सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

पृष्ठ 431, कुल 2136 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 431

सर्वज्ञसागर

( १३५ )

सात करी अंकुर ते भयऊ । भिन्न भिन्न प्रसंग सो लयऊ ॥
सीप सरूपी करी जो कीन्हा । स्वास स्वरूपी इच्छा दीन्हा ॥
सात इच्छा सात करिनमें भयऊ । स्वाति सरूप बून्दतेहि दयऊ ॥
सातो करि भयी प्रकासा । नहिं तब धरती नहीं अकाशा ॥
अर्द्ध अंकुर रहा ठहरायी । तब मुख शब्द स्थिर कहैं आयी ॥
सोरह अंस जो जन विस्तारा । इतनी दृष्टि अंकुरज पसारा ॥
तेहिमें सास करी उपजायी । ताकर मर्म काहु नहिं पायी ॥
तेहि करिन ते अण्डा भयऊ । द्योयकरी विन अण्डा रहेऊ ॥
नहिं तब धरती नहीं अकाशा । अधरहिं अघर अण्ड प्रकासा ॥
मध्य में अण्ड करे चौ चण्डा । एक अण्ड उपज्यो प्रचण्डा ॥
भिन्न भिन्न गति न्यारी कीन्हा । शिवशक्ति अण्डमहँ धरि दीन्हा ॥
नौसे निमिष अन्तर होय छूटा । तबहीं अण्ड उठचो पुनि फूटा ॥
प्रथमहिं तेज अण्ड विगस्यो भाई । तामें पांच तत्त्व निर्माई ॥
बाहर पालँग तेज अण्ड विस्तारा । तामें पांच तत्त्व भौ सारा ॥
तत्त्व स्नेह अण्ड सो कीन्हा । अस्थिर शब्द काल भल दीन्हा ॥
तबहीं श्रवण साजी वानी । तेहिंते मूल सुरति उत्पानी ॥
अबोलपरस सुरति कहि दीन्हा । सात संधि प्रकट कर लीन्हा ॥
सात सन्धि तब गुप्तहिं पेखा । पीछे सोहँ शब्द विवेखा ॥
सोहँ शब्द सत्य अनुसारा । सोहँ सुरति अजावन पसारा ॥
जावन ते पुरुष अचित निर्मायी । तेहि पुरुष अपने निकट बुलायी ॥
तेहि सो पुरुष ऐसी कही । सकल सृष्टि रचो तुम सही ॥
पुरुषको विनय कीन्ह करजोरी । हो सतगुरु विनती यक मोरी ॥
केहि विधि रचौं सो देहु बतायी । तीन भेद गुरु देउ पढायी ॥
नीकलंकी पुरुष वाच उच्चार । शब्द प्रतापकर अगम विचारा ॥
शब्द प्रताप लेओ शिर नायी । सुमिरण करौ हमहिं लौलाई ॥