठासी लोक बताओ । भिन्न भिन्न कै मोहि बुझाओ ॥
कौन हंस कहँ करै बसेरा । सब ही हंस कर कहँ २ डेरा ॥
उत्तर समरथ कहो बुझायी । यह सन्देह उठा मन आयी ॥
खेमसरी को कहा संदेशा । द्वादश हंस उन सँग उपदेशा ॥
चारों युगका कहा संदेशा । बहुते हंस बतायो भेशा ॥
बहुते जीवहि बोध बताये । तन छूटे सब कहाँ समाये ॥
बहुत हंस पहुँचे निज ठाई । तिनकर पता कह्यो समझाई ॥
और हंस कहाँको गयऊ । ताका बहुत संदेहा ठयऊ ॥
सतगुरु वचन
हे राजा तोहि कहि समझाऊँ । भिन्न २ कै वरनि बताऊँ ॥
जे जे जीव परवाना पावैं । सो सो जीव सत्यलोक सिधवैं ॥
परवाना की यहि अधिकाई । हंस विगोय ना कबहुँ जाई ॥
जो हंसा नहि देह बनावै । सो सब मानसरोवर जावै ॥
मान सरोवर दीप अमाना । होइ है चार भानु परमाना ॥
परवाना की यह अधिकाई । योनि गरभ बहुरि नहि आई ॥
ताते ताहि वृत्तान्त बतायी । सकल कामना तोर मिटायी ॥
सत्य सत्य सबको समझायी । जब गुरुको चरणामृत पायी ॥
जो कछु करै सुकृत कमाई । सो सब पान पर देहि चढाई ॥
हेत द्वीपमें पहुँचे जाई । तब ही हंसा देह बसाई ॥
ऐसी विधि जो पान चढावै । निज स्वरूप जीव सो पावै ॥
तापर हंस होय असवारा । पचासी पवन परे सरदारा ॥
राजाका सद्गुरुसे लोक लेजानेको विनती करना
बोधसागर
( ४५ )
जो ऐसी नाहीं बनि आवै । ताके पान संग वृषभ चढावै ॥
वृषभ चढावे पावे सोई । पढुप दीप रूप बहु होई ॥
वृषभ नाम नील है भाई । उनकी शोभा बहुतहिं पाई ॥
नाम नील वरन है स्वेता । ताको रूप कहा कहु केता ॥
जो वृषभ नहीं बनि आवै । तो लै गौ सो देह बनावै ॥
गौ देह सो पान जो पावे । मंजुल करि वह हंस रहावे ॥
दश हजार सुर झलके देही । पहुँचे हंसा होय विदेही ॥
हीरा मोती लाल जवहिरा । पान चढे पुनि देह उजिहिरा ॥
बस्तर दे पुनि पान चढावे । ज्ञान दीपमें लै पहुँचावे ॥
पांच सौ सूर्य समान सरूपा । परसत तहाँ सो होय अनूपा ॥
कंचन रूपा धातु चढावै । तैसो शोभा देहमें पावै ॥
कहुँ पुकार करो निवैरा । देह विना कहँ करै बसेरा ॥
राजा वचन
धरे राम सतगुरुको पाऊ । हो सतगुरु तुम हंस मुकताऊ ॥
सत्यगुरु मैं तुव बलि जाऊ । सर्व भेद तुम मोहिं बताऊ ॥
कछु न मोसे राखु दुराई । देत हौं तुमको पुरुष दुहाई ॥
जो तुम कहौं करौं मैं सोई । तुमसो दिल पतियाना मोई ॥
कृपा करो मैं प्रीति लगाऊँ । कसनी देहु सो सकल सहाऊँ ॥
सतगुरु वचन
तब सतगुरु कहे समझायी । काहे को तुम देत दुहायी ॥
सबही कहौं तुम पूछो तैसी । लोक राह है सो पुनि जैसी ॥
गही बाँहि उबारै तोहि राई । यहि हंसन की अहे कमाई ॥
जो तुम किरिया दीन्हा मोई । कछु न तुम सौं राखूं गोई ॥
यह कहिसतगुरु युगति बनाया । ले राजाको अंक मिलाया ॥
अंक मिला कटी सब माया । पारस रूप जो भई काया ॥
सद्गुरुका प्रसाद पाना
( ४६ )
जगजीवनबोध
अंक मिलाया भये नृप पारस । उघडी दृष्टि अधिक भै आरस॥
लोक द्रौप दृष्टि भै आई । भिन्न भिन्न सब द्रौप दिखाई ॥
भये राजा मन महा अनन्दा । मानो ऊँगे पूर्ण चन्दा ॥
राजा वचन
धन सतगुरु तुम्हरी बलिहारी । बूडत जीव तुम लीन्ह उबारी ॥
अब सतगुरु प्रसाद कछु कीजै । महा प्रसाद जीवनको दीजै ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो तुम राई । महा प्रसादकी जुगति बताई ॥
कंचन केरी थार मँगाओ । अमृतकी झारी भर लाओ ॥
आसन डारिके पुरुष बैठोओ । स्वेत बहुत सब हंस ले आओ ॥
इतना करि तब चरण खटारो । होय अधीन तन मनको मारो ॥
सुनि राजा सब युक्ती लीन्हा । सतगुरुको बहु बन्दन कीन्हा ॥
चरणखटारि पोंछि जब लियऊ । आसन बिठाय पुरुष कहँ दियऊ ॥
तब सतगुरु अस करबे लीना । सीथ प्रसाद सबनकूँ दीना ॥
पाय प्रसाद भये बड भागा । शून्य महल मन मोहरा जागा ॥
कहै समरथ कहु कैसा स्वादा । कहत बने नहि बनत अघादा ॥
सारखी-महाप्रसाद के करतही, निःतत्त्व होय जाय ।
रंचक घटमें संचरे, सतगुरु लोक दिखाय ॥
राजा वचन--चौपाई
सतगुरु कहिये बात विशेषा । लोक द्रौप सबही हम देखा ॥
धन्य सतगुरु तुम्हारे बलि जाऊँ । लोक द्रौप सब दृष्टिहि पाऊँ ॥
सतगुरु वचन
चौका युक्ती नहीं बनि आवै । महा प्रसाद कै देह बनावै ॥
तुमसे राजा कहु समझायी । पाख मास भै पान तुम पायी ॥
पुरुष पान सो पावे जबहीं । अगम ज्ञान सो सूझे तबहीं ॥
पान माहात्म्य
बोधसागर
( ४७ )
यही ज्ञान मैं भेद समझायी । तुम हंसन से कहो बुझायी ॥
हमरो प्रतिहार पान है भाई । पलपल खबर हंसकी लाई ॥
सोई वस्तु लै लोक पहुँचावे । सोई पान संग हंसन आवे ॥
जाका तुमसे कहूँ विचारा । पान लहे सो हंस हमारा ॥
जैसुनि लगन पान जो पावे । निर्भय लोक हमारे आवे ॥
पान परख विन झूठ कडिहारा । धोखे लेइ जिवन कर भारा ॥
धर्मराय माँगि है पाना । जब ही हंसा करे निर्वाना ॥
साखी-सब ही पहुँचे लोकमें, चढै पानपर अंक ।
कटे कर्म सब जन्मके, हंस होय निःशंक ॥
हंस ( राजा ) वचन-बोपाई
हंस कहे सुनो गुरुदेवा । जीवकि अवधि बताओ भेवा ॥
जादिन अंत अवस्था आवे । ताकर भेद हंस किमि पावे ॥
सोम शुक्र दिन औ बुधवारा । ताका कहिये चन्द्र सरदारा ॥
आपनि आपनि चौकी आवै । तौ यह जीव बहुत सुख पावै ॥
चले चूक चौकी कर फेरा । तौ कायानगरमें होय बखेरा ॥
गुरुबारका भेद बताऊँ । दो भावै गुरु दरस दिखाऊँ ॥
एकै आवै एक न आवै । ता दिन जीव बहुत दुःख पावै ॥
बार तिथि चौकी चूक करही । तो निश्चय ना बाचै देही ॥
सरब भेद मैं तोहि बताया । विरले हंस भेद यह पाया ॥
तुम सों हंस कहूँ समझायी । गुप्त भेद ना बाहिर जायी ॥
अब हम पृथ्वी परिक्रमा जावै । भूले हसन करें चितावै ॥
तुम राजा बैठि राज कराओ । सार शब्द जपन चित लाओ ॥
राजा वचन
जब सतगुरु तहाँ ऐसो कहिया । तब राजा मन चिता भइया ॥
राजा चरण धरयो तब आई । तुम विनु कैसे रहूँ गुसाई ॥
हमको राखो चरण लगायी । नहि देहु सत्यलोक पठायी ॥
सद्गुरुका पाटनसे चलनेका विचार प्रगट करना और वहाँके हंसोंकी विनती
( ४८ )
जगजीवनबोध
करक संक्रान्ति चन्द्रकी भाई । जल तत्त्व ते चन्द्र कहाई ॥
जब चन्दा घर चन्दा सोई । रोग व्याधि शोक ना होई ॥
चन्द्र पेलिके सूर समावे । पास छः में लोकहिं जावे ॥
अब पाँच तत्त्वका कई बखाना । जानेगा कोइ हंस सुजाना ॥
परबत पंच काया के बारै । गुरु गम हंसा करै विचारै ॥
पीत वरन है मन्दिर वारा । तामें पुरुष दरश गुरु सारा ॥
स्वेत वरन है पुरुष परमाना । ताका दरश करै कोइ स्याना ॥
तीजे लालवरन पुरुष परमाना । देखत हैं सो हंस सुजाना ॥
चौथा हरा रंग है सूरत । ताको ध्यान धरि देखिये सूरत ॥
पाँचवें स्याम वरन अधिकारा । सो देखै कोइ हंसा प्यारा ॥
जो कोइ इनसै सुरति लगावै । स्वास स्वासकी खबर बतावै ॥
रवि मंगल शनिश्चर वारा । तापर सूर होय असवारा ॥
कालज्ञान
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो रे भाई । अगम के भेद कई समझाई ॥
भिन्न भिन्न करके भेद बताऊँ । आगम कहिये दृष्टि दिखाऊँ ॥
वर्ष छः मास मासका भाऊँ । पाख आठदिन बरनि सुनाऊँ ॥
इंगला पिंगला सुषुमनि नारी । चले लगन सो लेहु विचारी ॥
पाँच तत्त्व हैं उनके पास । वह सब आगम कहैं तमासा ॥
स्याना हंस होय जो भाई । तिनको अगम देहुं बताई ॥
छः मासका भेद बताऊँ । अगम लहो सो कहि समझाऊँ ॥
दोग्य संक्रान्तिका भेद बतायी । एक मकर दूजा करक कहायी ॥
मकर संक्रान्ति सूरज सो देखा । तत्त्व पृथ्वी स्वर सूर विशेषा ॥
जो सूर घर सूरज आवे । छः मास काया सुख पावे ॥
सूरज पेलि चन्द्र जो आवे । छः मासमें जीव चलावे ॥
सद्गुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बनाकर गमन करना
बोधसागर
( ४९ )
पल पल राय नवावै माथा । मोको कैसे छुडाओ साथा ॥
गुरु विन कैसे रहौं अकेला । दिग दिग होये जीव न चेला ॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो मोर भाई । हम संगे रहो लै जाउँ लिवाई॥
सदा रहौ हंसन के पास। हमको रहै हंसनकी आसा ॥
देह सो दर्शन तुम्हे दिये राई । विदेही होय संग रहूँ सहाई ॥
विदेही दरश जब हंस पावे । देखि दरश होय अधिक उछावे॥
सतगुरु चलन खबर सब पावा । धीरे धीरे सब हंसा आवा ॥
आये हंसा विन्ती करहीं । हे साहब हम धीर कस धरहीं ॥
जो तुम जाओ सतगुरु साहब । हमहु संग सब तुम्हरे आयव ॥
तुम विनु गुरु कैसे रहि जावै । जल विनु मच्छी ज्यों तडपावै॥
हम पाये आनंद दरश तुम्हारे । मोको न छोडो स्वामि हमारे ॥
सतगुरु वचन
काहे को हठ करत हौ भाई । सबही हंस सुनो चित लाई ॥
देह धरी अब करो सुख वासा । सदा रखो निज नामकी आसा॥
घर में रहि कुल धर्म निवाहो । जो सब साँचि भक्ति तुम चाहो॥
सबहंस वचन
माता पिता त्रिया नहिं चहिये । सुत नारीसे नहिं नेह लगैये ॥
सतगुरु तुमही हौ यक साँचा । झूठ और सकल जग काचा ॥
विना दर्श सो दुख हम पावै । नित चरणामृत कहँसे लावै ॥
तुम विनु देह छुटि सो जावै । कहँ गुरुवचन बहुरि सो पावै ॥
विना दरश सब जगकी माया । सबहि छुटे नहिं चहिये काया॥
सतगुरु वचन
सतगुरु कहै सुनो रे भाई । सबही रहो नाम लौ लायी ॥
सदा रहूँ मैं उनके पास। धरे ध्यान जो साँचकी आसा॥
राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना और अधिकारी हंसोंका साथ जाना
( ५० )
जगजीवनबोध
सुनो हंस गहो पद सांची । ध्यान विदेह में रहि हो रांची॥
इतना कहि सतगुरु बतलावा । सबको विदेह ध्यान समझावा॥
ध्यान पाइ आनन्द सबै भयञ्ज । सतगुरुदरश प्रत्यक्षहि पयञ्ज ॥
फिर सतगुरु राजहि समझावा । सब हंसन को करहु चितावा ॥
पुनि हंसनसे अस प्रभु भाख्यो । हमरे ठौर राय तुहि राख्यो ॥
हम सम रायको सबही जानो । हमसन राय को अन्त न मानो॥
तब सदगुरु तहाँ ते पगुधारा । सब हंसन दुख भयो अपारा ॥
चलत गुरु सब सीस नवाया । करि मिलाप गुरु कण्ठ लगाया॥
तुम सों राजा कहू चितायी । रहो सदा शब्द लवलायी ॥
चले गुरु समरथ जेही वारा । रोवै हंस बहैं जल धारा ॥
जैसे रंकहि रतन हिराना । जैसे भुजंग मणी विसराना ॥
मानि सतगुरु आज्ञा लीना । विदेह ध्यान गुरु दर्शन दीना ॥
ध्यान पाइ गुरु करें सब भक्ती । काल नाल सब छूटी युक्ती ॥
केते दिवस ऐसे चलि गयञ्ज । तबही राजा आगम पयञ्ज ॥
सब हंसनको वेगि बुलायी । राजा कहै शब्द बतलायी ॥
राजा वचन
जेहि कारण हम भक्ति कराई । सो दिन अब पहुँचा है आई ॥
ताल पखावज वेगि लै आओ । शब्द चलावा मंगल गाओ ॥
बाजा बाजे बहुत वधायी । सबै त्रिया मिलि मंगल गायी ॥
सब ही लोक खबर यह पायी । राय जगजीवन लोक सिधायी ॥
पाटन नगर में बहुत उछावा । घर घर तिरिया करे बधावा ॥
बैठे राजा आसन धारी । जुरे हंस जहाँ बहुत अपारी ॥
ले परवाना बन्दगी कीना । सबही हंस परिकरमा दीना ॥
रानी पांच कुँवर दौय जाना । ❁ दासी चार हजुरी साना ॥
• इसके विरुद्ध दूसरों पुस्तकोंमें इस प्रकार लिखा है
जब राजा एक शब्द उचारा । कौन कौन चले हमारे लारा ॥-
सत्यलोकके मार्गमें धर्मरायसे हंसोंका वार्तालाप
बोधसागर
( ५१ )
चार प्रधान सात उमराऊ । प्रोहित द्योय द्वियै मन भाऊ ॥
इतना जन परवाना लीना । राजा संग सो प्याना कीना ॥
पावत बीरा जिव निस्तारेऊ । अमर लोक कहैं प्याना धारेऊ ॥
दशम द्वार सो न्यारा द्वारा । जेही राह हँस पगु धारा ॥
धन्य भाग हँसन तब जाना । राजाके संग कीन पयाना ॥
आये प्रथम धरम के डेरा । जहैं चौतरा रायधरम केरा ॥
धर्मराय जब लेखा मांगा । तब हँसा लेखा देने लागा ॥
जिन जिन कौल चुकाने भाई । सो सो रहे धर्मकी ठाई ॥
जीव बचन धर्मराय प्रति
जीव कहे सुनो धर्मराया । हम सतगुरुका परवाना पाया ॥
ज्ञान ध्यान हम बहुते जाने । और जाने अमर सो ज्ञाने ॥
हमको तुम काहे रोकत भाई । संगी हमारे आगे चले जाई ॥
धर्मरायबचन
भूला जीव मुख करे चतुरायी । ऐसी बतन मुक्ति न पायी ॥
साखी गावे सब संसारा । का सबही जिव उतरे पारा ॥
जो जीव होऐ कौलके साचा । तिन सबपर हम पाले बाचा ॥
सतगुरु सेवा कीन बनायी । हमरे शिरसु पावैं धरि जायी ॥
भक्ति हीन छुए अंग हमारा । छूवउ अंग होय जरि छारा ॥
—तब इतने हँस आगे पगुधारा । संग जान को कीन बोचारा ॥
रानी पांच कुर्वर द्योय जानी । दासी अष्ट नव हजुरी सानी ॥
पांच प्रधान प्यारह उमराओ । छडी दार सातसो मन साओ ॥
बारह कापस्थ सत्रह साहूका । बढई चार अरु सात लुहारा ॥
सत्रह मुनार अठारह बनजारा । चौकीदार चले संग चारा ॥
नव कुरमी सत्रह कोरी । तेरह कुन्हार सबै सर मोरी ॥
धोबी उजला धोवन हारा । पांच चले राजाकी लारा ॥
छः धमार बन्दगी कीना । राजा के संग प्याना दीना ॥
पाये बीरा जीव चलावा । निकसा जीव ठाठरी पढावा ॥
कामिनीसे बातचीत
( ५२ )
जगजीवनबोध
चार सहस्र सै सात रु बावन । इतना जिय चलु लोकहिं ठावन॥
दोसै कौल चुकाने भाई । सो रहे धर्म राय की ठाई ॥
चार हजार सात सै बावन । दोय सै धरमराज ठहरावन ॥
चार हजार बावन सै पाँचा । मानसरोवर पहुँचो सो साँचा ॥
जहाँ कामिनी मंगल गावै । सजि आरति ले आगे आवै ॥
कामिनी वचन
करी निछावर बूझै बाता । कैसे आये यहि मग धाता ॥
माया मोह बन्द्यो संसारा । कैसे छाडे कुल परिवारा ॥
हंस वचन
कहे हंस सतगुरु गम दीन्हा । जब हम दर्शन तुम्हारा लीन्हा॥
देह बनी सो आगे आये । रहिता सब जिव वहाँ रहाये ॥
चार हजार एकसौ बावन । एते हंस तेहीं ठावन ॥
चार सौ आगे किया पयाना । हेतु द्रौप पहुँचे अस्थाना ॥
मान सरोवर हंस रहायी । सबमिलिकरहि बहुत बधायी॥
सब पूछे कामिनि सो बात । यह सब हंस कहाँ को जाता ॥
कामिनी वचन
कह कामिनि सुनु हंसा भाई । तुम गुरु कर कह कीन कमाई ॥
परवाना की यह बडावा । सो तुम मानसरोवर आवा ॥
उन हंसन गुरु भक्ति करायी । जुगति जुगति उन देह बनायी ॥
आगे हेत द्रौप मैं जैहैं । हंस सुजन जन कंठ लगै हैं ॥
हंस वचन
सब हंसा मिलि विनती कीन्हा । हम चाहैं तुव दर्शन लीन्हा ॥
साखी-बैठि हंस विन्ती करे, सुनु समरथ अरदास ।
देही सवारे लोकमें, उपजे प्रेम विलास ॥