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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 460

(१६)

ज्ञानप्रकाश

धर्मदास वचन

अहो साहब तब बात पियारी । चरण टेकि बहु विनय उचारी ॥
अहो साहब जस तुम्ह उपदेशा । ब्रह्मज्ञान गुरु अगम सँदेशा ॥
छठयें दिवस साधु एक आये । प्रीय बात पुनि उनहु सुनाये ॥
अगम अगाधि बात उन भाखा । कृत्रिम कला एक नहिं राखा ॥
तीरथ व्रत त्रिगुण कर सेवा । पाप पुण्य वह करम करेवा ॥
सो सब उन्हहि एक नहिं भावै । सबते श्रेष्ठ जो तेहि गुण गावै ॥
जस तुम कहेहु विलोइ विलोई । अस उनहूँ मोहिं कहा सँजोई ॥
गुप्त भये पुनि हमकहँ त्यागी । तिन्ह दरशनके हम वैरागी ॥
मोरे चित अस परचै आवा । तुम्ह वै एक कीन्ह दुइ भावा ॥
तुम कहाँ रहो कहो सो बाता । उन्ह साहब कहँ जानहु ताता ॥
केहि प्रभु कै तुम सुमिरण करहु । कहहु विलोइ गोइ जनि धरहु ॥

सतगुरु वचन

अहो धर्मदास तुम सन्त सयाना । देखौं तोहि मैं निरमल ज्ञाना ॥
धर्मदास मैं उनकर सेवक । जहँहि सो भव सार पद देवक ॥
जिन कहा तुमहिं अस ज्ञाना । तिन साहेब कै मोहिं सहि दाना ॥
वे प्रभु सत्यलोकके वासी । आये यहि जग रहहिं उदासी ॥
नहिं वो भग दुवार होइ आये । नहिं वो भग माहिं समाये ॥
उनके पाँव तत्त्व तन नाहिं । इच्छा रूप सो देह नहिं आहिं ॥
निःइच्छा सदा रहँहीं सोई । गुप्त रहहिं जग लखै न कोई ॥
नाम कबीर सन्त कहलाये । रामानन्द सो जान सुनाये ॥
हिन्दू तूर्क दोउ उपदेशैं । मेटैं जीवन केर काल कलेशैं ॥
माया ठगन आई बहु बारी । रहैं अतीत माया गइ हारी ॥
तिनहि उठावा तोहि पाही । निश्चय उन्ह सेवक हम आही ॥
अहो सन्त जो कारज चहहु । तो हमार सिखावन गहहु ॥
उनकर सुमिरण जो तुम करिहौ । एकोतरसौ पुरुषा लै तरिहौ ॥