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सर्वकोश
कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 559

बोधसागर

(११५)

सुकृत जहां आपै शठिहारा । रतन पलीता दीपक बारा ॥
फोडि ब्रह्मांड हंस घर जायी । दीप लेसि उजियार करायी ॥
हंस चले पुरुष दर्बारा । डघरे कूँची कुलुफ किवारा ॥
तहैं हंसन रोकत हैं दूता । देखत तहां बहुत अजगूता ॥

साखी-चले हंस सतलोकको, सुरति शब्द गहि डोर ॥
दोय पाँजीके बीचमें, बैठ काल तहैं चोर ॥

चौपाई

धरती माथ स्वर्गको नाका । तहाँ दोय पाँजी है बाँका ॥
तहवाँ दूत रहत है भाई । पुरुष नाम सुनि निकट न आई ॥
युगदानी ठाढे बटपारा । मागै देहू जीव हमारा ॥
प्रथमहिं हैं युगदानी जगाती । दूजे पाछे बजरघाती ॥
तीजे मृत्यु अंध बटपारा । परलम्बित चौथे सरदारा ॥
पैंचये दूत स्वयम्बर जानी । पाँचो यम जिव छेदत आनी ॥
जा घट नाम धनीका होई । सो हंसा नहि बूझे सोई ॥
नाम पान हृदये में गहई । सो हंसा यम सो निर्बहई ॥

साखी-नहिं धरती न अकाश जब, नहीं हाट अरु बाट ॥
तबका खसम कबीर है, दूसर यमकी हाट ॥

राजा बीरसिंह बचन-चौपाई

साहब शब्द सार मोहि दीजे । आपन करि प्रभु निजकै लीजे ॥
औघट घाट बाट कहि दीन्हा । पाँजी भेद सकल हम चीन्हा ॥
दयावंत विनती सुनु मोरी । हम पुरुषा परे नरक अघोरी ॥
महा कुटिल बड कामी रहिया । ताते नरक अघोर बड परिया ॥
ते जिव तारो अरज गुसाई । विन्ती करो रंककी नाई ॥
भरमें जीवनको मुक्ताऊ । सो भाषों प्रभु शब्द प्रभाऊ ॥