कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
by कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास
Source: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (origin)
About this granth
The Kabir Sagar (कबीर सागर) is the large scriptural corpus of the Kabirpanth, especially its Dharamdasi branch, cast mainly as dialogues between Kabir and his disciple Dharamdas. It gathers many works, among them the Gyan Sagar, the Anurag Sagar and the various books of the Bodh Sagar, into eleven parts, and is the main source for the sect's cosmology, lineage and practice.
The sections of the first part, the Gyan Sagar, give a sense of its content: the kinds of liberation and the immortal realm, the True Being, the origin of creation and the islands of the cosmos, Dharmaraya (Niranjan) winning an island and Mansarovar by serving the True Being, his swallowing of Kamini and the curse laid on him, the descent of the Gyani (Kabir) to earth and his pact with Dharmaraya, the founding of Jagannath, the three gods and Adi Maya, the churning of the ocean, the origin of the Vedas and the four classes of birth, and the stories of Bali, the Sanakas and Narada.
This complete eleven-part edition is published by Khemraj Shrikrishnadass of the Shri Venkateshwar Press, Mumbai. Its 2,136 pages bring the entire Kabir Sagar together for students of the Kabirpanth.
बोधसागर
(११७)
ब्राह्मणी वचन
छन्द-माइ पुत्री करइ विन्ती धोती नाथ अनाथकी ॥
गाव सुल्क नहिं चाहीं मोहि धोती अहे जगन्नाथकी ॥
हम दीन हैं आधीन भिक्षुक शीस बरु मम लीजिये ॥
करि जोडि विन्ती मैं कहूं जस चाहिये अब कीजिये ॥
कबीर वचन
सोरठा-राजा घरहिं सिधाइ, टेके चरण तहैं खसम कर ॥
कहे उत्तर समुझाय, धोती मांगे न दीनेऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन-बीपाई
साहिब ब्राह्मणी लग हम गयऊ । धोती माँगत हम नहिं पयऊ ॥
कहे धोती मोहि देइ न जायी । जगन्नाथ हेतु धोती बनायी ॥
कहे बरु शीस लेहु तुम राजा । धोती देत होय व्रत अकाजा ॥
कबीर वचन
एती सुनतै हम विहँसाये । राजा कहँ एक वचन सुनाये ॥
छरीदार दोउ देउ पठायी । ब्राह्मणी संग क्षेत्रहीं जायी ॥
यहि प्रतीति लेहु तुम जाका । हम विन धोती लेइ को ताका ॥
राजा छडीदार पठवाये । ब्राह्मणी संग क्षेत्र चलि जाये ॥
नरियर लेइ ब्राह्मणी हाथा । करि अस्नान परसि जगन्नाथा ॥
लै धोती जब परस्यो जायी । तब धोती बाहर परि आयी ॥
ब्राह्मणी वचन
अब यह धोती काम न आयो । धोती फेरि कहो कस लायो ॥
जगन्नाथ वचन
जाके व्रत तुम काति बनायी । सो घर बैठे माँगि पठायी ॥
अब तुम अपने घर लै जाहू । लै धोती दै डालो काहू ॥
१ जगन्नाथपुरीको ।
(११८)
बीरसिंह बोध
ब्राह्मणी वचन
तबै ब्राह्मणी कहै कर जोरी । ठाकुर सुनिये विन्ती मोरी ॥
राय बीरसिंह मो घर आये । धोती माँगि कवीर पठाये ॥
उनके मांगे मैं नहिं दीना । हम कहि जगन्नाथ व्रत कीना ॥
तब राजा अपने घर गयऊ । हम ले धोती इहाँ सिधयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
जगन्नाथ तब कहि समझायो । तुम अपनी भल भाँति नशायो ॥
उनके मांगे धोती देती । आपन जनम सुफल कर लेती ॥
कबीर वचन
जगन्नाथ जस कहि समझायी । छडीदार तब लिये अर्थायी ॥
छडीदार अरु ब्राह्मणी आये । जहाँ राय अरु हम बैठाये ॥
ब्राह्मणी ले धोती घर दीनी । दोय कर जोरि सो विन्ती कीनी ॥
ब्राह्मणी वचन
हम अजान कछु जान न जायी । धोती नहिं दीनी मम पायी ॥
छडीदार वचन
छडीदार तब शीस नवाये । राजासे उठि विन्ती लाये ॥
जगन्नाथ धोती नहिं लीना । मंडप बाहर धोती कीना ॥
जगन्नाथ अस वचन सुनावा । यह धोती हम काम न आवा ॥
जब राजा से मांग पठाई । कस ना धोती दीनेउ माई ॥
जब हम मांगा तब ना दियऊ । अब कस देन यहाँ चलि अयऊ ॥
कबीर वचन
छडीदार उत्तर जब कहेऊ । तब मम चरण राय शिर लयऊ ॥
राजा बीरसिंह वचन
सांचे सदगुरु हैं तुव वचना । सत्य लोककी सत्य है रचना ॥
अब मोहि धनी सिखापन दीजै । हम पुरुषा आपन करि लीजै ॥
जाते अजर अमर पद पाई । सोई विधि तुम करो गुसाई ॥
बोधसागर
(११९)
कबीर वचन
जब हम राजहिं दीन बुझाईं । अजर आरती साज मँगाईं ॥
वीरसिहराय तब साज मँगावा । बहुत भांति पकवान बनावा ॥
मेवा भांति भांति मँगवायी । भांतिन भांति सुगन्ध धरायी ॥
सकल सुगन्ध खोजकर आने । फूलन माला बहुत बखाने ॥
चौका विस्तार थार मँगवायी । कोरा वासन आनि धरायी ॥
ततक्षण मन्दिर नये सँवारी । नये चन्दोवा कंचन झारी ॥
पाँचो बाती कलस धरायी । तत्छिन सकल साज बनवायी ॥
अगर चौका तब करि दीना । मन प्रतीति राजा गहि लीना ॥
तब राजा अस्तुति अनुसारा । बहुविधि विन्ती करे प्रचारा ॥
छन्द-अजरनामको कीन्ह चौका दिवस चारि विराजिके ॥
अजर सुमिरन कीन्ह ततक्षण पुरुष प्रकटे आनिके ॥
धनी जब ठाढे भये नृप दर्शन तबही लीन हो ॥
धाय राजा चरण गहे प्रभु अधम पावन कीन हो ॥
राजावीरसिंह वचन
सोरठा-तुव चरण बलिहार, पाछिल पुरुषा मम तरे ॥
धनि २ धनी हमार, कागाते हंसा किये ॥
कबीर वचन-चौपाई
यहि विधि प्राणी चौका करईं । कुलमाहीं बहु हंसा तरईं ॥
दिवस चारि चौका विस्तारे । तहँवा आप खसम पगु धारे ॥
निशि वासर सुमिरे निज नामा । छूटे पिण्ड चले निज धामा ॥
रहिहो राजा सुरति लगायी । यकटक ध्यान शब्द मन लायी ॥
शशि चकोर सम गुरु पद लागे । छूटे जनम मरण भ्रम भागे ॥
यही सिखापन राजहिं दीना । मन बच करम राय शिर लीना ॥
राजा वीरसिंह वचन
राजा रहे दोउ कर जोरी । साहब सुनियो विन्ती मोरी ॥
कबीर साहबका मगहरमें बिजुलीखाँके घर शरीर छोड़ना और राजा वीरसिंहका फौज लेकर बिजुलीखाँसे युद्धको जाना
(१२०)
बीरसिंह बोध
पुत्र व्याह कहैं आयसु पाऊँ । तौ साहब हम व्याह कराऊँ ॥
महा कठिन दोनो दिशि धारा । पुत्र काज हम तहाँ विचारा ॥
कबीर वचन
आज्ञा लेइ राय दल साजा । साजि कटक बहु ठाढ भे राजा ॥
तब मम चरण शीस नृप लाये । करन विनय टेके गहि पाये ॥
राजा बीरसिंह वचन
विन्ती कीन भरि करुणा । नहि जानू होय धोखे मरणा ॥
साहब रहिहो सदा सहाई । देह विदेह हंस मुकताई ॥
कबीर वचन
तब हम हाथ सीस तेहि दीना । करुणा कहा राय तुम कीना ॥
तुम तौ राय हंस मम आहू । दीन आशीष निडर होय जाहू ॥
चरण टेकि नृप भये असवारा । चले कटक जब पेलिनकारा ॥
बाजत बंब चले नृप जबहीं । भांति भांति बाजा बाजे तबहीं ॥
साजि बरात राजा चलि गयऊ । लीला एक रचत हम भयऊ ॥
तब हम तन तजि भये न्यारी । रानी चिता रचन मन धारी ॥
रानी बहुत शोच मन कीन्हा । राजा गये गुरु अस लीन्हा ॥
विजलीखाँ सुनि आतुर धाये । चिता माँझते सुरदा लाये ॥
गोर बनाय उन कीन निवाजा । कीन कटोरी बहुविधि साजा ॥
विजलीखाँ वचन
कहत पठान पीर भल लाये । ना तो रानी देत जराये ॥
कबीर वचन
यहवाँ रानी हिय अकुलाती । बीरसिंह देवको भेजी पाती ॥
छन्द-भेजी रानी रायको पाती सदगुरु गये लोक सो ॥
नृप जात गुरु तन तजे मोहि देख भो बड शोक सो ॥
चिता रची मुर्दा धरी तब आय विजलीखान हो ॥
जोर करि करि हमसो ले गये ले गाडि गोरहि दीन हो ॥
बोधसागर
(१२१)
सोरठा-वेगि नृपति चलि आव, सतगुरु काया लीजिये ॥
हँसे लोक बड चाव, नृप गुरु कहिकै म्लेच्छ सब ॥
कबीर बचन
पाती गही देखु जब राया । महाकोध आतुर चलि आया ॥
डारत घृतहि ढुताशन जैसे । रोम रोम पावक वरु तैसे ॥
चले सकल दल छोडि वराता । ब्याकुल राय कहे तब वाता ॥
राजा बीरसिंह बचन
अरे दिवान सुनो मतिवाना । वेगि चलौ गुरु कैसे ठाना ॥
विजुली मारहु शत्रु हमारा । करी विचार बैठ हंकारा ॥
कबीर बचन
आतुर चले बाजि गज धाये । कूड़ुक बाण गहि लीन चढाये ॥
खड्गतुपक औ सेल कटारा । धनुष बान करि वेगि सवारी ॥
कुड़ुक बाण हाथ करि लीना । अगनित बाजा बाजत दीना ॥
ठाढा भांट अनेक पुकारे । गुण वरने चारन बहु पारे ॥
भेजे राय पाँति तेहि बारा । खोदि कबर गुरु देहु हमारा ॥
नहि तो विजली बचे न पाई । एक एकको मारि गिराई ॥
आई पाँति तब कहे पठाना । सुनि विजली गहि लीन कमाना ॥
विजलीखाँ बचन
हिन्दू काफिर पीर न पावे । जान माल जो सब गलि जावे ॥
कबीर बचन
विजली खान सेना ले ठाढा । आपुन दीस बहुत बड गाढा ॥
पीर आपना हम नहि देते । विरसिंह राय करेगा केते ॥
तब हम रानी दर्शन दीना । मानिक दे चरणामृत लीना ॥
छोटी है कमलापति रानी । सो मम चरण पखारे आनी ॥
रानी राय कहा मोहि चीन्हा । मानुष विधि तुम हमकूँ कीना ॥
हाड मांस हमरे नहि काया । काहे दोनों रार बढाया ॥
पान देकर रानियोंको परलोक ले जानेके समयके मार्गका वर्णन
(१२२)
बीरसिंह बोध
राय पठान दोनों गुरु भाई । काहे दोनों करे लड़ाई ॥
पाती भेजहु राय पठाना । खोदि कबर देखो मतिवाना ॥
गोर मांहि सुरदा जो होई । राय पठान लड़ो तुम दोई ॥
जो मुर्दा तुम दूँठ न पाओ । काहेको तुम रार बढाओ ॥
मथुरा रतना कदोइन नारी । तिन बड प्रीति हमारी धारी ॥
सात दिवस लगि अन्न न पावा । हमरे दरस को सुरति लगावा ॥
ताको दर्शन दिये हम जाई । काहे मरो दोऊ गुरु भाई ॥
अन्तर्धान तब हम होइ गयऊ । तत्क्षण रतना दर्शन पयऊ ॥
यहाँ राना पाती पठवायी । राय देखि अचरज मन लायी ॥
गये बाँचि जहाँ रहै पठाना । सुनत पठान अचम्भो माना ॥
सुनत सलाह कीन पुनि दोई । राय पठान आये सब कोई ॥
आइ पठान गोर खुदवाई । देखो तहाँ देह नहीं पाई ॥
भये अधीन देख सब लोगा । करुणा करहि सकल भयो सोगा ॥
छन्द-भये सुकृत उदास सबहीं रंक निधि जैसे हरयो ॥
धन्य गुरु कहा बंदना तब चीन्ह गुरु मम ना परयो ॥
अमी पाय गुरु पंकज गहेसो काग होय मराल हो ॥
पाय अस्थिर सदन निर्बध हंस होय बड भाग हो ॥
अखंड धर्म विराज सतगुरु जहाँ काल नहीं पहुँच है ॥
असंख्य रवि अरु कोटि दामिनि अग्र शोभा तहाँ सहे ॥
दयासागर असहि विराजत पुष्प सज्या सोहहीं ॥
करहि कलोहल हंस सबहीं पुरुष दरश विलोकहीं ॥
सोरठा-षोडश रवि प्रभाव, चकोर उडगन पोहिया ॥
श्रवण आहि रवि भाव, अमृत फल हंसा चुगे ॥
चौपाई
गोर बनाय चले सब कोई । हिन्दू मुसलमान पुनि दोई ॥
नाना भाँति करत सब सोभा । कंठी तिलक देखि सब लोभा ॥
बोधसागर
(१२३)
धन्य राय धन्य पठाना । ऐसे गुरु पाये मतिवाना ॥
ऐसे बहुत दिन गये बिताई । रानी केरि अवधि नियराई ॥
सुन्दरदेह रानी कर नाऊ । पाये शब्द न प्रीति लगाऊ ॥
शब्द पाइ गुरु प्रीति न लागी । विना प्रीति सतभक्ति न जागी ॥
पाय शब्द नहिं कीन कमाई । ताते यम बहुते दुख लाई ॥
चारि दूत हरि तबहि बुलावा । तासे सकल मता समुझावा ॥
नगर गहो जाय नृप रानी । तहँवा जाय वेगि तुम आनी ॥
तब यमदूत गहि राजा गयऊ । जाय ठाढ़ मन्दिरमें भयऊ ॥
घट घट यम देखा व्योहारा । काया पैठि सो कीन विचारा ॥
तब रानीके वेदन भयऊ । व्याकुल करी दूत चित रहऊ ॥
राजा बूझे रानी बाता । कहे रानी मोहि नाहि सुहाना ॥
एक बात सुनिये मम राई । साधु संत सब देहु बुलाई ॥
राजा सकल साधु बुलवाये । सतगुरु भक्ति करो चित लाये ॥
बाढ़ विथा रानीकी काया । ततक्षिन आप पुरुष होय आया ॥
तबहीं यम जिव घेरे आयी । अरध अरध स्वासा चलि धायी ॥
भागि हंस त्रिकुटी में गयऊ । तहवाँ यम जिव घेरे लयऊ ॥
चारो जीव यम घेरे लायी । काहे बल तुम बचिहो जायी ॥
चलो हंस हरि कीन बुलाऊ । तब हंसा यक वचन सुनाऊ ॥
यहवाँ कस आये बटपारा । हमरे हैं समरथ रखवारा ॥
हम घर गुरु खसम यक आही । सो मोहि नाम दीन बतलाही ॥
दूत भूत यम तोहि चिन्हाई । आज्ञा देह खसम घर जाई ॥
जे साहेब मोहि नाम सुनाया । सो आवे गुरु जाय लिवाया ॥
साखी—तबही यम अस बोलिया, कहँ है धनी तुम्हार ॥
ताकहँ वेगि बुलावहू, नहिं चलु हरि दरबार ॥
(१२४)
बीरसिंह बोध
चौपाई
तब जिव यमसे कहवे लीना । साहब एक वचन कहि दीना ॥
निगमके पार अगमके आगे । सो सतगुरु मम श्रवणहि लागे ॥
धरनि अकाशते नगर निनारा । तहाँ विराजे धनी हमारा ॥
जहँ नहिँ चन्द सूरकी कांती । तहाँ नहीँ दिवस अरु राती ॥
अगम शब्द जब भाषे नाऊ । तब यम जीव निकट नहिँ आऊ ॥
चलो जीव हरि ब्रह्मा पासे । तुम्हरे धनी मोहि ना आसे ॥
तवहीं हँसा कीन पुकारा । कहँवा हौ तुम धनी हमारा ॥
मोसे यम कीनी बरि याई । कस नहिँ राखहु सद्गुरु आई ॥
छन्द-कीन जीव पुकार ततक्षण खसम बेगहिँ आइये ॥
बेग लागु गुहार सतगुरु हंस लोक पठाइये ॥
काहि करों पुकार साहब मातु पिता नहिँ कोइ जना ॥
करि ठिठाई मारि जीव यम झूठ जग मँह बन्धना ॥
सोरठा-लगे खसम गुहार, घाट घाट यम छेकिया ॥
कठिन परी यमधार, अति व्याकुल अकुलाय जिव ॥
चौपाई
तब सतगुरुका आसन डोला । काल दग्ध जिव व्याकुल बोला ॥
आई खसम तब दर्शन दियऊ । चरण बन्दि हँसा तब लियऊ ॥
साहब देखि भगा यमराई । अति आतुर होय हरिपै जाई ॥
हरिहर वचन
हरिहर बूझे यमसे बाता । कस नहिँ कियो जीवकी घाता ॥
दूत वचन
कहे यम स्वामी विन्ती मोरी । हम जिव छेकि कीन तेहि सोरी ॥
वह सुमिरे सतसुकृत नाऊ । सुनत पुकार धनी चलि आऊ ॥
आवत धनी भयो उजियारा । हम भागे चारो बटपारा ॥
नाम माहात्म्य
बोधसागर
(१२५)
कबीर वचन
वहाँ दूत पहुँचे हरि पासा । यहाँ जीव कहत सुखवासा ॥
जीव वचन
विनय जीव सुनु बन्दी छोरा । हम कहैं कष्ट दीन बड चोरा ॥
नाम तुम्हार बूझे यमराया । कहा नाम तब बचने पाया ॥
तब हम ततछिन कीन पुकारा । बेगहि आओ खसम हमारा ॥
ज्ञानी वचन
सुनो जीव नहिं शब्दहिं ध्यावा । राजा गुरु मानुष विसरावा ॥
गहे नाम अरु करे कमाई । तब यम दूत निकट न आई ॥
जीव वचन
जेहि ते हंसको घर पठवायी । तौन नाम मोहि भाषि सुनायी ॥
जाते जीव अमर घर जावै । दूत भूत यम खबर न पावै ॥
कबीर वचन
साखी-गुप्त नाम सुख भाखिया, अकह अमर निज नाम ॥
अमर कृपा निधि जीव कूँ, पहुँचे जीव निज ठाम ॥
चौपाई
पहुँचे जीव खसम घर जबहीं । सुख आनन्द भये बड तबहीं ॥
कंचन कलस बरत तहैं बाती । आरति करे हंस बहु भांती ॥
देखत जीव हंस उजियारा । अंग अंग शोभा चमकारा ॥
देख द्वीप शोभा बहु भांती । रविशशि मनि लागे जिमि पांती ॥
ता मध्ये जिमि लाल जंडाई । बीच बीच चुनि लै बैठाई ॥
मोतीसर झालरि बहु पोहा । देखत हंस रहे तहैं मोहा ॥
तबहिं पुरुष ज्ञानी हँकराई । कौन वचन तुम जीव सुनाई ॥
कौन वचन तुम जीवन दीना । जाते जीव अटक यम कीना ॥
(१२६)
बीरसिंह बोध
ज्ञानी वचन
दोय कर जोरि कहे शठिहारा । मुक्ति वचन जिव डार विसारा ॥
विसरे नाम छेके यम आयी । भाषि नाम यम जीव छुडायी ॥
पुरुष वचन
आज्ञा जीव पुरुष हंकराई । कहो जीव कस कीन कमाई ॥
कैसे पहुँचे लोक हमारे । सत्य वचन सो कहो विचारे ॥
हंस वचन
मस्तक नाय हंस कर जोरी । अमर पुरुष विन्ती यक मोरी ॥
हे साहब हम कछू न चीन्हा । गुरुको वचन मानि शिरलीन्हा ॥
जा दिन गुरु मोहिं दीनेउ पाना । तब मैं जानवो पद निर्बाना ॥
साधु गुरु मैं जान्यो एका । काम क्रोध छोडयो टेका ॥
साधु संत कर बन्देउ पायो । विसरचो नाम गुरु मोहि सुनायो ॥
अब पुरी यम छेकेउ आयी । पल यक दुख मोहिं तहाँ दिखायी ॥
साखी-खसम आइ दर्शन दिये, दीना नाम सुनाइ ॥
तब आये हम लोककूँ, यम शिर पाँव चढाइ ॥
चौपाई
जो नहिं नाम मुक्तिको पावे । माला डारि जगत बौरावे ॥
सुने नाम अरु करे कमाई । छाडे पारखण्ड अरु अधमाई ॥
निर्मल काया होय संसारा । जाकहँ दया करे करतारा ॥
नाम कवीर जपे बड भागी । उन मन ले गुरुचरमन लागी ॥
जापर दया जो होय तुम्हारी । ताकहँ कहा करहि बटपारी ॥
पुरुष दया जब होय सहायी । सत्यलोकमों जाय समायी ॥
छन्द-पुरुष दया कीन ततछिन अटल काया तब भयो ॥
पुहुप दीप निवास कीना सुमन सज्या आनन्दमयो ॥
बोधसागर
(१२७)
हंसन शिर क्षत्र राजे अमृत फल आनन्द घना ॥
रूप षोडश भानु हंसा कोटि शसिहिं अति बना ॥
सोरठा-धाम जो पाय अमोल, हंसा सुख तहैं विलसही ॥
द्वीपहिं द्वीप कलोल, जरा मरन भ्रम मेटिया ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससंवादे बीरसिंहबोधवर्णनो
नाम तृतीयस्तरंगः ॥
ग्रन्थ बीरसिंहबोध समाप्त ।
इति श्रीबोधसागरान्तर्गत
ग्रन्थ वीरसिंहबोध समाप्त
प्रारंभिक पृष्ठ (बोधसागर द्वितीय भाग)
कबीरसागर चतुर्थ खण्डान्तर्गत
भारतपथिक कबीरपंथी स्वामी श्रीयुगलानन्द (विहारी)
द्वारा संशोधित
मुद्रक एवं प्रकाशकः
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अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,
खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.
नं. ५ कबीरसागर - १
संस्करण : फरवरी २०१९, संवत् २०७५
मूल्य : १२० रुपये मात्र ।
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कबीरपंथके प्रधान आचार्य
A black and white portrait of a bearded man, identified as Shri Ugranam Sahab. He is seated, wearing a crown and traditional robes, and is holding a small object in his hands. The portrait is framed by a dark, textured border.
श्री १०८ पं० श्री उग्रनाम साहब
THE NEW YORK
THE NEW YORK
बोधसागर द्वितीय भागकी अनुक्रमणिका
इसमें चौथे तरंगसे लेकर आठवें तरंगतक है, जिसमें-
चौथे तरंगमें भोपालबोध है जो पृष्ठ १ से आरंभ होकर पृष्ठ १६ पर समाप्त हुआ है ।
पाँचवाँ तरंग जगजीवन बोध है जो पृष्ठ १७ से आरम्भ होकर ६० पर समाप्त हुआ है ।
छठा तरंग गढ़बोध है जो पृष्ठ ६१ से आरंभ होकर पृष्ठ १०८ पर समाप्त हुआ है ।
सातवाँ तरंग हनुमानबोध है जो पृष्ठ १०९ से आरम्भ होकर पृष्ठ १३६ पर समाप्त हुआ है ।
आठवाँ तरंग लक्ष्मण बोध है जो पृष्ठ १३७ से आरंभ होकर पृष्ठ १६० पर समाप्त हुआ है ।
उपरोक्त तरङ्गोंकी अलग अलग अनुक्रमणिका इस प्रकार है-
अथ भोपालबोधकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|---|---|
| धर्मदास साहबका सद्गुरुसे कालके जीवोंके मारनेके विषयमें प्रश्न करना और कबीर साहबका उत्तर | ५ | राजाका आरती चौका करके नामका उपदेश लेना | ११ |
| धर्मरायका मृत्युको मनुष्योंके मारनेकी आज्ञा देना | राजाको लेकर कबीर साहबका सत्यलोक को जाना | १२ | |
| सत्यगुरुका कबीर साहबको जीवों की रक्षा के लिये पृथ्वीपर आनेकी आज्ञा देना | ॥ | मंत्रि आदिका राजाको महल में न देखकर परजात्ताप और शोक करके भयसे नगर छोड़कर भाग जाना | १५ |
| कबीर साहबका जालंदर देशमें राय भोपाल के घर जाना | ६ | इति | |
| राय भोपालका कबीर साहबको क्लेश करने की सलाह करना | ७ | अथ जगजीवनबोधकी अनु-क्रमणिका | |
| राजाके अधीन होकर सद्गुरुका हास्य प्रकृता | ८ | धर्मदास साहबका गर्भवियय प्रश्न और सद्गुरुका उत्तर | २१ |
| रानीका सद्गुरुके अधीन होना | ९ | गर्भोत्पत्ति वर्णन | २२ |
| कबीर साहबका राजारानीको ज्ञान समझाना | ॥ | जगजीवनका गर्भके कष्ट से व्याकुल होकर साहबकी स्तुति और कीस करना | २३ |
( ६ )
बोधसागर द्वितीयभागको अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. | विषय. | पृष्ठांक |
|---|---|---|---|
| साहबका दया करके जगजीवनसे कौल लेकर | सदगुरुका राजाको अपना प्रतिनिधि बना | ||
| गर्भसे मुक्त करना | २५ | कर गमन करना | ४९ |
| पिशुन कर्म वर्णन | २६ | राजाका सत्यलोक गमनकी तय्यारी करना | |
| पिशुनके फेरमें पड़कर जगजीवनका गर्भ- | और अधिकारी हूँताँका साथ जाना | ५० | |
| का कौल भूल जाना और संसारी बँधबन्धमें | सत्य लोकके मार्गमें धर्मरायसे हूँताँ का | ||
| मगन होना | २९ | वातालाप | ५१ |
| सदगुरुका पाटनमें पहुँचना और एक सूखे | कामिनीसे बातचीत | ५२ | |
| बागमें ठहरना, उसका हरा होजाना | हंस गुज्रन जनसे बातचीत | ५३ | |
| और राजाका खबर पाकर बाग देखने | सब हूँताँको लेकर ज्ञानीजीका सत्य पुरुषके | ||
| आना फिर कबीर साहबसे मिलना | ३२ | सन्मुख जाना और सत्य पुरुषको प्रसन्नता | ५४ |
| सदगुरुका राजा हो गर्भका कौल याद | ग्रन्थसार | ५६ | |
| दिलाना | ३४ | इति | |
| राजाका सदगुरुसे उद्धारकी बिल्ली करना | ३५ | अथगुरुबोधकी अनुक्रमणिका | |
| सदगुरुका राजाको आरती करनेका उप- | सत्यपुरुषका ज्ञानीजीको संसारमें जाकर | ||
| देश देना | ३० | जीवोंको चितानेको आज्ञा देना | ६५ |
| राजाका पहलेके हूँताँका हाल पूछना और | ज्ञानीजीका संसारमें आना और गुरुसे | ||
| सदगुरुका उत्तर देना | ३७ | भेट होना | ६६ |
| राजा रानी इत्यादि सब परिवारका सद- | गुरुका श्रीकृष्णके पास जाकर ज्ञान करना | ६७ | |
| गुरुकी शरणमें आना और राजकुंवरका | गुरुका ज्ञानीजीके आधीन होना | ६८ | |
| हट करना पीछे शरणमें आना | ३९ | श्रीकृष्णका गुरुको कबीर साहबको गुरु | |
| कुफर्मा जीवके उद्धारका उपाय | ४० | बनानेको आज्ञा देना | ७० |
| सत्यलोकके आनेका मार्ग | " | गुरुका आरतीका साज एकट्ठा करना | ७१ |
| आरती कराकर राजा तथा अन्य जीवों- | गुरुका सब देवोंको आरतीमें बुलानेके | ||
| का पान लेना | ४३ | लिये नेवता देनेको ब्रह्मसभामें जाना | " |
| तन छूटने पर हंसका स्थान कर्मानुसार भिन्न | महादेवका बोध करना और गुरुका उन्हें | ||
| २ लोककी प्राप्ति | ४४ | समझाना | ७२ |
| राजाका सदगुरुसे लोक लेजानेको बिल्ली | गुरुकी आरतीमें सब देवोंका आना और | ||
| करना | ४५ | गुरुका परवाना लेना | ७३ |
| सदगुरुका प्रसाद पाना | ४६ | गुरुका त्रिवेवसे जर्बा करने जाना | ७४ |
| पान माहात्म्य | ४७ | गुरु और ब्रह्मासे जर्बा | " |
| काल ज्ञान | " | ब्रह्माका विमान भंजकर विष्णु और महादेव | |
| सदगुरुका पाटनसे चलनेका बिचार प्रगट | को बुलाना | ७७ | |
| करना और बहूँके हूँताँकी बिल्ली | ४८ |
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
( ७ )
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| ब्रह्मा और विष्णुकी बातचीत | ७९ |
| गरुड़ और महादेवका बातलाप | ८१ |
| तीनों देवोंका गरुड़से हारकर मातासे भेद | |
| पूछनेको जाना | ८३ |
| निर्गुण भेद वर्णन | ८६ |
| लौकिक ज्ञान वर्णन | ८७ |
| महादेवका क्रोध और गरुड़का ज्ञान | ८८ |
| गरुड़का तीनों देवोंकी परीक्षा लेनेके लिये | |
| बालक लाना | ८९ |
| बालकका कालसे रक्षाके लिये त्रिदेवसे | |
| विनती करना | ९० |
| तीनों देवका कालसे रक्षा करनेमें असमर्थ | |
| होना और गरुड़का बालकको जिलाने की | |
| प्रतिज्ञा करना | ९३ |
| गरुड़का लोक लोकान्तरमें अमृतके लिये | |
| फिरना और सब लोकपालोंसे चर्चा | |
| करना | ९६ |
| गरुड़का अमृत लाकर बालक को जिलाना | |
| और तीनों देवका हार मानना | १०४ |
| गरुड़ बोधका संक्षेपसार | १०५ |
| इति | |
| अथ हनुमान बोधकी अनु- | |
| क्रमणिका | |
| धर्मदास साहबका प्रश्न | ११३ |
| हनुमान शब्दका अर्थ और हनुमान बोधका | |
| भाव (टीप्पणीमें) | ” |
| बेतामें कबीरसाहबका हनुमान से मिलना | |
| हनुमानका अपनी बड़ाई करना और | |
| मुनीन्द्रजीका समझाना | ११५ |
| हनुमान रामचन्द्रजीको सबके ऊपर | |
| बापना (रामनामकी बड़ाई) | ११६ |
| मुनीन्द्रजीका हनुमानके वचनका खण्डन | |
| कर देना | ११७ |
| हनुमानका निरंजन (काल) की बड़ाई | |
| करना | ११९ |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| मुनीन्द्रजीका समरथकी बड़ाई करना | |
| और हनुमानका सन्देहमें आकर समरथ | |
| की बात पूछना मुनीन्द्रजीका समरथकी | |
| बात कहना | १२१ |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे समरथके देशमें | |
| लंजानेपर उसको देख लेने पर विस्वास | |
| करनेकी बात कहना | १२३ |
| मुनीन्द्रजीका लोप होजाना और हनुमानका | |
| घबराकर पुकारना, फिर मुनीन्द्रजीका | |
| प्रगट होना | ” |
| हनुमानका मुनीन्द्रजीसे अपनेको शिष्य कर | |
| लेनेको प्रार्थना करना | १२४ |
| मुनीन्द्रजीके योग्यीत नामसे प्रकट होकर | |
| आदि उत्पत्तिकी कथा हनुमानको | |
| सुनाना | ” |
| हनुमानका साधु लक्षण विषय मुनीन्द्रजीसे | |
| प्रश्न करना और नाना वेष तथा योग | |
| युक्ति का वर्णन करना | १२५ |
| साधुलक्षण (मुनीन्द्रबचन) | १२६ |
| हनुमानका समरथका ठिकाना और वहां | |
| पहुँचनेकी युक्ति पूछना | १२७ |
| मुनीन्द्रजीका सुरति निरति एक करना | |
| समरथके घर पहुँचनेका मार्ग बताना | ” |
| हनुमानका सुरति निरति एक करनेकी | |
| युक्ति पूछना | ” |
| मुनीन्द्रजीका समरथके घर पहुँचनेके लिये | |
| सुरति निरति एक करनेकी युक्ति | |
| हनुमान को बताना | १२८ |
| हनुमानका कबीर साहबका उपकार मानना | १३१ |
| ग्रन्थकी सभाप्ति कबीरका वचन धर्मदास | |
| प्रति | १३२ |
| सारविचार पचीसी | १३३ |
| इति |
( ८ )
बोधसागर द्वितीयभागकी अनुक्रमणिका
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| अथ लक्ष्मण बोधकी अनुक्रमणिका संगत्ता- | |
| चरण और उत्थानिका | १४१ |
| कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजी | |
| का संदेश और कृष्णका समझाना | ” |
| बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके | |
| समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उडीसा | |
| के राजाको स्वप्न देना | १४२ |
| राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्ण | |
| के शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझ | |
| कर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना | १४३ |
| समुद्रका अपना बहला लेनेके लिये मंदि- | |
| रको छः बार बहा ले जाना | ” |
| सातवें बार कबीर साहबका समुद्र तटपर | |
| बैठना और समुद्रका पीछे लौट जाना | ” |
| लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातलाप | १४४ |
| समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत | १४६ |
| ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध) | १४८ |
| समुद्रका द्वारिका दुबा लेना और कबीर | |
| साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना पण्डा | |
| का संदेह और अनंत कबीरका दर्शन | |
| तथा जगन्नाथमें छूत छात माननेवाले | |
| के दंडका वर्णन | १४९ |
| ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना | |
| वहां कबीर साहबकी देखकर घृणा | |
| करना उसके देहमें कोढ़ फूटना राजा |
| विषय. | पृष्ठांक. |
|---|---|
| का कबीर साहबसे प्रार्थना करके | |
| ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना | १५० |
| जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके | |
| लिये राजाको स्वप्न देना | १५१ |
| राजाका मलयगिरिसे चन्दन लाना और | |
| मूर्ति बनानेके लिये कारीगरका खोजना | |
| और कारीगर न मिलनेसे राजाका | |
| विकल होना | ” |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर | |
| जाना और सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका | |
| वचन लेकर प्रतिमा बनानेको बैठना | १५३ |
| कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे | |
| कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार | |
| पर जाना और सोलह दिनतक द्वार | |
| न खोलनेका वचन लेकर प्रतिमा | |
| अपूर्ण रहना | १५४ |
| जगन्नाथजीका गोरखको शाप देना और | |
| योगियोंका जगन्नाथ दर्शन बन्द होना | ” |
| सम्मानित और कबीर साहबका सिंहल | |
| दीप गमन | ” |
| संक्षेपसार और ग्रन्थपर साधारण दृष्टि | १५४ |
| इति |