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कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास

Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)

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Devanagarihipublished2,136 pages

About this granth

The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.

The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.

This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.

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(१२४)

बीरसिंह बोध

चौपाई

तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥
निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥
धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥
जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥
अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥
चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥
तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥
मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥

छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥

बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥

काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥

करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥

सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥

कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥

चौपाई

तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥

आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥

साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥

हरिहर वचन

हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥

दूत वचन

कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥

वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥

आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥

नाम माहात्म्य

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बोधसागर

(१२५)

कबीर वचन

वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥

जीव वचन

विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥
नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥
तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥

ज्ञानी वचन

सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥
गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥

जीव वचन

जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥
जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥

कबीर वचन

साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥
अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥

चौपाई

पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥
कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥
देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥
देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥
ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥
मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥
तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥
कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥

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(१२६)

बीरसिंह बोध

ज्ञानी वचन

दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥
विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥

पुरुष वचन

आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥
कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥

हंस वचन

मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥
हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥
जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥
साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥
साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥
अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥

साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥
तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥

चौपाई

जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥
सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥
निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥
नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥
जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥
पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥

छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥
पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥

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बोधसागर

(१२७)

हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥
रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥

सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥
द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥

इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो
नाम तृतीयस्तरंगः ॥

ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।

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इति श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थ वीरसिंहबोध समाप्त

प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)

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कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत

भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)

द्वारा संशोधित

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराजा श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ५ कबीरसागर - १

Page 574Permalink

संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५

मूल्य : १२० रुपये मात्र ।

© सर्वाधिकार : प्रकाशक द्वारा सुरक्षित

मुद्रक एवं प्रकाशक:

खेमराज श्रीकृष्णदास,™

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग,

मुंबई - ४०० ००४.

Printers & Publishers :
Khemraj Shrikrishnadass,
Prop: Shri Venkateshwar Press,
Khemraj Shrikrishnadass Marg, 7th Khetwadi,
Mumbai - 400 004.

Web Site : http://www.Khe-shri.com
Email : [email protected]

Printed by Sanjay Bajaj For M/s. Khemraj Shrikrishnadass
Proprietors Shri Venkateshwar Press, Mumbai - 400 004,
at their Shri Venkateshwar Press, 66 Hadapsar Industrial
Estate, Pune 411 013.

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कबीरपंथके प्रधान आचार्य

A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.

श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब

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THE NEW YORK

THE NEW YORK

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बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका

इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें-
चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।

पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।

छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।

सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।

आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।

उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-

अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक.
धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर५राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना११
धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देनाराजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना१२
सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देना॥मंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना१५
कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जाना६इति
राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना७अथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका
राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृता८धर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर२१
रानीका सद्गुरुके अधीन होना९गर्भोत्पत्ति वर्णन२२
कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझाना॥जगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना२३
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( ६ )

बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.विषय.पृष्ठांक
साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकरसदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना
गर्भसे मुक्त करना२५कर गमन करना४९
पिशुन कर्म वर्णन२६राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना
पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ-और अधिकारी हूँताँका साथ जाना५०
का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमेंसत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का
मगन होना२९वातालाप५१
सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखेकामिनीसे बातचीत५२
बागमें ठहरना, उसका हरा होजानाहंस गुज्रन जनसे बातचीत५३
और राजाका खबर पाकर बाग देखनेसब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके
आना फिर कबीर साहबसे मिलना३२सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता५४
सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल यादग्रन्थसार५६
दिलाना३४इति
राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना३५अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका
सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप-सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर
देश देना३०जीवोंको चितानेको आज्ञा देना६५
राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना औरज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे
सदगुरुका उत्तर देना३७भेट होना६६
राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद-गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना६७
गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरकागुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना६८
हट करना पीछे शरणमें आना३९श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु
कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय४०बनानेको आज्ञा देना७०
सत्यलोकके आनेका मार्ग"गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना७१
आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों-गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके
का पान लेना४३लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना"
तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्नमहादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें
२ लोककी प्राप्ति४४समझाना७२
राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्लीगुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और
करना४५गुरुका परवाना लेना७३
सदगुरुका प्रसाद पाना४६गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना७४
पान माहात्म्य४७गुरु और ब्रह्मासे जर्बा"
काल ज्ञान"ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव
सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगटको बुलाना७७
करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली४८
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बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

( ७ )

विषय.पृष्ठांक.
ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत७९
गरुड़ और महादेवका बातलाप८१
तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद
पूछनेको जाना८३
निर्गुण भेद वर्णन८६
लौकिक ज्ञान वर्णन८७
महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान८८
गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये
बालक लाना८९
बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे
विनती करना९०
तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ
होना और गरुड़का बालकको जिलाने की
प्रतिज्ञा करना९३
गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये
फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा
करना९६
गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना
और तीनों देवका हार मानना१०४
गरुड़ बोधका संक्षेपसार१०५
इति
अथ हनुमान बोधकी अनु-
क्रमणिका
धर्मदास साहबका प्रश्न११३
हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका
भाव (टीप्पणीमें)”
बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना
हनुमानका अपनी बड़ाई करना और
मुनीन्द्रजीका समझाना११५
हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर
बापना (रामनामकी बड़ाई)११६
मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन
कर देना११७
हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई
करना११९
विषय.पृष्ठांक.
मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना
और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ
की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी
बात कहना१२१
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें
लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास
करनेकी बात कहना१२३
मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका
घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका
प्रगट होना”
हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर
लेनेको प्रार्थना करना१२४
मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर
आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको
सुनाना”
हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे
प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग
युक्ति का वर्णन करना१२५
साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन)१२६
हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां
पहुँचनेकी युक्ति पूछना१२७
मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना
समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना”
हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी
युक्ति पूछना”
मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये
सुरति निरति एक करनेकी युक्ति
हनुमान को बताना१२८
हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना१३१
ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास
प्रति१३२
सारविचार पचीसी१३३
इति
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( ८ )

बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका

विषय.पृष्ठांक.
अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता-
चरण और उत्थानिका१४१
कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी
का संदेश और कृष्णका समझाना”
बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके
समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा
के राजाको स्वप्न देना१४२
राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण
के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ
कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना१४३
समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि-
रको छः बार बहा ले जाना”
सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर
बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना”
लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप१४४
समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत१४६
ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध)१४८
समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर
साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा
का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन
तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले
के दंडका वर्णन१४९
ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना
वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा
करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा
विषय.पृष्ठांक.
का कबीर साहबसे प्रार्थना करके
ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना१५०
जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके
लिये राजाको स्वप्न देना१५१
राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और
मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना
और कारीगर न मिलनेसे राजाका
विकल होना”
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर
जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका
वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना१५३
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे
कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार
पर जाना और सोलह दिनतक द्वार
न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा
अपूर्ण रहना१५४
जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और
योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना”
सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल
दीप गमन”
संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि१५४
इति
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भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-भोपालबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराज श्रीकृष्णदास,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, बम्बई-४०० ००४

नं. ५ कबीरसागर - २

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श्री कालिका

प्रकाशक : श्री कालिका
पुस्तक संख्या : १०१
प्रकाशक : श्री कालिका

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सत्यनाम

श्री कबीर साहिब

Page 584Permalink

A faint, stylized illustration of a seated figure, possibly a deity or sage, holding a staff or lotus, with a small figure to the right. The figure is depicted in a meditative or seated posture, wearing robes. Above the figure is a small, triangular, umbrella-like structure. The entire illustration is rendered in a light, monochromatic style, appearing as a watermark or a faded print on the page.

विष्णु विष्णु वि

धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर

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सत्यकबीराय तमः

यस्योपदेशमाराध्य नरो मोक्षमवाप्नुयात् ।
तं कबीरमहं वन्दे मनोवाक्यायकर्मभिः ॥

अथ श्रीबोधसागरे

चतुर्थस्तरंगः

श्रीग्रन्थ भोपालबोध प्रारंभः

धर्मदासवचन चौपाई

धर्मदास कहे बन्दी छोरा । कैसे जीवन मारत चोरा ॥
केहि विधि जीवन मारत आई । साहिब सो मोहि भाष सुनायी ॥
कारण कौन मारत यम जीवा । मारन काल कौन है नीवा ॥

सतगुरु वचन

सद्गुरु कहै अंश सुनु वानी । महा कालकी कहौं निशानी ॥
धर्मराय आज्ञा जब करई । तबहीं मीच पृथ्वी पग धरई ॥

धर्मराय वचन

भयी मृष्टि बहुत अधिकार्ई । पृथ्वी भार न जाय सहाई ॥
ताते मीच पृथ्वी तुम जाऊ । जीवन धरि हम पर ले आऊ ॥
आनो जीव हमारे पास । जाहु मीच पृथ्वी करु बासा ॥
पवनरूप घट जाइ समाओ । जीवन जाय बाँधि ले आओ ॥
खांसी जूडी ताप तिजारी । काम क्रोध होउ रोग अपारी ॥

कबीर साहबका जालंधर देशमें राय भोपाल के घर जाना

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( ६ )

भोपालबोध

लोभ मोह भ्रम फाँस अपारा । यह नहीं मर्म लखै संसारा ॥
यहि फन्दा जग सबहिं फन्दाओ । विरले हंस सुकृत बन्दाओ ॥
साखी-यहि विधि जगमें जाइके, जीव लाउ हम पास ॥
फन्दा डारहु जीव पै, होहु मीच दुख रास ॥

चौपाई

यहि विधि काल जब आज्ञादीना । चले यमदूत सब साज सजीना ॥
उत पुरुष आज्ञा मोहि दीन्हा । जीव सुक्तावन कहै पठावन लीन्हा
कहे पुरुष सुनु ज्ञानी बाता । काल करे अब जीवन घाता ॥
घात करी सो भक्षण करिहै । बहुरि जीव भौसागर परि है ॥
काल दुष्ट बहु जीव सतावै । सारशब्द विनु मोहि न पावै ॥
याते जगमहँ अब तुम आओ । जीवहिं चिताय लोक कहँ लाओ ॥
आज्ञा मोरि लेहु सहिदाना । जाइ जगत जीव लाओ निदाना ॥
साखी-सुकृत जाहु संसार में, उल्टी राह चलाउ ॥
शब्दसार जीवन कहो, काल हंस सुक्ताउ ॥

चौपाई

पुरुष आज्ञा हम शिर मानी । करि प्रणाम तब जगत पयानी ॥
देश जलंधर राय भोपाला । गयउ तहां जिन्दाके हाला ॥
जाई पौरिमें ठाढ रहायी । कह्यो पौरिया बहुत चितायी ॥
राजहिं लाउ हमारे पास । दर्शन करै कर्म नृप नासा ॥
लागे कुंजी कुलुफ किवौरा । बहुत लोग बैठे शठिहारा ॥
कोइ कहै न्याय जिन्द चाहै । कोइ कहै बटपार यह आहै ॥
कोई कहै मारि यहि खेदो । निर्गुण भेद तिन्है नहिं भेदो ॥
चारि पहर तब रैन बितावा । भयो भिनसार भोर हो आवा ॥
तब हम चरित दिखावन लागे । फूटि कपाट भये दोह भागे ॥

राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना

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बोधसागर

( ७ )

सबै कँगूरा भुइ खसि परेऊ । ज्ञानी चली राय पहुँ गयऊ ॥

साखी-चकित सकल पौरिय, पाछे लगि सब धाय ॥

जहाँ राय भोपाल हैं, तहाँ पोरिया जाय ॥

चौपाई

करत गोहार पौरिया जाई । मार मार बहुत हकराई ॥

राय भोपाल बैठि जहाँ राजे । गये पौरिया तहाँ सब भाजे ॥

कीन्ह सलाम दोई कर जोरी । यह जिन्दा बटपार बडचोरी ॥

कहैं पौरिया पौर उचारो । तुरत बुलाओ राय यहि बारो ॥

जिन्दा वचन नहीं हम माना । बीत रैन भये भोर सुजाना ॥

मंत्र एक जिन्दा तब करिया । फूट कपाट कँगूरा गिरिया ॥

तब जिन्दा आयो महाराजा । हम आये तेहि पीछे भाजा ॥

ना जानौ कौन यह आही । होय बटपार धसा घर माही ॥

साखी-हो राजा महाराज मम, कहचो सत्य हम बात ॥

तत्क्षण जिन्दा मारहु, नातौ सब पर घात ॥

चौपाई

सुनो पौरिया कहे अस राजा । सुनिये वेद करौ तव काजा ॥

विप्र बुलाय सुनो मतिमाना । करिये तबै विवेक सुजाना ॥

आज्ञा वेद होय तब मारा । नहिं तो जिन्दा कहा बिगारा ॥

एतिक वचन राय सुख बोला । साहब आसन तवहीं डोला ॥

तत्क्षण हम अस लीला कीन्हा । रायमहल सोने करि दीन्हा ॥

कंचन कपाट रतनकी पांती । विपरीत बने खम्भ बहु भांती ॥

बने कँगूरा रतन रसाला । चकित राजा भये भोपाला ॥

साखी-भयो विवेक मन रायके, देखत मन पतियाय ॥

कौन पुरुष तुम समरथ, मोहैं कहैं दरश दिखाय ॥