कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
इस ग्रन्थ के बारे में
कबीर सागर कबीरपन्थ, विशेषकर धर्मदासी शाखा, का विशाल धार्मिक ग्रन्थ-समूह है, जो मुख्यतः कबीर साहब और उनके शिष्य धर्मदास के संवाद के रूप में है। इसमें अनेक छोटे-बड़े ग्रन्थ, जैसे ज्ञान सागर, अनुराग सागर और बोध सागर के विभिन्न बोध, ग्यारह भागों में संकलित हैं। यह कबीरपन्थ के सृष्टि-विचार, गुरु-परम्परा और साधना का मुख्य स्रोत है।
पहले भाग ज्ञान सागर के प्रकरणों से इसकी विषय-वस्तु का अनुमान होता है: मुक्ति-भेद और अमरलोक, सत्य पुरुष का वर्णन, सृष्टि की उत्पत्ति, द्वीपों का वर्णन, धर्मराय (निरञ्जन) का सत्य पुरुष की सेवा से द्वीप और मानसरोवर पाना, कामिनी को निगलना और शाप पाना, चौदह यमों के नाम और कर्म, ज्ञानी जी (कबीर) का पृथ्वी पर आना और धर्मराय से वचन लेना, जगन्नाथ की स्थापना का प्रसंग, तीन देवों और आदि माया की कथा, समुद्र-मन्थन, वेदों और चार खानियों की उत्पत्ति, और फिर बलि, सनक-सनन्दन तथा नारद के चरित्र।
यह सम्पूर्ण ग्यारह भागों का संस्करण खेमराज श्रीकृष्णदास, श्रीवेङ्कटेश्वर प्रेस, मुम्बई ने प्रकाशित किया है। २१३६ पृष्ठों में पूरा कबीर सागर एक साथ उपलब्ध होने से यह कबीरपन्थ के अध्येताओं के लिए एक सम्पूर्ण सन्दर्भ है।
मुकुत अंश (धर्मदास) को चितानेके लिये कबीरसाहबका पृथ्वीपर आना
अनुरागसागर
( १११ )
धरहि न धीरज बहुत संतोषा । तुम साहिब मेढहु जिवधोखा॥
धरे न धीरज बहुत प्रबोधे । बिछुरिजननिजिमिमिल्यो अबोधे
युग पग गहे सीस भुई लाये । निपट अधीरन उठत उठाये ॥
बिलखत बदन वचन नहीं बोले । सुरति चरणते नेक न डोले ॥
निरखत बदन बहुरोपदगहहीं । गदगद हृदय गिरा नहिं कहहीं॥
बिलखत बदन स्वास नहिं डोले । उनसुनिदशा पलक नहिं खोले॥
धर्मराज वचन
बहुरि चरण गहि रोवहिं भारी । धन्य प्रभु मोहितारनतनधारी॥
धरि धीरज तब बोले सम्हारी । मोकहैं प्रभु तारन पगधारी ॥
अब प्रभु दया करहु यहि मोही । एकौ पल ना विसरों तोही ॥
निशिदिन रहों चरण तुम साथ । यह बर दीजै करहु सनाथा ॥
कबीर वचन
धर्मदास निह संशय रहहु । प्रेम प्रतीति नाम दिढ़ गहहु ॥
चीन्हेउ मोहि तोर भ्रम भागा । रहै सदा तुम दृढ़ अनुरागा॥
मन बचकर्म जाहि जो गहई । सो तेहि तज अंत कस रहई॥
आपन चाल बिना दुख पावे । मिथ्या दोष गुरु कहैं लावे॥
पंथ सुपंथ गुरु समझावे । शिष्य अचेतन हृदय समावे॥
तुम तो अंश हमारे आहु । बहुतक जीव लोक ले जाहु ॥
चार माहि तुम अधिक पियारे । किहि कारण तुम शोचविचारे॥
हम तुमसों कछु अन्तर नाही । परक शब्द देखो हियमाहीं ॥
मन बच कर्म मोहि लौ लावे । हृदये बुतिया भाव न आवे॥
तुम्हरे घट हम वासा कीन्हा । निश्चय हम आपन कर लीन्हा ॥
छन्द
आपनो कर लीन्ह धर्मनि, रहो निःसंशय हिये ॥
करहु जीव उबार दृढ़ है, नाम अविचल तुहि दिये ॥
( ११२ )
अनुरागसागर
मुक्ति कारण शब्द धारण पुरुष सुमिरण सारहो ॥
सुरति बीरा अंकधीरा जीविका निस्तार हो ॥७६॥
सो०-तुमतौ हौ धर्मदास, जंबुदीप कड़िहार जिव ॥
पावे लोक निवास, तुहि समेत सुमिरे मुझे ॥७७॥
धर्मदास वचन
धन सतगुरु धन तुम्हरी वानी। मुहि अपनाय दीन्ह गनि आनी ॥
मोहि आय तुम लीन्ह जगायी । धन्य भाग्य हम दर्शन पायी ॥
धन साहब मुनि शाप न कीन्हा । मम शिर चरण सरोरुह दीन्हा ॥
मैं आपन दिन शुभ करि जाना । तुम्हरे दरश मोक्ष परमाना ॥
अब अस दया करहु दुख भंजन । कबहुँ मोहि न धरे निरंजन ॥
काल जाल जौनी बिधि छूटे । यमबंधन जौनी बिधि टूटे ॥
सोई उपाय प्रभु अब कीजे । सार शब्द बताय मोहि दीजे ॥
कबीर वचन
धर्मदास तुम सुकृत अंशा । लेह पान अब मेटहु संशा ॥
धर्मदास आपन करि लेऊँ । चौका करि परवाना देखै ॥
तिनका तुडाय लेहु परवाना । कालदशा छुटे अभिमाना ॥
शालिग्रामको छाड़हु आसा । गहि सत शब्द होहु तुम दासा ॥
दश औतार ईश्वरी माया । यह सब देखु कालकी छाया ॥
तुम जग जीव चितावन आये । काल फंद तुम आय फसाये ॥
अबहुँ चेत करो धर्मदासा । पुरुषहि शब्द करो परकासा ॥
ले परवाना जीव चिताओ । काल जालते हंस मुक्ताओ ॥
यहि कारज तुम जगमें आये । अबन करहु दोसर मन भाये ॥
१ कर्णधार मल्लाह नाव खेकर पार उतारनेवाला भवसागर से गुरु पार उतारते हैं इस कारण उन्हें कड़िहार कहते हैं।
कबीरसाहबका चौका करके धर्मदासजीको परवाना देना आरती विधि
अनुरागसागर
( ११३ )
छन्द
चतुर्भुज बंकेज सहतेज, और चौथे तुम अहौ ॥
चार गुरुकडिहार जगके वचन यह निश्चय गहौ ॥
यही चार अंश संसारमें, जीव काज प्रगटाइया ॥
स्वसंवेदसोइनसंग दियो, जेहि सुनि काल भगाइया ॥७४॥
सोरठा-चरोंमें धर्मदास, जम्बुदीपके गुरु साहि ॥
व्यालिस वंश विलास तैं जीव तेहि शरणगहि ॥७८॥
आरतीविधिवर्णन
कबीर साहबका चौका करके धर्मदासको परवाना देना
धर्मदास वचन
धर्मदास पद गहि अनुरागा । हो प्रभु मोहि कीन्ह सुभागा ॥
हे प्रभु ! नहि रसना प्रभुताई । अमित रसन गुण वरनिन जाई ॥
महिमा अमित अहै तुम स्वामी । केहि विधि बरनों अंतरयामी ॥
मैं सब विधि अयोग्य अविचारी । मुझ अधमहिं तुम लीन उबारी ॥
अब चौका भेद कहो मुहि स्वामी । काहि कहहु तिनका सुखभामी ॥
जो तुम कहो करौ मैं सोई । तामहैं फेर न परि हैं कोई ॥
कबीर वचन चौकाका साज
धर्मदास सुनु आरति साजा । जाते भागि चले यमराजा ॥
सात हाथको बस्तर लाओ । श्वेत चँदोबा छत्र तनाओ ॥
घर आंगन सब शुद्ध कराओ । चौका करि चन्दन छिड़काओ ॥
तापर आँटा चौक पुराओ । सवासेर तंदुल ले आओ ॥
स्वेत सिंहासन तहाँ बिछाई । नाना सुगंध धरु तहाँ लगाई ॥
स्वेत मिठाई स्वेतै पाना । पुंगीफल स्वेतहि परमाना ॥
लौंग इलायची कपुर सँवारो । मेवा अष्ट केरा पनवारो ॥
कबीरसाहबका धर्मदासको उपदेश देना
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नारायणदासजीका कबीरसाहबकी अवज्ञा करना
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द्वादश पन्थका वर्णन
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अनमङ्ग वृत्तका पन्थ ४
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अखिलभङ्ग दूतका पंथ ८
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धर्मदास साहबको आत्म अंशका दर्शन होना
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चूड़ामणिकी उत्पत्तिकी कथा
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ब्यालीस वंशके राज्यकी स्थापना
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चूड़ामणिको कबीरसाहबका उपदेश देना
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वंश का माहात्म्य
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भविष्य कथा प्रारम्भ
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निरंजनका अपने चार अंशको पंथ चलानेकी आज्ञा देना
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